C/O बंगाल : विनय मजूमदार : गणित, जुनून और प्रेम
बेबी शॉ
02 नवम्बर 2026
“तुम्हारा Review कर दिया है हाल ही में। इसके अलावा एक Manifesto भी खड़ा कर दिया है, Hungry Generation... बांग्ला में ‘क्षुत्कातर सम्प्रदाय’। हर तरह की भूख की बात कही गई है।”
हंगरी जेनरेशन की शुरुआत के संबंध में एक और रोचक जानकारी विनय मजूमदार को लिखे शक्ति चट्टोपाध्याय के एक पत्र से मिलती है। 1 अगस्त 1962 को लिखे इस पत्र में शक्ति लिखते हैं कि विनय मजूमदार [1934-2006] के काव्य-संग्रह ‘गायत्रीके’ की कविताओं पर विचार करते हुए ही शक्ति चट्टोपाध्याय के मन में ‘भूख’ का विचार आया। इसी विचार से धीरे-धीरे ‘क्षुधार्त आंदोलन’ या हंगरी आंदोलन की अवधारणा जन्म लेती है, शक्ति चट्टोपाध्याय के वक्तव्य में ऐसे ही एक महत्वपूर्ण सूत्र का संकेत मिलता है।
विनय मजूमदार के ‘गायत्रीके’ संग्रह की कविताओं में जो नई भाषा, प्रेम को लेकर एक अद्भुत अनुभव तथा प्रचलित साहित्यिक संरचनाओं को तोड़कर एक नई सृजनात्मक अभिव्यक्ति की तीव्र आकांक्षा दिखाई देती है; वह एक प्रकार की ‘भूख’ ही थी। यह भूख भोजन या जीवन की भौतिक आवश्यकताओं तक सीमित नहीं थी; इसके भीतर भाषा, प्रेम, अनुभव और साहित्य को नए ढंग से देखने और अभिव्यक्त करने की बेचैनी भी ज़बरदस्त ढंग से शामिल थी।
इस पत्र से स्पष्ट होता है कि ‘हंगरी जेनरेशन’ की अवधारणा के आरंभिक निर्माण में ‘भूख’ को एक व्यापक और बहुस्तरीय रूपक के रूप में देखा गया था। यह भूख जीवन, प्रेम, भाषा, साहित्य और एक नई सृजनात्मक चेतना की भूख थी।
हम देखते हैं कि एक कवि प्रेम के लिए, गायत्री नाम की किसी लड़की के लिए, एक के बाद एक अद्भुत कविताएँ लिख रहे हैं :
दर्पण में प्रतिबिम्बित सूर्य का प्रकाश थोड़ी देर ही मुस्कुराता है।
हे शिक्षालय के निकट खड़े, निश्चल, स्निग्ध देवदारु,
जिह्वा पर घुले हुए नमक के कणों की तरह
क्या बिखरता है, कौन बिखेरता है; सुनो, कैसी अस्पष्ट ध्वनि, सुनो—
“कहाँ, कहाँ हो तुम, कहाँ हैं तुम्हारे पंख, श्वेत पक्षी-माता?
यह जो यहाँ जन्म हुआ—क्या यही वह लोककथाओं में कहा गया घोंसला है, या मिट्टी?
घोंसला है या मिट्टी—इस अपारदर्शी, मृत्युमय शीत से भरी दुनिया में...”
तुम वृक्ष हो, अज्ञान से भरे, मृत्यु के क्लिष्ट समाचार से अनजान।
फिर भी अब यह स्वर सुनो, इससे अवगत हो जाओ।
स्वस्थ मिट्टी की अपेक्षा समुद्र कहीं अधिक संकटपूर्ण हैं,
और उनसे भी अधिक संकटों से भरा है
नीलिमा में धुला हुआ यह विविध आकाश।
यह सत्य जानते हुए भी हम समुद्र और आकाश में
विचरण करना चाहते हैं, सदा से उसके आकांक्षी रहे हैं,
क्योंकि हर प्रकार के ज्वर से सिर धो लेना हमें अच्छा लगता है।
फिर भी आज तक क्यों, हाय हँसी, हाय देवदारु—
मनुष्य निकट आते ही प्रकृत सारस उड़ जाता है!”
