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C/O बंगाल : देवी से बेटी तक : आगमनी-विजया गीतों में मानवीय दुर्गा का जन्म

गिरि, इस बार मेरी उमा आए तो
अब उमा को नहीं भेजूँगी,
मुझे कहकर लोग चाहे बुरा कहें,
किसी की बात नहीं सुनूँगी।

यदि आकर भोला [शिव]
उमा को ले जाने की बात कहे,
इस बार माँ-बेटी मिलकर करूँगी झगड़ा,
दामाद कहकर नहीं मानूँगी। 

— रामप्रसाद सेन

बंगाल में दुर्गापूजा की सबसे आश्चर्यजनक बात शायद यही है कि बंगालियों ने दुर्गा को देवी नहीं, उसे अपने घर की बेटी बना लिया। यहाँ महिषासुरमर्दिनी दशभुजा देवी, माँ की गोद में मुँह छिपाकर रहने वाली उमा छोटी-सी बेटी बन जाती है। इस रूपांतरण का सबसे मार्मिक साहित्यिक दस्तावेज़ हैं—बंगाल के आगमनी और विजया गीत। यहाँ पुराण धीरे-धीरे घर के आँगन में उतर आता है, कैलास की देवी बंगालियों के घर की बेटी बन जाती हैं, हिमालय एक सामान्य पिता में रूपांतरित हो जाते हैं, मेनका बेटी के विरह में व्याकुल बंगाली माँ बन जाती हैं और शिव उस दामाद का रूप धारण कर लेते हैं जिसके हाथों बेटी को सौंपकर माता-पिता पूरे वर्ष उसके लौटकर आने की प्रतीक्षा करते हैं। यहीं देवी दुर्गा का एक गहरा मानवीय पुनर्जन्म होता है। शाक्त पदावली की आगमनी-विजया गीत बंगालियों के पारिवारिक जीवन, मातृत्व, पुत्री-विरह, दाम्पत्य, मान-अभिमान और बिछोह का एक अद्भुत गीतिकाव्य हैं।

आर्यों के आगमन से बहुत पहले ही यहाँ के आदिवासी और लोकसमाज में पृथ्वी तथा मातृदेवी की उपासना प्रचलित थी। आगे चलकर वैदिक संस्कृति और लोकायत परंपराओं के समन्वय से बंगाल में शाक्त धर्म की सुदृढ़ नींव तैयार हुई। शाक्त दर्शन और तंत्र-साधना में शरीर, प्रकृति और ब्रह्म को अलग-अलग नहीं माना जाता। यहाँ प्रकृति अर्थात् शक्ति ही सृष्टि और जीवन की मूल संचालक शक्ति है, जबकि शिव उसके निष्क्रिय साक्षी के रूप में उपस्थित हैं।

उमा पुराणों में हिमालय और मेनका की पुत्री तथा शिव की पत्नी हैं। उनकी एक पहचान पार्वती है, एक पहचान दुर्गा और एक पहचान महामाया। वह असुरदलनी, दशभुजा, सिंहवाहिनी और महिषासुरमर्दिनी भी हैं। देवता जिनकी शरण में जाते हैं, जिनकी शक्ति से असुरों का विनाश होता है; वह अचानक बंगालियों के घर की बेटी कैसे बन गईं? इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए हमें शाक्त पदावली की ओर देखना होगा, क्योंकि शाक्त कवियों ने देवी-ऐश्वर्य को मानवीय अनुभूतियों के भीतर प्रतिष्ठित कर दिया। फलतः देवी तब किसी दूरस्थ अलौकिक शक्ति के रूप को छोड़कर बेटी बन जाती हैं; जो वर्ष में एक बार मायके आती है, माँ के साथ बातें करती है, पिता के सामने खड़ी होती है, भाइयों के साथ रहती है और कुछ दिनों की ख़ुशी के बाद फिर पति के घर लौट जाती है।

रवींद्रनाथ ठाकुर ने लिखा है : “हमारे इस घर के स्नेह, घर के दुःख, बंगाली गृहस्थ-जीवन की इस चिरंतन वेदना से अश्रुजल आकर्षित करके बंगालियों के हृदय के बीच शारदोत्सव पल्लववान् और छाया में प्रतिष्ठित हुआ है। ...आगमनी और विजया बंगालियों के मातृहृदय के गीत हैं।”

