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C/O बंगाल : केतकी कुशारी डायसन के रवींद्रनाथ

केतकी कुशारी डायसन [26 जून 1940 –11 सितंबर 2026] चली गईं। प्रस्थान विधिनिर्धारित है। इसे स्वीकार करने के अतिरिक्त हमारे पास कोई दूसरा उपाय नहीं। लेकिन एक बंगाली के रूप में हमें केतकी कुशारी डायसन जैसी विलक्षण प्रतिभा मिली थी, यह हमारे लिए गर्व की बात है और यह स्थान स्वयं केतकी ने अपनी असाधारण प्रतिभा, स्थायी जिज्ञासा और सतत साधना से निर्मित किया था। उनकी अद्भुत मेधा, गहन शोध-दृष्टि और जीवन को निरंतर नए सिरे से जानने-समझने की उत्कट आकांक्षा ने उनके साहित्य को जितना समृद्ध किया, उतना ही उनकी खोजी वृत्ति ने हमारे सामने ज्ञान का एक विस्तृत और अनदेखा संसार भी खोल दिया। 

केतकी कुशारी डायसन का एक महत्त्वपूर्ण योगदान यह भी है कि उन्होंने हमारे परिचित रवींद्रनाथ ठाकुर को हमारे सामने एक नई दृष्टि से, एक नए आलोक में उपस्थित किया।

रवींद्रनाथ ठाकुर विश्व के लिए एक भाव, अनुभूति और दर्शन का नाम हैं; यह बात अब अलग से कहने की आवश्यकता नहीं। उनकी रचनाओं ने हमें प्रकृति को नए ढंग से देखना सिखाया, आकाश के रंगों को पहचानने की दृष्टि दी, वसंत के फूलों, शरद की उजली धूप, वर्षा के बादलों, संध्या के अँधेरे और रोशनी को एक नई भाषा प्रदान की। लेकिन जिस मनुष्य ने अपनी भाषा को इतने रंगों से भर दिया, वह स्वयं इस दुनिया के रंगों को किस प्रकार देखता था? लाल रंग उनकी आँखों में कैसा दिखाई देता था और हरा और नीला? सूर्यास्त का आकाश, रक्त, पलाश, कृष्णचूड़ा अथवा वसंत का लाल गुलाल... इन रंगों का अनुभव उनके भीतर किस रूप में आकार लेता था? ये प्रश्न केतकी कुशारी डायसन के सामने रवींद्रनाथ को नए सिरे से देखने और उन्हें खोजने का एक नया द्वार खोलते हैं। उस द्वार से प्रवेश करते हुए वह रवींद्रनाथ के रंग-संसार तक पहुँचती हैं। 

इस यात्रा की शुरुआत 1989 में शांतिनिकेतन में हुई थी। उस समय केतकी रवींद्रनाथ की कविताओं का अँग्रेजी में अनुवाद कर रही थीं। इसी दौरान एक दिन उनकी मुलाकात नेत्र-विशेषज्ञ डॉ. ज्योतिर्मय बसु से हुई। उन्होंने केतकी को आर. डब्ल्यू. पिकफ़ोर्ड के साथ संयुक्त रूप से लिखे गए एक शोधपत्र को पढ़ने के लिए दिया। उस शोधपत्र में रवींद्रनाथ के कलर-विज़न और उनके चित्रों से जुड़ी सौंदर्यात्मक समस्याओं पर चर्चा की गई थी। यहीं पहली बार केतकी के सामने एक महत्त्वपूर्ण बात स्पष्ट रूप से उभरकर आई, संभवतः रवींद्रनाथ में प्रोटैनोपिया [Protanopia] अर्थात् लाल रंग से संबंधित एक विशेष प्रकार की कलर-विज़न-डेफ़िशिएंसी थी।

उल्लेखनीय है कि यह कोई बीमारी नहीं है, बल्कि जन्मजात कलर-परसेप्शन की एक विशिष्ट अवस्था है। इसके कारण लाल और हरे रंग के बीच का अंतर सामान्य कलर-विज़न वाले व्यक्ति की तरह अनुभव करना कठिन हो सकता है।