‘गायत्रीके’ विनय मजूमदार का दूसरा काव्य-संग्रह है। इस संग्रह में कुल सोलह कविताएँ थीं। शक्ति चट्टोपाध्याय इन कविताओं को पढ़ते-पढ़ते प्रेम के प्रति जिस ‘भूख’ को महसूस करते हैं, उसी भूख को बाद में वह ‘हंगरी जेनरेशन’ के घोषणापत्र में एक अलग अर्थ और आयाम प्रदान करते हैं। आगे चलकर विनय मजूमदार ने ‘गायत्रीके’ को और विस्तृत रूप दिया। कुल 77 कविताओं को लेकर उन्होंने ‘फिरे एसो, चाका’ की रचना की और यही संग्रह बांग्ला कविता में प्रेम की एक अद्भुत काव्य-पुस्तक के रूप में सामने आया। लेकिन यह गायत्री कौन थी? आख़िर किसे संबोधित करके विनय ने इतनी सारी अद्भुत कविताएँ लिख डालीं?
...उस समय विनय की उम्र अट्ठाईस वर्ष थी।
‘फिरे एसो, चाका’ प्रकाशित हो चुका था। लेकिन गायत्री मानो उनके लिए एक जुनून बन चुकी थीं। अपने एकमात्र कवि-मित्र शक्ति चट्टोपाध्याय से विनय दुर्गापुर से गायत्री का पता पूछ रहे थे। इसके उत्तर में शक्ति ने लिखा :
“गायत्री का पता मैं सुनील के भरोसे न रहकर स्वयं जुटाने की कोशिश कर रहा हूँ और जुटा ही लूँगा। एक सप्ताह के भीतर तुम्हें उसका पता मिल जाएगा—यह मेरा वादा है। केया नाम की एक लड़की को भी खोज रहा हूँ। उससे मेरा परिचय भी है, मुलाक़ात होते ही पता माँग लूँगा।”
एक अन्य पत्र में शक्ति लिखते हैं :
“दो दिनों तक केया से मिलने गया था, लेकिन मुलाक़ात नहीं हो सकी। फिर भी अगले सप्ताह उससे मिलकर पता हासिल कर लूँगा। तुम इस विषय में सुनील को कुछ मत लिखना।”
इसका अर्थ है कि संभवतः विनय ने सुनील को भी इस संबंध में लिखा था और सुनील गंगोपाध्याय इससे परेशान या असहज हो गए थे। शायद इसी कारण शक्ति बार-बार विनय को सावधान कर रहे थे। विनय ने और भी कई लोगों को पत्र लिखे थे। धनबाद निवासी एक व्यक्ति, सलिल चक्रवर्ती, जिनका गायत्री से दूर का पारिवारिक संबंध था, उन्हें भी विनय ने पत्र लिखा। सलिल चक्रवर्ती ने उत्तर दिया :
“उसका पता मुझे मालूम नहीं है, लेकिन सुना है कि वह अमेरिका चली गई है। लेकिन मेरा सवाल है कि आपको गायत्री की आवश्यकता क्यों है? क्या आप उससे प्रेम करने लगे हैं? मैं तो यही कहूँगा कि उसके बारे में आपकी जिज्ञासा न ही रहे तो बेहतर है।”
इससे स्पष्ट होता है कि गायत्री को लेकर विनय की यह उत्कट खोज सिर्फ़ एक सामान्य साहित्यिक जिज्ञासा भर नहीं रह गई थी। उनके लिए गायत्री धीरे-धीरे कविता, प्रेम, स्मृति और निजी आकांक्षा सबके केंद्र में स्थित एक रहस्यमय उपस्थिति बन चुकी थीं। यह उन्माद किस सीमा तक स्वाभाविक था, यह प्रश्न फिर भी अनुत्तरित नहीं रहता।
विनय की विभिन्न डायरियों पर नज़र डालें तो वहाँ असंबद्ध बातचीत से भरे हुए पन्ने दिखाई देते हैं... जहाँ एक ही बात बार-बार लिखी गई है। यहाँ तक कि अपनी ही पुस्तक की कविताओं की पंक्तियों में परिवर्तन करते हुए वह कभी-कभी ऐसे शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं, जिन्हें सभ्य समाज में इस्तेमाल करने योग्य नहीं माना जाता, जिन्हें अश्लील कहा जा सकता है। किसी स्वस्थ और सामान्य व्यक्ति से इस तरह के लेखन की अपेक्षा नहीं की जाती। फिर 1962 की डायरी के पन्नों में कहीं नीचे गणित के सूत्र हैं और ऊपर लिखा है—‘भालोबासा अबशिष्ट नेइ’ यानी ‘प्रेम शेष नहीं है’; अथवा—‘घर से भूलवश बाहर निकल आया कोई बच्चा / रास्ते में खो गया है, वह अपना पता नहीं जानता।’ भला कौन नहीं जानता कि विनय की इस आलोकित उन्माद भरी दुनिया में गणित के सूत्र और कविता साथ-साथ दौड़ते थे!