इस ‘लौटकर आने’ और ‘लौटकर चले जाने’ के बीच ही आगमनी-विजया गीतों का समूचा सौंदर्य निहित है। आगमनी है उमा के मायके लौटकर आने की ख़ुशी और उनकी प्रतीक्षा का गीत, विजया है उस ख़ुशी के समाप्त हो जाने की पीड़ा का गीत। इस आराधना ने स्त्रीत्व, सृजनशीलता और स्त्री-शक्ति को सम्मान की एक विशिष्ट ऊँचाई प्रदान की है।

गिरिवर! और मैं अब नहीं कर सकती
उमा को समझा-बुझा।
उमा रो-रोकर करती है मान, 
न स्तनपान करती है,
न खाती है क्षीर, नवनीत-सार॥

बहुत देर रात में, जब आकाश में चंद्रमा उदित हुआ,
उमा ने कहा—उसे पकड़कर दे दो।
रो-रोकर उसकी आँखें सूज गई हैं, 
उसका मुख मलिन हो गया है,
माँ होकर यह सब क्या सह सकती है॥

‘आ, आ माँ-माँ’ कहकर, उसकी कर-अँगुली पकड़ाकर,
वह न जाने कहाँ जाने को उद्यत होती है।
मैंने उससे कहा—‘चाँद भला क्या पकड़ा जा सकता है?’
तब आभूषण फेंककर वह मुझे मारने लगी॥

गिरिवर उठकर बैठते हैं, बहुत स्नेह-सम्मान से
गौरी को अपनी गोद में उठा लेते हैं।
आनंद से हँसकर कहते हैं—‘ले माँ, यह चंद्रमा ले।’
और हाथ में दर्पण देकर देते हैं॥

दर्पण में अपना मुख देखकर
उसके मन में महान् आनंद उत्पन्न हुआ
जिसके सौंदर्य के सामने करोड़ों चंद्रमा भी लज्जित हैं॥

श्रीरामप्रसाद कहते हैं—कितने पुण्यों का संचय होगा
जिसके घर में स्वयं जगत-जननी हैं!
यह कहते-कहते जगन्माता गहरी निद्रा में सो गईं,
और उन्हें पलंग पर सुला दिया गया॥ 

— रामप्रसाद सेन

क्या अद्भुत दृश्य है! मेनका जानती हैं कि उनकी बेटी कोई साधारण लड़की नहीं है, फिर भी मातृत्व के सामने यह ज्ञान पराजित हो जाता है। वह देवी को देवी के रूप में देखना नहीं चाहतीं।

रामप्रसाद ने बंगालियों की ईश्वर-चेतना को ऐसी सहज, बोलचाल की और घरेलू भाषा दी जिसमें देवी; देवी नहीं रह जातीं। उनके गीतों में माँ को अपनी जन्मदात्री माँ की तरह पुकारा जा सकता है, उनसे रूठा जा सकता है, शिकायत की जा सकती है, यहाँ तक कि उनसे झगड़ा भी किया जा सकता है। उनके आगमनी गीत की एक पंक्ति, “गिरि, इस बार मेरी उमा आए तो अब उमा को नहीं भेजूँगी...” में धार्मिक भक्ति की अपेक्षा जैसे एक माँ की ज़िद अधिक मुखर हो उठती है। शिव के प्रति मेनका के मन में अभिमान है। शिव भोले-भाले है , देवता हो सकते हैं; लेकिन मेनका की आँखों में वह उनकी बेटी के पति हैं... और बेटी के सुख-दुःख के प्रश्न पर देवत्व का कोई मूल्य नहीं है।

यह रामप्रसाद की वास्तविक रूप से क्रांतिकारी और ऐतिहासिक सोच है। उन्होंने देवी और बंगालियों के दैनिक जीवन के बीच की दूरी को मिटा दिया। एडवर्ड थॉमसन ने अपनी पुस्तक Bengali Lyrics की भूमिका में लिखा है : “शाक्तवाद का उत्तरवर्ती पक्ष ही वह पक्ष है, जो सामान्यतः रामप्रसाद की रचनाओं में उपस्थित दिखाई देता है।”

रामप्रसाद सेन सहज भाव के साधक हैं :

