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आनंद बहादुर के नए कविता संग्रह पर हुई परिचर्चा : जिसमें संगीत भी था, बात भी थी, लोकार्पण भी था और कविताएँ भी

यह सब कुछ शुरू हुआ शनिवार की रात एक इंस्टाग्राम स्टोरी से। नई पीढ़ी के कवि-लेखक और कलमशाला प्रकाशन के संपादक आशुतोष प्रसिद्ध ने एक स्टोरी लगाई थी कि दो दिनों के लिए रायपुर में हूँ। मैं शनिवार की आधी रात को स्टोरी देख रही थी। उसे लगे हुए सोलह घंटे हो चुके थे। बस, फिर क्या था! मैंने सवालों की झड़ी लगा दी, “कब से आए हो?” “पहले क्यों नहीं बताया?” “कहाँ रुके हुए हो?” “किस काम से आए हो?”

इसके बाद जाकर पता चला कि रायपुर में सुपरिचित कवि-लेखक-अनुवादक आनंद बहादुर के कविता-संग्रह ‘बाहर भी एक भीतर है’ पर परिचर्चा का एक आयोजन है। यह पुस्तक आई है कलमशाला प्रकाशन से! इसके बाद आशुतोष ने मुझे इस आयोजन के लिए आमंत्रित किया और पता भी भेज दिया और मैं अगले दिन फिंगेश्वर ज़िला गरियाबंद से रायपुर पहुँच गई।

मुझे कुछ काम भी निपटाने थे; इसलिए मैं जब तक आयोजन-स्थल विमतारा भवन पहुँची, तब तक कार्यक्रम शुरू हो चुका था। पहला सत्र था ‘नाद ब्रह्म’ जिसमें गायक नई पीढ़ी के कवि-गायक वसु गंधर्व ने अपने शास्त्रीय गायन से सबका मन मोह लिया होगा। यह सुनने लायक़ प्रस्तुति थी—राग जोग में ख़याल और ठुमरी गायन। तबले पर संगत कर रहे थे तालमणि अशोक कुर्म। दोनों ने मिलकर कितना सुंदर समाँ बाँधा होगा! श्रोतागण एकदम मंत्रमुग्ध हो गए होंगे, लेकिन मैं सुन नहीं पाई। रोज़-रोज़ थोड़ी न लाइव शास्त्रीय संगीत सुनने को मिलता है, पर मैं हमेशा देर कर देती हूँ। इस बार भी वही हुआ। मेरे पहुँचने से पहले ही यह सत्र ख़त्म हो चुका था।

ख़ैर, कार्यक्रम आगे बढ़ा होगा। अगले चरण में लोकार्पण हुआ और फिर कार्यक्रम वक्तव्य सत्र की ओर बढ़ा। ‘बात बोलेगी’ का यह सत्र कवि आनंद बहादुर के नए कविता-संग्रह ‘बाहर भी एक भीतर है’ पर केंद्रित था, जिस पर वक्ताओं ने खुलकर अपने विचार रखे।

सुपरिचित कवि-लेखक एवं ‘हिन्दवी’ के संपादक अविनाश मिश्र ने इन कविताओं की आमद की तरफ़ संकेत किया और इन्हें ‘निर्भार’ कविताएँ बताया। उन्होंने आनंद बहादुर के व्यक्तित्व और कृतित्व कीई भावुकता की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि काम करने वाले लोगों की आँखों में ही सच्चे आँसू आते हैं।  

मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित सुप्रसिद्ध कवि केशव तिवारी ने कहा, “ये ऐसी कविताएँ हैं, जो जीवन की सहज अभिव्यक्ति का पूरी स्वाभाविकता के साथ निर्वाह करती हैं।” उन्होंने संग्रह से पाँच कविताओं का पाठ भी किया।

सुपरिचित कथाकार और आलोचक प्रभु नारायण वर्मा ने अपने विचार रखते हुए कहा कि ये आनंद के जीवन की कविताएँ हैं। आनंद ने साहित्यिक राजनीति और संगठनबाज़ी से हमेशा दूरी बनाए रखी और जीवन भर पूरी निष्ठा के साथ साहित्य-साधना, अनुवाद और कथा-सृजन में तल्लीन रहे। उन्होंने उम्मीद जताई कि आनंद आगे भी इसी तरह लिखते रहेंगे।

सत्र की अध्यक्षता कर रहे सुप्रसिद्ध कवि-आलोचक दिनेश कुशवाह ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कविताओं के बहुआयामी संसार पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ये कविताएँ साधारण शब्दों के माध्यम से असाधारण बात कह देने का सामर्थ्य रखती हैं।

वक्तव्य सत्र के बाद आनंद बहादुर द्वारा अनूदित विश्व साहित्य की दस कालजयी कहानियों के संग्रह ‘दस द्वार’ का विमोचन किया गया। यह पुस्तक भी कलमशाला से ही प्रकाशित हुई है। 

