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छंद-छंद पर कुमकुम : समकालीन छंदबद्ध कविता का विशेष आयोजन

समकालीन कविता के परिदृश्य में जहाँ मुक्तछंद की उपस्थिति व्यापक है; वहीं छंदबद्ध कविता आज भी अपनी लय, अनुशासन और संगीतात्मकता के कारण पाठकों और श्रोताओं के बीच एक विशिष्ट स्थान बनाए हुए है। इसी परंपरा और समकालीनता को समर्पित एक विशेष आयोजन ‘छंद-छंद पर कुमकुम’ ‘हिन्दवी’ की तरफ़ से आयोजित किया जा रहा है। यह कार्यक्रम शनिवार, 17 जनवरी 2026, शाम 7 बजे आयोजित होगा। स्थान है—गुलमोहर सभागार, इंडिया हैबिटेट सेंटर, लोधी रोड, नई दिल्ली

‘छंद-छंद पर कुमकुम’ दरअस्ल एक सांस्कृतिक आग्रह है कि कविता की लय, उसकी परंपरा और उसका अनुशासन केवल अतीत की वस्तु नहीं; बल्कि आज के समय में भी नए अर्थों और नए सौंदर्य के साथ मौजूद है। यह आयोजन उसी जीवंत परंपरा का उत्सव है, जिसमें छंद, शब्द और संवेदना मिलकर कविता को एक यादगार अनुभव बना देते हैं।

कार्यक्रम का स्वरूप दो हिस्सों में विभाजित है—चर्चा-सत्र और काव्य-सत्र। चर्चा-सत्र में छंदबद्ध कविता की यात्रा, उसके सौंदर्यशास्त्र, उसके समकालीन रूप और उसके सामने उपस्थित चुनौतियों तथा संभावनाओं पर संवाद होगा। इस चर्चा-सत्र में ओम निश्चल, आरती मालवीय और वंदना शर्मा अपनी बात रखेंगे। इन तीनों वक्ताओं की उपस्थिति कार्यक्रम को विचार-समृद्ध बनाती है, क्योंकि वे कविता के पाठ, आलोचना और संवेदना—तीनों स्तरों पर छंद की भूमिका को देखने-समझने का अनुभव रखते हैं।

इसके बाद कार्यक्रम का दूसरा और सबसे प्रतीक्षित हिस्सा काव्य-सत्र होगा, जिसमें समकालीन छंदबद्ध कविता की प्रस्तुति होगी। इस सत्र में कवि उद्भ्रांत, अष्टभुजा शुक्ल, यश मालवीय और इति शिवहरे अपनी कविताएँ सुनाएँगे। इन कवियों की रचनात्मकता में छंद केवल तकनीक नहीं, बल्कि भावों का वाहक है—जो कविता को गेयता, प्रवाह और स्मरणीयता प्रदान करता है। यह काव्य-सत्र श्रोताओं को यह अनुभव कराएगा कि छंदबद्ध कविता आज भी उतनी ही प्रभावशाली है, जितनी किसी भी काल में रही है—बस उसके विषय, उसकी दृष्टि और उसके कहने के तरीक़े में समय के साथ नया विस्तार जुड़ता गया है।
इस पूरे आयोजन का संचालन ऋद्धि गिरी करेंगी।

साहित्य और कविता प्रेमियों के लिए यह अवसर विशेष है, क्योंकि यहाँ एक ही मंच पर मुक्तछंद और छंदबद्ध कविता की चर्चा भी होगी और उसका पाठ भी। इस आयोजन का उद्देश्य केवल छंदों की शास्त्रीय चर्चा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दिखाना भी है कि समकालीन कवि किस तरह पारंपरिक छंदों को नए अनुभवों, नए शब्द-लोक और आज के सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों के साथ जोड़कर एक ताज़ा काव्य-भाषा रच रहे हैं।

हिंदी भाषा और साहित्य को समर्पित रेख़्ता फ़ाउंडेशन का उपक्रम ‘हिन्दवी’ आप सबको इस आयोजन के लिए सादर आमंत्रित करता है।

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