धूम-धाम से यदि पूजा करो,
मन ही मन अहंकार हो जाता है।
तुम उसे छिपकर पूजो,
संसार के लोग जान भी न पाएँ।
धातु, पत्थर और मिट्टी की मूर्ति—
उसे गढ़ने से तुम्हारा क्या प्रयोजन?
तुम मनोमय प्रतिमा बनाकर
उसे हृदय-कमल के आसन पर विराजित करो।

रामप्रसाद के बाद और एक कवि कमलाकांत भट्टाचार्य के हाथों यह मानवीय उमा और अधिक स्पष्ट तथा अधिक मनोवैज्ञानिक रूप ले लेती हैं। रामप्रसाद ने जिस मार्ग की शुरुआत की थी, कमलाकांत उसे और अधिक गहराई तक ले गए। उनके आगमनी गीतों में मेनका की उत्कंठा, मान-अभिमान, कल्पना और स्वप्न, सब मिलकर एक जीवंत पारिवारिक संसार का निर्माण करते हैं। मेनका स्वप्न में अपनी बेटी को देखती हैं, नींद टूट जाने के बाद भी वह स्वप्न  वास्तविकता से भी अधिक वास्तविक बना रहता है...

रात के सपने में मैंने यह क्या देखा?
हे हिमालय! आप कैसी गहरी नींद में सोए हैं!
वह तो अभी मेरे बिस्तर के पास थी—
मेरी गौरी कहाँ चली गई?
वही जो अपने चाँद जैसे मुखड़े से 
‘माँ’ शब्द तोतली आवाज़ में कहती थी।
मन का अँधेरा दूर करते हुए वह प्रकट हुई और
अपने मधुर वचनों से अमृत की वर्षा की।
हे राजा, नींद में मुझे यह ख़ज़ाना मिला, 
पर जागते ही खो गया;
मेरा जीवन अब इस पीड़ा को सह नहीं सकता।
और यह डरावना संकेत सुनो, 
चारों ओर सियार हुआँ-हुआँ कर रहे हैं;
उनके बीच श्मशान में मेरी उमा अकेली पड़ी है।
मुझे बताओ, मैं क्या करूँ? कौन मुझे ख़बर देगा?
मुझे नहीं पता कि मेरी गौरी किस हाल में है!

हे पर्वतों की पुण्यात्मा रानी, कमलाकांत के शब्द सुनो—
उस रूप को देखो जिसे तुमने नींद में इतनी आसानी से देखा था।
उन्हीं कमल जैसे चरणों के लिए शंकर संन्यासी बन गए;
हर [शिव] उन्हें अत्यंत भक्ति के साथ अपने हृदय में बसाए रखते हैं।

यहाँ देवी विश्वजननी नहीं हैं, वह एक रूठी हुई बालिका हैं। उनकी माँ को लगता है कि बेटी अपने ससुराल में कष्ट में है। शिव की बाघछाल, हड्डियों की माला, जटाओं में सर्प और धतूरा—ये सब मेनका की आँखों में बेटी के अनिश्चित दाम्पत्य-जीवन के चिह्न बन जाते हैं। तब ही शाक्त पदावली अपने समय की सीमाओं को पार कर जाती है। कमलाकांत की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वह उमा को एक साथ बेटी और महाशक्ति दोनों रूपों में देख सकते हैं। यह बांग्ला में देवी-वंदना का सौंदर्य है। 

बांग्ला-साहित्य में देवी-वंदना चंडीमंगल-काव्य में है। लेकिन तब देवी चंडी के साथ भक्त का संबंध जितना भय का था, उतना भक्ति या प्रेम का नहीं होता था। अठारहवीं शताब्दी के आरंभ में ही संपूर्ण गौड़-बंगाल पर एक अँधेरे युग की छाया उतर आई थी। औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद विशेष रूप से बंगाल एक भयंकर विपर्यय के सामने आ खड़ा हुआ था। चारों ओर सामाजिक अवनति अपने दाँत और नाख़ून निकाल चुकी थी। बंगाल दिशाहीन और अंधकार में डूब गया था। तब तक वैष्णवों का प्रेमधर्म समाज के कुछ रूढ़िवादी वर्गों के लिए ‘नेड़ा-नेड़ी का कांड’ कहकर उपहास का विषय बन गया। इस चरम अव्यवस्था के बीच रामप्रसाद सेन, कमलाकांत भट्टाचार्य ने जगज्जननी देवी के चरणों में सांसारिक वासनाओं से ऊपर उठकर आत्मसमर्पण किया। उनके शाक्त पद वैष्णवों की तरह संसार और दैनिक जीवन से विमुख नहीं थे। ‘संसार की ग्लानि, उसका नग्न यथार्थ, निर्धनता, रिक्तता, बहुविवाह, स्नेहहीन विमाता आदि जीवन की अनेक कठोर वास्तविकताएँ इस गीतों में अत्यंत स्पष्ट और मुखर रूप में उपस्थित हैं।