इस बात ने केतकी को भीतर तक चौंका दिया था; क्योंकि उन्होंने बचपन से रवींद्रनाथ को पढ़ा था, उनके गीत सुने थे, उनकी कविताओं में बिखरे रंगों को देखा था... लेकिन उन्होंने कभी यह नहीं सोचा था कि वे रंग शायद कवि की आँखों में वैसे दिखाई ही न देते हों, जैसे हमारी आँखों को दिखाई देते हैं! क्या इसीलिए रवींद्रनाथ किसी-किसी रंग को बार-बार अलग-अलग ढंग से, घुमा-फिराकर व्यक्त करते हैं? क्यों ‘लाल’ या ‘हरा’ जैसे सीधे और प्रचलित शब्दों के स्थान पर वह कई बार ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं जो अधिक सूक्ष्म, अस्पष्ट या बिल्कुल अलग अर्थ की ओर संकेत करते हैं?

इसके बाद केतकी ने तीस खंडों में प्रकाशित रवींद्रनाथ ठाकुर रचनावली को लगभग किसी जासूस की तरह अत्यंत सूक्ष्मता से पढ़ना शुरू किया। वह लगातार यह जाँचती रहीं कि रवींद्रनाथ ने रंगों को किस तरह देखा, किस तरह रचा-लिखा और किस प्रकार अनुभव किया था। इस खोज में शांतिनिकेतन के कलाकार सुशोभन अधिकारी उनके साथ जुड़े, जो रवींद्रभवन के विशाल चित्र-संग्रह से सघन रूप से सुपरिचित थे। उनके साथ विज़ुअल साइंटिस्ट एड्रियन हिल और केतकी के पति वैज्ञानिक रॉबर्ट डायसन भी इस अनुसंधान से जुड़े। यह शोध आगे बढ़ता रहा। साहित्य से चित्रकला की ओर, चित्रकला से विज्ञान की ओर और फिर विज्ञान से वापस साहित्य की ओर... 

इस शोध की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी रवींद्रनाथ के अपने पत्रों में ही मिली। ‘छिन्नपत्रावली’ में उन्होंने विनोदपूर्वक स्वयं को ‘ए सेलिब्रेटेड कलर-ब्लाइंड पर्सन’ कहा था। इतने दिनों तक इस टिप्पणी को महज एक आत्मपरिहास या विनोद के रूप में ही देखा जाता रहा था। लेकिन केतकी ने रवींद्रनाथ की कलर-विज़न के संबंध में उनके समकालीन लोगों की टिप्पणियों को तलाशना शुरू किया। रानी चंद, रोमां रोलां, स्टेला क्रामरिश, रानी महालनोबिस आदि के लेखों और संस्मरणों में उन्हें इस विषय के संकेत मिले। इसी क्रम में वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस का एक पत्र भी केतकी के हाथ लगा, जिसमें रवींद्रनाथ के कलर-परसेप्शन के संबंध में चर्चा थी।

इन बिखरे हुए पुराने संकेतों को एक-एक करके जोड़ते हुए केतकी ने ‘वर्णांध रवींद्रनाथ’ की तथ्यता को एक समग्र शोध-प्रश्न में रूपांतरित किया और इस आधार पर अपना शोधपत्र तैयार किया। यह अलग-अलग समय और अलग-अलग स्रोतों में बिखरी सूचनाओं को एक साथ रखकर उन्हें साहित्य, कला और विज्ञान की कसौटी पर परखने का एक गंभीर प्रयास था।

कलाकार-शोधकर्ता सुशोभन अधिकारी के साथ दीर्घकालीन शोध के फलस्वरूप उन्होंने ‘रंगेर रवींद्रनाथ / रवींद्रनाथेर साहित्ये ओ चित्रकलाय रंगेर ब्यबहार’ अर्थात् रवींद्रनाथ के साहित्य और चित्रकला में रंगों का प्रयोग, शीर्षक से लगभग आठ सौ पृष्ठों का एक असाधारण शोधग्रंथ प्रस्तुत किया। इस शोधकार्य में एड्रियन हिल और रॉबर्ट डायसन ने भी सहयोग किया था। केतकी ने अपने गहन अनुसंधान में साहित्य को नेत्र-विज्ञान, कलर-विज़न, कला-इतिहास, चित्रकला, अनुवाद और सौंदर्यशास्त्र जैसे विविध ज्ञानक्षेत्रों के साथ जोड़ दिया। 

