छरहरी काया की माया
ममता पंडित
23 सितम्बर 2026
इस विषय पर बहुत समय से कुछ लिखना चाह रही थी। हाल ही में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के बाद अभिनेत्री कटरीना कैफ़ को लेकर आई भद्दी टिप्पणियों ने जैसे कोई पुराना ज़ख्म कुरेद दिया।
कटरीना कुछ ही समय पहले माँ बनी हैं। नवंबर 2025 में उन्होंने बेटे को जन्म दिया था। उसके बाद जब वह सार्वजनिक रूप से दिखाई दीं तो लोगों को उनके चेहरे पर मातृत्व की चमक नज़र नहीं आई, बस उनकी बदली हुई काया दिखाई दी। सोशल मीडिया पर उनके प्रसवोत्तर शरीर को लेकर बेरहमी से टिप्पणियाँ की जाने लगीं। सितंबर में अंबानी परिवार के गणेशोत्सव में पति विकी कौशल के साथ उनकी सार्वजनिक उपस्थिति के बाद यह ट्रोलिंग फिर तेज़ हुई।
बेटी के जन्म के समय मेरा भी क़रीब पंद्रह किलो वज़न बढ़ा था और आज तेरह साल बीत जाने के बाद भी मैं उस पुरानी काया को वापस नहीं पा सकी। ग़लतियाँ शायद मेरी भी रही होंगी; लेकिन कोशिशों में भी कोई कमी नहीं छोड़ी, फिर भी मनचाही सफलता नहीं मिली। गाहे-बगाहे आज भी मुझे इस पर ताने और टिप्पणियाँ सुननी पड़ती हैं। अब आदत-सी पड़ गई है, इसलिए सुनकर अनसुना कर देती हूँ। यह लेख मैं किसी कोरी कल्पना से नहीं, बल्कि एक भुक्तभोगी के रूप में लिख रही हूँ।
सवाल यह है कि हमने वज़न को इतना बड़ा मुद्दा क्यों बना दिया है कि इसके इर्द-गिर्द आज करोड़ों का बाज़ार खड़ा हो चुका है? वज़न घटाने के तरीक़े किसी सस्ते उत्पाद की तरह खुलेआम बेचे जा रहे हैं। सोशल मीडिया खोलते ही हर दूसरी रील चर्बी पिघलाने के नुस्ख़े परोसती दिखाई देती है। हम एक पल के लिए रुककर देखते हैं और एल्गोरिदम उसी तरह के विज्ञापनों से हमारी पूरी फ़ीड भर देता है। कोई एक हफ़्ते में पाँच किलो घटाने का दावा कर रहा है तो कोई एक महीने में तीस किलो! कोई यह नहीं कहता कि हम आपको भीतर से स्वस्थ बनाएँगे, सबका ज़ोर सिर्फ़ इस बात पर है कि वे आपका वज़न कितना कम कर सकते हैं।
ऐसा इसलिए भी है कि हमारे समय में स्वास्थ्य और सौंदर्य के बीच का फ़र्क़ धुँधला होता जा रहा है। समाज ने सुंदरता का एक बहुत संकीर्ण मानक बना दिया है—छरहरी काया, एक ख़ास आकार और एक ख़ास तरह का चेहरा। इस साँचे में जो फ़िट नहीं बैठता, उसे किसी-न-किसी तरह अपने शरीर को बदलने की सलाह दी जाती है। मीडिया में दिखाई जाने वाली ‘आदर्श’ देह की छवियाँ भी लोगों को यह विश्वास दिला सकती हैं कि वही सामान्य शरीर है, जबकि ऐसा नहीं है।
काश ये दावे सच होते, लेकिन हक़ीक़त यह है कि इनमें से बहुत-से दावों के पीछे अतिशयोक्ति और अवास्तविक उम्मीदें हैं। दुबले दिखने की इतनी अंधी माँग पैदा कर दी गई है कि सस्ते से सस्ता चूर्ण और महँगे से महँगा पैकेज धड़ल्ले से बिक रहा है।