विनय मजूमदार का एक गीत :
X = 0
और Y = 0
या X = 0 = Y
या X = Y
शून्य 0 से प्राणी X और Y का सृजन हुआ,
इसी तरह विश्व-सृष्टि का आरंभ हुआ था।
विनय के समकालीन अनेक लोगों से हमें पता चलता है कि यह गायत्री दरअस्ल पचास के दशक के अंतिम वर्षों में प्रेसिडेंसी कॉलेज की मेधावी छात्रा गायत्री चक्रवर्ती थीं, जो आगे चलकर गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक के नाम से विश्वविख्यात हुईं। फ़्रांसीसी दार्शनिक ज़ाक देरिदा की पुस्तक Of Grammatology का फ़्रांसीसी से अँग्रेज़ी में अनुवाद, ‘डिकंस्ट्रक्शन’ या ‘अविनिर्माण’ के सिद्धांत की व्याख्या, गायत्री बांग्ला में ‘विनिर्माण’ के बजाय ‘अविनिर्माण’ शब्द को प्राथमिकता देती हैं और महाश्वेता देवी के साहित्य को अँग्रेज़ी भाषा के माध्यम से विश्व-पटल पर प्रतिष्ठित करने तक, गायत्री स्वयं आज एक उत्कृष्ट बौद्धिक उपलब्धि का नाम हैं।
लेकिन उस समय विनय की उनसे ठीक से पहचान तक नहीं हुई थी। फिर भी उनके लिए विनय ने उन्माद की सारी सीमाएँ पार कर दीं। एक समय तो उन्होंने गायत्री को ‘ईश्वरी’ के रूप में स्थापित कर दिया, जिससे ऐसा प्रतीत हो सकता है कि विनय की ‘ईश्वरी’ और गायत्री एक ही हैं :
जाने दो, फिर जल जाने दो, जलस्तंभ, फटा घाव, हृदय।
सारी शांति दूर रहे, सारी तृप्ति—सब कुछ भूल जाएँ।
बस उसकी पीड़ा से भरा रहे हृदय और शरीर।
उसकी नाव-सी लंबी आँखों में था सागर का
गहरा आह्वान, छाया, मेघ, झंझा, आकाश, हवा।
काँटों की चोट देने वाले फूल की स्मृति की तरह
दीर्घस्थायी था उसका चिंतन; पहली मिलन-बेला में फटी
त्वचा की जलन की तरह गुप्त, मधुर थी यह पीड़ा।
जाने दो, सब जल जाने दो, जलस्तंभ, फटा घाव, हृदय।
[22 जून 1962, ‘फिर लौट आओ, चक्का’, विनय मजूमदार]
हालाँकि एक और गायत्री का भी उल्लेख मिलता है। विनय कुछ समय तक हिंदू हॉस्टल के निवासी रहे थे। उस समय वहाँ के सुपरिटेंडेंट थे प्रोफ़ेसर जनार्दन चक्रवर्ती। उनकी बेटी का नाम भी गायत्री था, यद्यपि वह उम्र में विनय से काफ़ी छोटी थीं। जिस समय विनय हिंदू हॉस्टल में रह रहे थे, उस समय उस युवती की उम्र लगभग चौदह-पंद्रह वर्ष रही होगी। लेकिन यह कहानी इससे आगे नहीं बढ़ी।
विनय एक विलक्षण गणितज्ञ थे। उनके पूरे कमरे में कोयले से की गई लकीरें, रेखाचित्र, लिखावट और गणित के सूत्र बिखरे रहते थे। वह वास्तव में गहरे गणित-मस्तिष्क वाले व्यक्ति थे। उनकी निजी डायरी के पन्ने तरह-तरह के गणितीय विश्लेषणों से भरे हुए हैं, जिनमें से अधिकांश का कोई स्पष्ट व्यावहारिक उद्देश्य नहीं था और उन्हीं गणितीय विवेचनों के बीच, कभी-कभी तारीख़ डालकर कविताओं के प्रारूप भी लिखे गए हैं। बांग्ला साहित्य में वह शायद ऐसे विरल कवि हैं, जिन्होंने गणित को कविता में रूपांतरित कर दिया। उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की, इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट में काम किया और त्रिपुरा गवर्नमेंट कॉलेज में अध्यापन भी किया। अर्थात् जीवन में स्थापित और पारंपरिक सफलता की राह उनके सामने खुली हुई थी। लेकिन कविता तक पहुँचते-पहुँचते उन्होंने जैसे स्वयं उस राह को अस्वीकार कर दिया।
किसी मनुष्य के जीवन में कभी-कभी ऐसा क्षण आता है, जब उसके लिए जीविका और जीवन एक ही चीज़ नहीं रह जाते। विनय के मामले में कविता उस दूसरे जीवन में बदल गई थी और उस दूसरे जीवन में प्रवेश करने का द्वार था—प्रेम!