कवि दाशरथि राय के हाथों यह मानवीयता और अधिक नाटकीय तथा तीव्र हो उठती है। उनके आगमनी गीत में एक असाधारण क्षण आता है : गिरि उमा को लेकर लौटे हैं, लेकिन जिस बेटी की प्रतीक्षा मेनका कर रही थीं, उसके स्थान पर सामने आकर खड़ी हुई हैं—दशभुजा, रणरंगिणी दुर्गा। माँ की आँखों में उस क्षण देवी की पहचान ही मानो मिट जाती है :

कहाँ है, हे गिरि, कहाँ है मेरी प्राणों से प्यारी उमा नंदिनी!
तुम्हारे साथ आँगन में यह कौन रणरंगिणी आ गई है?

दाशरथि राय की एक और पंक्ति इस मानवीयता के दूसरे छोर को सामने लाती है : “प्राणों की पुतली उमा मेरी, आकर कह गई थी कि आएगी, फिर आई ही नहीं।” यहाँ देवी ‘प्राणों की पुतली’ हैं, जिसके चले जाने पर माँ की आँखों में आँसू भर आते हैं। 

आगमनी गीतों में प्रश्न है : बेटी कब आएगी? विजया गीतों में प्रश्न है : बेटी क्यों चली जाएगी? इन दोनों प्रश्नों के बीच बंगालियों का समूचा मातृत्व आकर खड़ा हो जाता है। आगमनी है—‘आने’ की प्रसन्नता, विजया है—‘जाने न देने’ की असहायता। इसीलिए कमलाकांत नवमी की रात को थामे रखना चाहते हैं :

हे नवमी की निशा! न होना तुम अवसान,
सुना है तुम हो बड़ी कठोर, न रखती मान।
दुष्टों में भी कौन है, जो तुम-सा निर्दय हो?
अपने ही को मारकर, हरती पर के प्राण।

प्रफुल्लित कमल लिए, चंदन अर्पण कर,
कर में लेकर अर्घ्य मैं, आऊँ तेरे द्वार।
मेरे जीवन में प्रभात, हे दिनमणि, कर दो,
शिव-वचन के बाण से, बच जाए यह प्राण।

तनया का मुख देखकर, भूल गया सब शोक,
आज मिला जो सुख मुझे, लगता जैसे स्वप्न।
कमलाकांत की वाणी, सुन लो हे गिरिराज!
माँ को अपने हृदय में, दे दो स्थिर स्थान।

आगमनी-विजया गीत उन्नीसवीं शताब्दी के बंगाल के पारिवारिक समाज के दस्तावेज़ हैं। बेटी का विवाह, ससुराल की अनिश्चितता, दामाद के साथ संबंध, बेटी को लेकर माँ की चिंता, वर्षों तक बेटी की प्रतीक्षा, ये सब पौराणिक कथा के भीतर से उभरकर सामने आए हैं। शाक्त पदावली मंदिर की सीमाओं से बाहर निकलकर बंगाल के अंतःपुर में प्रवेश कर गई। देवी की पूजा करने के साथ-साथ बंगाली समाज ने इन गीतों के भीतर अपने जीवन को भी पहचाना।

यह रचनाधारा कमलाकांत और रामनिधि गुप्त से लेकर माइकल मधुसूदन दत्त, रवींद्रनाथ ठाकुर और काज़ी नज़रुल इस्लाम तक विस्तृत है। माइकल मधुसूदन दत्त के सॉनेट में मेनका की वही करुण पुकार साकार हो उठती है :

मत जाओ, हे रजनी! अपने साथ ताराओं का दल लिए!
तुम चली गईं, हे चंद्रमुखी, तो यह प्राण भी चला जाएगा!