महिलाओं को यह छरहरी काया किसी दिवास्वप्न की तरह बेची जाती है। उनसे कहा जाता है कि पुरुष सिर्फ़ ऐसी ही काया पर रीझते हैं... मानो किसी पुरुष को आकर्षित करना ही एक स्त्री के जीवन का एकमात्र ध्येय हो! गर्भावस्था के बाद महिलाओं को उनके बढ़े हुए वज़न के नाम पर डराया जाता है, यहाँ तक कह दिया जाता है कि आकर्षण घटा तो पति हाथ से निकल जाएगा। विडंबना देखिए, कोई उन्हें यह नहीं समझाता कि जिस प्रेम की बुनियाद ही सिर्फ़ काया पर टिकी हो; वह प्रेम नहीं, माया है।
मातृत्व की नई ज़िम्मेदारियाँ अपने साथ कितना मानसिक तनाव लेकर आती हैं, इस पर हमारे समाज में अब भी पर्याप्त बात नहीं होती। प्रसव के बाद महिलाओं के शरीर और मन में अनेक बदलाव आते हैं। थकान, हार्मोनल परिवर्तन, नींद की कमी, सामाजिक समर्थन का अभाव और जीवन में अचानक आए बड़े बदलाव मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। प्रसवोत्तर अवसाद कोई मामूली उदासी नहीं, बल्कि एक गंभीर और उपचार-योग्य मानसिक स्वास्थ्य-स्थिति है। WHO के अनुसार प्रसव के बाद लगभग पाँच में से एक महिला प्रसवोत्तर अवसाद या चिंता का अनुभव कर सकती है; ACOG भी इसे कई जैविक, भावनात्मक और सामाजिक कारकों से जुड़ी स्थिति मानता है।
ऐसे समय में यदि किसी महिला को उसके शरीर को लेकर लगातार ताने सुनने पड़ें, तो उसका तनाव और बढ़ सकता है। हमारे यहाँ अक्सर नई माँ से यह उम्मीद की जाती है कि वह बच्चे को जन्म देने के कुछ ही समय बाद पहले जैसी दिखने लगे। जैसे शरीर ने कोई परीक्षा दी हो और अब उसे तुरंत पुराने आकार में लौटकर अपना परिणाम घोषित करना हो।
यह बात शायद फ़िल्मी लगे, लेकिन सच यही है कि नौ महीने एक नए जीवन को अपनी कोख में पालना, सींचना और जन्म देना कोई आसान काम नहीं है। एक बार माँ बनने के बाद औरत की ज़िंदगी पहले जैसी कभी नहीं रहती। उसका शरीर बदलता है, उसकी दिनचर्या बदलती है, उसकी नींद बदलती है, उसकी प्राथमिकताएँ बदलती हैं और कई बार उसके अपने शरीर के प्रति उसका रिश्ता भी बदल जाता है।
कटरीना के पास बेहतरीन जिम ट्रेनर, न्यूट्रिशनिस्ट और तमाम सुविधाएँ उपलब्ध हैं और वह अपने स्वास्थ्य पर काम भी कर रही हैं। हाल ही में उन्होंने स्वयं कहा कि अब उनके लिए अच्छा दिखने का अर्थ केवल बाहरी रूप नहीं, बल्कि भीतर से स्वस्थ और अच्छा महसूस करना है।
फिर भी इस सार्वजनिक ट्रोलिंग का असर क्या होगा, यह हम नहीं जानते। किसी व्यक्ति के मन पर लगातार की जाने वाली टिप्पणियों का प्रभाव केवल वही व्यक्ति जान सकता है। किसी अनजान भीड़ की आँखों को सुकून देने के लिए वह जीवन के इतने बड़े पड़ाव पर तुरंत अपनी पुरानी काया में लौट आने के लिए बाध्य नहीं है। यह बात केवल कटरीना पर लागू नहीं होती। यह हर उस स्त्री पर लागू होती है जो गर्भावस्था और प्रसव के बाद अपने बदले हुए शरीर के साथ जी रही है।
दरअस्ल, बढ़े हुए वज़न को लेकर पैदा किया गया दबाव केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है। पुरुष, बच्चे और बुज़ुर्ग भी शरीर और सौंदर्य के इन्हीं संकीर्ण मानकों का शिकार हो रहे हैं। किसी का क़द छोटा है, कोई बहुत दुबला है, कोई भारी शरीर का है, किसी का रंग साँवला है—हमने लगभग हर शरीर के लिए कोई-न-कोई मज़ाक तैयार कर रखा है।