गणित ने उन्हें निरीक्षण करने की आदत दी थी, किसी चीज़ को केवल ‘सुंदर’ कहकर रुक जाने के बजाय उसकी संरचना, उसके संबंध, अनुपात, परिवर्तन और नियमों को तलाशना। उनकी कविताओं में प्रकृति के दृश्य कई बार किसी वैज्ञानिक के field observation की तरह सामने आते हैं। उनकी ऐसी कविताओं का उल्लेख मिलता है, जहाँ steam engine के crank, connecting rod और slide की गति को ज्यामितीय संबंधों के माध्यम से देखा और रूपायित किया गया है।
यहीं विनय बांग्ला-कविता में एक अलग और विशिष्ट उपस्थिति बन जाते हैं। जीवनानंद दास ने प्रकृति को एक गहरे अस्तित्व-बोध के आलोक में देखा था और विनय प्रकृति के भीतर भी जैसे किसी अदृश्य सूत्र की तलाश करना चाहते थे। उनके लिए संसार रहस्यमय था, लेकिन उस रहस्य को महसूस कर लेना पर्याप्त नहीं था; उसे देखना, परखना और उसका निरीक्षण करना आवश्यक था।
क्या रोमांच अब भी है; गाँव में अँधेरे में नींद खुलने पर
जब देह के ऊपर से ठंडे साँप के गुज़रने का एहसास हुआ,
जो रोमांच उतर आया था, रुद्ध श्वास, पसीने से भीगा-भीगा।
सर्पिणी, तुम नहीं समझीं, यह देह किसकी है, किसका यह प्राण।
अचानक उदित होता है समुद्री हंसिनी का शुभ्र गीत
स्वर और सुर एक होकर काँप उठते हैं वायु में, मानो तुषार-सी ठंड में,
वह रो पड़ती है, चाँदनी की कोमल ऊष्मा पाने को व्याकुल होती है।
रोमांच तो अब भी रह गए ठंडे साँप के स्पर्श में घुला हुआ।
और फिर आया प्रेम... उसने उन्हें तहस-नहस कर दिया। तोड़ा। फिर बनाया। प्रेम, कविता और गणित में डूबा रहने वाला यह मनुष्य जीवन का गणित नहीं मिला सका। जीवन की लय भी उसके हाथ नहीं आई... और अपने साथ उस अधूरे, अप्राप्य प्रेम को लेकर वह धीरे-धीरे एक ऐसी अद्भुत दुनिया में प्रवेश कर गए; जहाँ संवेदना, तर्क, गणित और कविता की सीमाएँ एक-दूसरे में घुलने लगीं।
वह दुनिया जिसे जीवन को गणित की तरह व्यवस्थित करके जीने वाला सामान्य मनुष्य अक्सर ‘पागलपन’ कहता है, विनय ने उसे अपनी कविता और जीवन की विशिष्ट वास्तविकता में बदल दिया।
•••
इस स्तंभ में प्रस्तुत कविता-पंक्तियों और पत्रांशों का बांग्ला से हिंदी अनुवाद लेखिका द्वारा ही। अन्य C/O बंगाल यहाँ पढ़िए : C/O बंगाल
'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए
कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें
आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद
हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे
बेला पॉपुलर
सबसे ज़्यादा पढ़े और पसंद किए गए पोस्ट