हालाँकि केतकी पहले से यह निर्णय लेकर नहीं बैठी थीं कि रवींद्रनाथ प्रोटैनोप [Protanope] थे। इसके विपरीत, उनके अपने शब्दों में, यह शोध एक ओपन माइंड के साथ शुरू हुआ था। यहाँ मूल प्रश्न यह था कि अगर रवींद्रनाथ की कलर-विज़न में कोई विशिष्टता थी, तो क्या उसका कोई निशान उनकी रचनाओं में भी दिखाई देता है? क्या उनकी उपमाओं, रूपकों, प्रकृति-वर्णनों, पात्रों के चेहरे और त्वचा के वर्णन, प्रकाश और अँधेरे के प्रयोग में उसका कोई संकेत मिलता है? और क्या उनकी चित्रकला में भी ऐसी कोई निरंतरता, कोई विशिष्ट पैटर्न या कोई ऐसा चिह्न मौजूद है जो उनकी रंग-दृष्टि की उस विशेषता की ओर संकेत कर सके?

इसके बाद जो विपुल सामग्री और तथ्य-संग्रह तैयार हुआ, वह अपने-आपमें अत्यंत रोचक है। इसका एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है : रवींद्रनाथ की कलर-वोकैब्युलरी। केतकी के अवलोकन के अनुसार, प्रचलित शब्द ‘लाल’ और ‘हरा’ की तुलना में रवींद्रनाथ कई बार ‘राँगा’ और ‘श्यामल’ जैसे शब्दों का प्रयोग अधिक सहजता से करते हैं; अर्थात् यह किसी एक निश्चित रंग को परिभाषित करने के बजाय एक विस्तृत विज़ुअल फ़ील्ड निर्मित करता है। केतकी के अनुसार, इस रंग-प्रयोग में दिखाई देने वाली अस्पष्टता का संबंध रवींद्रनाथ के कलर-परसेप्शन की विशिष्टता से हो सकता है।

लाल रंग के मामले में यह बात और भी अधिक दिलचस्प हो जाती है। रवींद्रनाथ के साहित्य में लाल उत्सव का रंग है और कभी प्रेम का तो कभी ऋतु-परिवर्तन तथा प्रकृति के विविध रूपों को व्यक्त करने का माध्यम है। लेकिन इसके साथ ही लाल बार-बार उनकी रचनाओं में रक्त, हिंसा, लज्जा, क्रोध, मृत्यु और पीड़ा के प्रतीक के रूप में भी उपस्थित होता है। केतकी ने ध्यान दिया कि रवींद्रनाथ के यहाँ लाल रंग का प्रयोग कई बार सीधे किसी विज़ुअल डिस्क्रिप्शन के रूप में नहीं होता; वह किसी दूसरी अनुभूति, भाव या मानसिक स्थिति के साथ जुड़कर अपना अर्थ ग्रहण करता है। उनके प्रसिद्ध नाटक ‘रक्तकरबी’ में इसका एक बेहद प्रभावशाली उदाहरण मिलता है। यहाँ लाल करबी का फूल रहस्य, आकांक्षा, संकट, सौंदर्य, मृत्यु और विद्रोह इन सभी के बहुस्तरीय अर्थों का प्रतीक बन जाता है।

केतकी ने यह भी समझाने का प्रयास किया कि जब रवींद्रनाथ के लिए किसी रंग को प्रत्यक्ष रूप से पकड़ना कठिन हुआ; तब उन्होंने कई बार शब्द, लय, स्वर और ध्वनि के माध्यम से उस विज़ुअल एक्सपीरियंस का पुनर्निर्माण किया; अर्थात् जहाँ आँख आकर ठहर जाती है, वहाँ कान अपने लिए एक नया रास्ता खोल लेता है। रंग को वह ध्वनि के माध्यम से अनुभव करते हैं। वह रंग को शब्द और लय में पकड़ने का प्रयास करते हैं। 