सच तो यह है कि हमने भी हर गोल-मटोल इंसान पर हँसकर इस बीमार सोच को खाद-पानी दिया है। हम खुलेआम किसी के भारी शरीर का मज़ाक़ उड़ाते हैं। टेलीविज़न पर किसी कलाकार के शरीर या वज़न पर फ़ब्तियाँ कसी जाती हैं तो तालियाँ बजाते हैं, लेकिन यह नहीं देखते कि वह अपने उसी शरीर के साथ कितनी ऊर्जा और प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहा है। कई कलाकारों को तो अपना पूरा करियर ही अपने शरीर का मज़ाक़ बनाकर खड़ा करना पड़ा।
दूसरों को देखकर कोई भी राय क़ायम कर लेना आसान होता है, पर सच तो यह है कि हमें उनकी निजी जद्दोजहद का ज़रा भी इल्म नहीं होता। किसी के शरीर को देखकर उसके जीवन की कहानी लिख देना हमारी सबसे बड़ी भूल है। हम यह नहीं जानते कि वह किन परिस्थितियों से गुज़र रहा है, उसके स्वास्थ्य की वास्तविक स्थिति क्या है, वह अपने शरीर को लेकर भीतर से क्या महसूस करता है या उसने अपने बारे में दूसरों की टिप्पणियों से लड़ने में कितनी ऊर्जा ख़र्च की है।
जब तक हम ख़ुद किसी स्थिति से न गुज़रें, किसी दूसरे की मानसिक स्थिति को पूरी तरह समझ पाना मुश्किल है।
समाज की सोच इतनी सीमित हो चली है कि किसी भी छोटी-सी ‘कमी’ के साथ इंसान का सामान्य जीवन जीना मुश्किल कर दिया जाता है; जबकि होना यह चाहिए कि समाज ऐसे लोगों को एक संबल और सकारात्मक माहौल दे, ताकि वे अपनी तथाकथित ‘कमियों’ के दायरे से बाहर निकलकर गरिमापूर्ण जीवन जी सकें।
इस सोच को बदलने में यक़ीनन वक़्त लगेगा। लेकिन तब तक हमें अपने हिस्से का काम तो करना ही होगा—कम-से-कम किसी दूसरे के शरीर को उसकी अनुमति के बिना सार्वजनिक बहस का विषय न बनाकर।
हमें यह समझना होगा कि शरीर कोई सार्वजनिक संपत्ति नहीं है, जिस पर हर किसी को टिप्पणी करने का अधिकार मिल जाए। किसी स्त्री का शरीर उसके मातृत्व का प्रमाण-पत्र नहीं है और न ही उसकी सुंदरता का। किसी पुरुष का शरीर उसकी मर्दानगी का प्रमाण नहीं है। किसी बच्चे का वज़न उसकी प्रतिभा का पैमाना नहीं है और किसी बुज़ुर्ग की बदलती काया उसके जीवन-मूल्य को कम नहीं करती।
यदि आप भी कभी ऐसी टिप्पणियों या तनाव से गुज़र रहे हों, तो बस एक बात याद रखिए कि हम इस धरती पर सिर्फ़ दूसरों की नज़रों में ‘अच्छा दिखने’ के लिए नहीं आए हैं। हम अपने कर्मों, अपनी सोच और अपने अस्तित्व से इस दुनिया को बेहतर बनाने आए हैं।
आपका बाहरी स्वरूप—चाहे वह भारी शरीर हो, छोटा क़द हो या साँवला रंग—किसी दूसरे की संकीर्ण अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए नहीं बना है। यदि आपके शरीर से किसी को परेशानी है, तो हर बार उसका समाधान आपको अपने शरीर में खोजने की ज़रूरत नहीं है।
कभी-कभी समस्या शरीर में नहीं, उसे देखने वाली आँखों में होती है।
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