ब्राह्म रवींद्रनाथ भी देवी दुर्गा की आगमनी-कथा रचे बिना नहीं रह सके। उनकी कविता में शारदीय देवी के स्वागत की वह निर्मल आकांक्षा इस प्रकार मुखरित हुई है :

हमने काश के गुच्छे बाँधे हैं, 
हमने शिऊली की मालाएँ गूँथी हैं,
नवीन धान की मंजरी से सजाकर 
डाला लेकर आए हैं।
आओ, हे शारद-लक्ष्मी!

दूसरी ओर, नज़रुल तो दुर्गा को लेकर कविता लिखने के कारण जेल तक गए। उनकी कविता में देवी का आह्वान तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ के विरुद्ध एक विद्रोही उद्घोष में रूपांतरित हो जाता है :

और कितने दिन रहेगी, बेटी, मिट्टी की प्रतिमा के पीछे छिपी?
आज स्वर्ग पर अत्याचारी, चांडाल-सी शक्ति ने अधिकार कर लिया है।

नज़रुल के इस गीत को ध्यान से देखने पर स्पष्ट होता है कि रामप्रसाद और दाशरथि की मूल भावभूमि को उन्होंने आधुनिक संवेदना में पुनर्निर्मित किया है।  

शाक्त पदावली में देवी जहाँ मुख्यतः भक्त की व्यक्तिगत आराध्या के रूप में उपस्थित होती हैं, वहीं नज़रुल की देवी धीरे-धीरे सामाजिक और सामूहिक चेतना तक पहुँच जाती हैं। उनकी मातृ-वंदना में धार्मिक भावना के साथ-साथ देशभक्ति, समानता की चेतना और विद्रोही मानसिकता प्रबल होकर उभरती है :

तेरी बेटी अगर होती उमा,
समझती तू अपनी माँ की व्यथा।
जैसा पिता, वैसी ही बेटी,
इतनी भी नहीं तुझमें ममता॥

ओ माँ! क्या कोई है इस त्रिभुवन में
जो भूल सके इस चाँद-से मुख को?
मेरा घर-त्यागी जमाई भी
गाता है हरदम तेरी ही कथा॥

ओ माँ! दिन गिन-गिन, राह निहारूँ,
विरह-अनल में प्राण मेरे जलते।
तू यदि जानती मेरी यह पीड़ा, उमा,
तेरा पाषाण हृदय भी जाता पिघलते॥

तेरे आगमनी की बाँसुरी बजती,
निशिदिन मेरे हृदय के भीतर।
मैं रो-रोकर सबसे पूछती—
कब आएगी, देगी वह ख़बर?

नज़रुल का एक और महत्त्वपूर्ण गीत—“मत जा माँ, लौटकर मत जा”—विजया की चिरंतन वेदना को एक नए ढंग से अभिव्यक्त करता है। एक ओर वह “जय दुर्गा दुर्गतिनाशिनी”, “भवानी शिवानी दशप्रहरणधारिणी” जैसे देवी-महिमा के गीत रच रहे हैं; दूसरी ओर उमा को लेकर माँ की व्याकुलता, विसर्जन की वेदना और बेटी के प्रति स्नेह को भी स्वर दे रहे हैं। 

रामप्रसाद देवी को माँ के घर ले आए। कमलाकांत ने उनके मनोविज्ञान की खोज की। दाशरथि राय ने उनकी नाटकीय मानवीयता को और अधिक तीव्र बनाया और नज़रुल ने उस मानवीय देवी को आधुनिक युग की चेतना के साथ जोड़ दिया। फलतः दुर्गा केवल असुर-विनाशिनी बनकर नहीं रह गईं; वे बेटी का चेहरा, माँ की आँखों का आँसू, घर लौटने का आनंद, विदाई का शून्य और मनुष्य के प्रति मनुष्य के प्रेम की प्रतीक बन गईं।

शाक्त पदावली की सबसे बड़ी शक्ति यही है, यहाँ देवत्व मानवता का विरोधी नहीं है। देवी को जितना दूर रखा जाता है; वह उतनी ही अलौकिक प्रतीत होती हैं और उन्हें जितना निकट लाया जाता है, वह उतनी ही अपनी हो जाती हैं। 