नीले रंग को लेकर केतकी ने कुछ और भी चौंकाने वाले तथ्य सामने रखे। रवींद्रनाथ की कविताओं-गीतों में नीला रंग अस्तित्व, आनंद और सौंदर्य की एक विशिष्ट भाषा निर्मित करता है। आकाश, नीलिमा, अनंतता, रूप और लावण्य... इन सभी को वह नीले रंग की अनुभूति के साथ जोड़ते हैं। लेकिन उनकी चित्रकला में नीले रंग का प्रयोग उसी अनुपात में दिखाई नहीं देता। केतकी ने इस विरोधाभास को भी कलर-परसेप्शन के संदर्भ में देखा है। उनके अनुसार जो रंग रवींद्रनाथ की आँखों को सबसे अधिक स्पष्ट और उज्ज्वल दिखाई देता था, साहित्य में संभवतः उन्होंने उसी रंग का सबसे अधिक उत्सव मनाया। लेकिन चित्रकला के क्षेत्र में उनकी रुचि अन्य रंगों की सीमाओं और संभावनाओं को परखने में थी। रवींद्रनाथ की अनेक चित्रकृतियों में सीमित कलर-रेंज, अँधेरे और प्रकाश के बीच तीव्र विरोधाभास, भूरे तथा गहरे रंगों की प्रधानता और कहीं-कहीं मोनोक्रोमैटिक कम्पोज़िशन... इन सभी पहलुओं के माध्यम से केतकी कुशारी और सुषोभन अधिकारी ने कलर-विज़न के संभावित प्रभाव की पड़ताल की है। 1991 में एड्रियन हिल और रॉबर्ट डायसन शांतिनिकेतन गए थे और वहाँ उन्होंने रवींद्रनाथ की कुछ चित्रकृतियों की कलरिमेट्री [colorimetry] भी की। उनके शोध में उन चित्रों की रंग-संरचना में प्रोटैनोपिक परसेप्शन [Protanopic Perception] के साथ कुछ साम्य दिखाई दिया।

हालाँकि यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात को ध्यान में रखना आवश्यक है, यह रवींद्रनाथ के जीवनकाल में किया गया कोई क्लिनिकल कलर-विज़न टेस्ट नहीं था। यह केवल उनके लिखित और चित्रित कार्यों, आर्काइवल एविडेन्स तथा कलरिमेट्री के आधार पर निर्मित एक शोधपरक हाइपोथीसिस है। इसलिए इसे किसी अंतिम चिकित्सकीय निष्कर्ष के रूप में नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर विकसित एक संभावित शोध-दृष्टि के रूप में देखना अधिक उचित होगा। इस शोध का एक और चौंकाने वाला पक्ष रवींद्रनाथ के कलाकार के रूप में विकसित होने का इतिहास है। केतकी कुशारी और सुशोभन अधिकारी के शोध से यह संकेत मिलता है कि रवींद्रनाथ की कलाकार-सत्ता के विकास में प्रिमिटिव आर्ट, अफ़्रीकन आर्ट, एशियन आर्टिफ़ैक्ट्स और विशेष रूप से जर्मन एक्सप्रेशनिज़्म की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। यूरोप और अमेरिका के अनेक म्यूज़ियम और गैलरी का भ्रमण कर उन्होंने आर्ट एल्बम, आर्काइवल कलेक्शन तथा कला-इतिहास से संबंधित विभिन्न सामग्रियों का अध्ययन किया। उन्होंने रवींद्रनाथ की कुछ चित्रकृतियों में हाइडा, मालांगान, अफ़्रीकी, पेरूवियन तथा अन्य कलात्मक परंपराओं के साथ दृश्यगत समानताएँ भी रेखांकित कीं। यहाँ तक कि रवींद्रनाथ द्वारा स्वयं बनाए गए सिग्नेचर सील और हाइडा-कला में प्रयुक्त सैल्मन-ट्राउट हेड मोटिफ़ के बीच दिखाई देने वाली आश्चर्यजनक समानता ने भी उनका ध्यान आकर्षित किया। जर्मन एक्सप्रेशनिज़्म का प्रसंग विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। केतकी और सुशोभन के शोध के अनुसार, एक्सप्रेशनिस्ट आर्ट की विकृत आकृतियाँ, सरलीकृत कलर प्लेन, वुडकट की टेक्सचर और रंगों के अपरंपरागत प्रयोग... ये सभी तत्त्व रवींद्रनाथ की चित्रकला के विकास को समझने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। 