इसके बाद ‘कविमनीषी परिभूः स्वयम्भू’ शीर्षक से काव्य-पाठ का सत्र शुरू हुआ। यह दिन का अंतिम और सबसे ऊर्जावान सत्र था। इसमें दिनेश कुशवाह, केशव तिवारी, अविनाश मिश्र, आशुतोष प्रसिद्ध, आलिम नक़वी, पीयूष कुमार और इमरान अब्बास जैसे प्रतिष्ठित कवियों ने अपनी चुनिंदा रचनाओं का पाठ किया।

पीयूष कुमार की एक कविता थी—‘सिलियारी के फूल’। उसे सुनते ही मुझे अपने खेत याद आ गए। खेत की मेड़ पर उगे सफ़ेद-गुलाबी सिलियारी के फूल याद आ गए। गोवर्धन पूजा की याद आ गई। कुछ कविताएँ जाने कहाँ से होकर आती हैं और सीधे हमें अपने भीतर के किसी पुराने, लगभग भुला दिए गए कोने तक पहुँचा देती हैं।

अविनाश मिश्र की ‘प्रधानमंत्री से प्रेम की कविता’ सुनकर तो व्यंग्य की वास्तविक तासीर समझ आई। इमरान अब्बास की ग़ज़ल के कुछ शे’र भी बड़े लाजवाब थे। 

केशव तिवारी की ‘बेरोज़गारी में इश्क़’ और दिनेश कुशवाह की कविता ‘सोच लीजिए’ भी इस अवसर पर बहुत मन से सुनी गईं।   

काव्य-पाठ के बाद आशुतोष ने आभार प्रदर्शन किया और सभा का समापन हुआ। रिफ़्रेशमेंट के लिए सब सेमिनार हॉल से बाहर आ गए। एक-दूसरे से मिलने, बातचीत करने और तस्वीरें खिंचवाने का सिलसिला शुरू हो गया। साहित्यिक कार्यक्रमों का यह भी एक दिलचस्प हिस्सा होता है—मंच पर कविताएँ और विचार, मंच के बाहर मुलाक़ातें और तस्वीरें... और इन सबके बीच कहीं किताबें भी होती हैं, जिनके बहाने इतने सारे लोग एक जगह जमा होते हैं।

लगभग साढ़े तीन घंटे तक चले इस आयोजन में रायपुर और आस-पास के साहित्य-संस्कृति से संबद्ध महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व उपस्थित रहे जिनमें जया जादवानी, जय प्रकाश, साधना रहटगांवकर, आलोक वर्मा, संजय गिजरे, मधु वर्मा, राजेंद्र चांडक, पी.सी. रथ, स्वराज करुण, श्रद्धा थवाइत, फ़ज़्ले अब्बास सैफ़ी, नंदकिशोर कंसारी, संजय श्याम, मनोहर मार्कंडेय, मंजू कोंचे, अनूप वर्मा, मनमोहन अग्रवाल, कैलाश शादाब, राजेश गनोदवाले, आकाश चंद्रवंशी, विवेक रहटगांवकर, राजेंद्र कुमार, श्रुति सिंह, विष्णु साहू के नाम प्रमुख हैं।

इस आयोजन में शामिल होने के बाद मुझे पता चला कि लेखक बनना आसान नहीं है! कितने काँटों पर चलना पड़ता है। अपने भीतर एक मज़बूत और जुझारू व्यक्तित्व विकसित करना पड़ता है, जो समाज में उठते-बैठते मिलने वाली आलोचनाओं को झेल सके और तारीफ़ मिलने पर एकदम हवा में भी न उड़ने लगे। आलोचना सुनकर इतना न टूटे कि लिखना छोड़ दे और प्रशंसा सुनकर इतना न फूल जाए कि ख़ुद को अपने समय का सबसे बड़ा लेखक समझने लगे। 

इस संदर्भ में अंत में यह भी जोड़ना ही होगा कि स्थानीय स्तर की सतही साहित्यिक राजनीति जो प्राय: विचारवानों नहीं दलालों के द्वारा संचालित होती है, वह कुछ लोगों को एक अच्छी परिचर्चा और कविताओं से कैसे दूर कर देती है, यह आयोजन इसका भी उदाहरण है। यहाँ जिन्हें मंच पर होना था, वह दलालों के बहकावे में आकर अपनी पूरी समझ को स्वाहा करके व्यक्तित्वहीन हो उठते हैं; यह भूलकर कि कुछ भी किसी के लिए रुकता नहीं है, वह होता है और सफल होता है : जैसे कि यह आयोजन...

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आनंद बहादुर का कविता-संग्रह और उनके द्वारा अनूदित विश्व की दस कालजयी कहानियों की पुस्तक यहाँ से प्राप्त करें : बाहर भी एक भीतर है | दस द्वार

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