देवी दुर्गा से मानवीय दुर्गा का यह जन्म किसी एक दिन में नहीं हुआ। यह अनेक कवियों की कल्पनाओं में, अनेक गायकों के कंठ में, अनेक परिवारों की स्मृतियों में और बंगाल के दीर्घ सांस्कृतिक अनुभव की गहराइयों में धीरे-धीरे घटित हुआ है। रामप्रसाद, कमलाकांत, दाशरथि राय और नज़रुल इस यात्रा के महत्त्वपूर्ण निर्माताओं में हैं। 

इसी प्रकार सदियों से बंगाल की शाक्त पदावली में देवी दुर्गा धीरे-धीरे एक मानवीय दुर्गा में रूपांतरित होती गई हैं। वह देवी से कन्या बनीं, कन्या से माँ बनीं और माँ से फिर मनुष्य की प्रतिच्छवि बन गईं। उनके दस हाथों में अस्त्र-शस्त्र हैं, लेकिन उनकी आँखों में माँ के आँसू भी हैं। उनका वाहन सिंह है, लेकिन उनके पास माँ का आँचल भी है। वह असुर का वध करती हैं और फिर माँ की गोद में लौट आती हैं। वह महामाया हैं और फिर मेनका की उमा भी हैं।

विदाई के समय माँ की आँखें बेटी के पीछे-पीछे दूर तक जाती हैं। घर की देहरी पार कर जाने के बाद भी बेटी की आहट घर में बनी रहती है। उसकी ख़ाली जगह, उसकी स्मृतियाँ और उसके लौटने की आस में माँ दिन काटती हैं। फिर जब उमा आती है वापस, सूने आँगन में बेटी की हँसी लौट आती है और माँ के भीतर महीनों से थमी हुई साँस फिर से चलने लगती है। उसके स्वागत में पकवान सजते हैं, थाली में मछली-मांस, भात-पुलाव और मिष्टी-दही परोसे जाते हैं। यह देवी के लिए सिर्फ़ भोग भर नहीं, उस बेटी के लिए माँ का मनुहार है जिसे वह अपने हाथों से खिलाकर जी भर देख लेना चाहती है। दुनिया उसे जगज्जननी कहे, माँ के लिए वह आज भी वही उमा है जिसे विदा करते समय उसने जाने कितनी हिदायतें दी होंगी और जिसके लौटने पर सबसे पहले यही पूछा होगा, “बेटी, तू ठीक तो है?”

शायद इसीलिए उमा का आना जितना उत्सव है, उसका जाना उतना ही विषाद। कुछ दिनों के लिए घर में लौटी बेटी फिर विदा होती है और माँ एक बार फिर उसी प्रतीक्षा के हवाले हो जाती है। देवत्व की विराटता के भीतर मनुष्यता का यह छोटा-सा दुख कितना बड़ा है! देवी को अपने घर की बेटी मान लेना, उसके लिए पकवान बनाना, उसे अपने पास बिठाकर खिलाना और फिर भारी मन से विदा करना... क्या यह भक्ति की कोई कम सुंदर अभिव्यक्ति है? यहाँ माँ देवी के सामने सिर झुकाती भी है और उसे अपने आँचल में छिपा लेना भी चाहती है। वह जानती है कि उमा जगत् की जननी है, फिर भी उसके भीतर की माँ अपनी बेटी को कुछ और देर रोक लेना चाहती है। शायद प्रेम का सबसे गहरा सच यही है कि जिसे हम पूजते हैं, उसे भी खोने से डरते हैं और जिसे विदा कर देते हैं; उसकी प्रतीक्षा में अपना पूरा घर, अपना पूरा हृदय खुला छोड़ देते हैं। 

अब आप ही बताइए कि जिस उमा को बंगालियों ने अपने घर की बेटी मानकर माँ के स्नेह से अपनाया; उसके स्वागत में मछली-मांस, भात-पुलाव और मिष्टी-दही परोसना क्या सचमुच कोई दोष है? या फिर देवी को अपने इतने निकट ले आना ही उस मानवीयता की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति है, जिसमें देवत्व और मनुष्यता एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं?

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इस स्तंभ में प्रस्तुत कविता-पंक्तियों का बांग्ला से हिंदी अनुवाद लेखिका द्वारा ही। अन्य C/O बंगाल यहाँ पढ़िए : C/O बंगाल

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