केतकी ने इसी तरह रवींद्रनाथ और विक्टोरिया ओकांपो के संबंध को भी एक बिल्कुल अलग दृष्टि से सामने रखा। ‘इन योर ब्लॉसमिंग फ़्लावर-गार्डन : रवींद्रनाथ टैगोर एंड विक्टोरिया ओकांपो’ शीर्षक पुस्तक 1988 में साहित्य अकादेमी से प्रकाशित हुई। लगभग 477 पृष्ठों की यह पुस्तक भी उनके गहन शोध का परिणाम है। इसमें रवींद्रनाथ और ओकांपो के संबंधों के साथ-साथ लियोनार्ड एल्महर्स्ट की भूमिका, विपुल आर्काइवल मैटीरियल तथा रवींद्रनाथ और ओकांपो के बीच हुए पत्राचार—टैगोर-ओकांपो कॉरेस्पॉन्डेन्स—की विस्तृत व्याख्या और टिप्पणियाँ प्रस्तुत की गई हैं।

इस शोध का महत्त्व समझने के लिए 1924 के अर्जेंटीना-प्रवास के प्रसंग पर एक बार दृष्टि डालना आवश्यक है। रवींद्रनाथ और विक्टोरिया ओकांपो की भेंट बंगाली साहित्य तथा लैटिन अमेरिकी सांस्कृतिक इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। ‘एक कवि और उनकी विदेशी प्रशंसिका की कहानी’ के रूप को साइड में रखकर; केतकी ने इसके सामाजिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक विस्तार को सामने रखा। ओकांपो स्वयं लेखिका, संपादक और सांस्कृतिक आयोजक थीं। उन्होंने कुछ बाद में ‘सुर’ [Sur] पत्रिका की स्थापना भी की। केतकी ने अपने शोध में रवींद्रनाथ और ओकांपो के बीच हुए पत्राचार को विशेष महत्त्व दिया। उन्होंने दोनों के पारस्परिक आकर्षण, बौद्धिक आदान-प्रदान, दूरी, भावनात्मक जटिलताओं और सांस्कृतिक भिन्नताओं को आर्काइवल एविडेंस के आधार पर देखने का प्रयास किया। पुस्तक के प्रकाशन-विवरण में भी स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि इसमें टैगोर-ओकांपो कॉरेस्पॉन्डेन्स को विस्तृत एनोटेशंस के साथ प्रस्तुत और व्याख्यायित किया गया है। अनेक आर्काइवल मैटीरियल को उन्होंने अपने शोध के माध्यम से पहली बार व्यापक पाठक-समाज के सामने लाया। इस तरह केतकी ने दिखाया कि रवींद्रनाथ और ओकांपो की मुलाक़ात वास्तव में बंगाल, भारत, यूरोप और लैटिन अमेरिका के बीच हुए एक व्यापक सांस्कृतिक मिलन के इतिहास का हिस्सा थी।

केतकी कुशरी डायसन स्वयं दो भाषाओं की लेखिका थीं। उनका जीवन बंगाली, भारतीय संस्कृति और यूरोपीय संस्कृति इन दो भिन्न सांस्कृतिक संसारों के बीच निरंतर आवागमन और संवाद में निर्मित हुआ था। उनकी अनुवाद-चर्चा का महत्त्व भी यहीं निहित है। उन्होंने रवींद्रनाथ को अँग्रेज़ीभाषी पाठकों के लिए सरल या सपाट बनाने का प्रयास नहीं किया; बल्कि अपने अँग्रेज़ी अनुवादों के माध्यम से पाठकों को रवींद्रनाथ के जटिल, बहुस्तरीय और इंद्रियसमृद्धसंसार की ओर जाने के लिए प्रेरित किया। 

केतकी कुशारी डायसन अपनी व्यापक रवींद्रचर्चा और साहित्यिक साधना के माध्यम से भाषाई सीमाओं को पार करने वाली और विभिन्न संस्कृतियों के बीच सेतु निर्मित करने वाली एक विलक्षण बौद्धिक व्यक्तित्व के रूप में सामने आती हैं। उनका पार्थिव शरीर भले ही इस नश्वर सृष्टि में विलीन हो गया हो, लेकिन उनका काम समय की सीमाओं और सभी भौगोलिक-सांस्कृतिक सीमाओं को पार करता हुआ जीवित रहेगा। उनके लेखन, अनुवाद और शोध ने जिन संवादों के द्वार खोले हैं; वे किसी एक समय या किसी एक भाषा की सीमा में बँधे नहीं हैं। इस अर्थ में केतकी कुशारी डायसन का साहित्यिक और शोधकर्म उनके जीवन के बाद भी निरंतर संवाद में रहेगा—भाषा से भाषा, संस्कृति से संस्कृति और पीढ़ी से पीढ़ी तक...

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