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प्रतिलेख : ‘अगम बहै दरियाव’ पर वागीश शुक्ल की आलोचना के बारे में कुछ तथ्य

गत 6 अक्टूबर को ‘बेला’ पर ‘अगम बहै दरियाव’ (शिवमूर्ति, राजकमल प्रकाशन, द्वितीय संस्करण : 2024, पृष्ठ 560-561) पर वागीश शुक्ल का एक आलोचनात्मक आलेख प्रकाशित हुआ। इसे पढ़कर शिवमूर्ति ने अपना पक्ष रखा है, हम इसे प्रकाशित कर रहे हैं।

1. यह देखकर चकित हूँ कि आदरणीय वागीश शुक्ल जी ने इस उम्र में मेरा 586 पृष्ठ का उपन्यास पढ़ डाला। न सिर्फ़ पढ़ा, बल्कि उस पर एक विस्तृत सम्मति भी दर्ज कर डाली। मैं उनके प्रति अपना आभार व्यक्त करता हूँ।

2. कुछ बिंदुओं की ओर उन्होंने ध्यान आकृष्ट किया है। जहाँ ज़रूरी लग रहा है, मैं स्पष्ट कर देता हूँ।

3. शुक्ल जी ने कहा है कि तूफ़ानी अपना उपनाम सरोज लिखता है जो पासी बिरादरी के लोग लगाते हैं, जबकि तूफ़ानी पासी बिरादरी का नहीं है।

वास्तव में तूफ़ानी पासी बिरादरी का ही है जो उपन्यास के टेक्स्ट से शुरू से अंत तक स्पष्ट है।

4. शुक्ल जी ने कहा है कि हिंदुओं की बरात में मुसलमान भी जाते हैं, तब खेलावन के बेटे की बारात में मियाँ टोले से मुसलमान क्यों नहीं गए?

उपन्यास के टेक्स्ट से ही स्पष्ट है कि बनकट गाँव में एक भी मुसलमान नहीं है। जो मुसलमान पात्र हैं, वे जंगू के ननिहाल के गाँव वाले मियाँ टोले के हैं। जब खेलावन के गाँव में मुसलमान हैं ही नहीं तो वे मुसलमान बराती कैसे ले जाते?

5. सारे पुलिसकर्मियों का सेलेक्शन रद्द हुआ था, तभी तो सारे बर्ख़ास्त सिपाही अपना संगठन बनाकर बहाली के लिए हाईकोर्ट में मुक़दमा लड़ रहे हैं।

6. शुक्ल जी ने उपन्यास में लिखे ‘उधिराना’ शब्द को ‘उधियाना’ पढ़ लिया और उसे अनाज ओसाने की क्रिया से जोड़ दिया। इसी से निष्कर्ष ग़लत निकाला गया।

वास्तव में ‘उधिराने’ का आशय आतंक फैलाने, बदमाशी करने से है। गीतकार कहता है कि जैसे पहले सुल्ताना डाकू उधिराया था, वैसे ही अब जंगू उधिराया है।

7. शुक्ल जी ने यह माना है कि बैताली जिस हस्तलिखित पुस्तिका को पढ़ रहा है; उसी में सुल्ताना डाकू के उल्लेख वाला गीत भी है और वह चौबोला भी है जिसमें नफ़रत की काली रात के ख़त्म होने की आकांक्षा का उल्लेख है, जबकि यह निष्कर्ष ग़लत है। जो पुस्तिका बैताली के हाथ में है, उसमें सुल्ताना और जंगू का ही उल्लेख है। नफ़रत की काली रात ख़त्म होने की आकांक्षा जिस पुस्तिका में है; वह दूसरी है, जिसे खोज कर देने का वादा तूफ़ानी बैताली से करता है।

8. शुक्ल जी ने इस बिंदु की ओर ध्यान आकर्षित किया है कि जब छत्रधारी की पत्नी के नाम ज़मीन का फ़र्ज़ी बैनामा कराया गया तो उस पर उनकी पत्नी के भी फ़र्ज़ी हस्ताक्षर होंगे। तब पूरे उपन्यास में उनसे कोई पूछताछ क्यों नहीं हुई?

वास्तव में पहले बैनामे के काग़ज़ात पर केवल विक्रेता के हस्ताक्षर होते थे। क्रेता के हस्ताक्षर नहीं होते थे। लेकिन जब तमिलनाडु में TANSI (Tamilnadu Small Industries Corporation) ज़मीन घोटाला हुआ और जयललिता की जिन नज़दीकी कंपनियों के नाम से ज़मीनें ख़रीदी गई थीं, वह जाँच में फँसने लगीं तो कह दिया कि हमें तो पता ही नहीं है कि किसने मेरे नाम ज़मीन लिख दी। तब सरकार ने क़ानून बनाया कि अब बयनामे के काग़ज़ात पर क्रेता के हस्ताक्षर भी ज़रूरी होंगे। यह व्यवस्था 2002 से लागू हुई है। छत्रधारी का बयनामा 1972 का है, इसलिए उनकी पत्नी का बयनामे पर हस्ताक्षर होने और उनसे पूछताछ का प्रश्न ही नहीं है।

9. शुक्ल जी प्रश्न करते हैं कि इस बात का जवाब नहीं मिलता कि शकुंतला का अपहरण करने से संतोखी को खेत पर क़ब्ज़ा कैसे मिल जाएगा और जंगू संतोखी को कैसे बाँसकोट से न्याय दिलाएगा। निश्चित रूप से या तो शुक्ल जी इस हिस्से को पढ़ नहीं पाए या भूल गए। अपनी पोती शकुंतला का अपहरण जंगू द्वारा कर लिए जाने की सूचना मात्र से छत्रधारी सिंह इतने आहत होते हैं कि उन्हें फ़ालिज मार जाता है और फिर वह कभी संतोखी के खेत की ओर झाँकने भी नहीं जाते। संतोखी बिना किसी प्रतिरोध के अपने खेत पर क़ाबिज़ हो जाते हैं। यह क़ब्ज़ा किसी कोर्ट के आदेश से नहीं जंगू के एक छोटे से रुक्के से हुआ।

10. शुक्ल जी ने पात्रों की आयु, कालखंड और रिश्तों पर भी विचार किया है। इस संबंध में यह कहना है कि उपन्यास के सारे पात्रों के जन्मवर्ष, शिक्षा, ब्याह, बाल-बच्चों और उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं का विस्तृत चार्ट बनाया गया है; ताकि तीन सौ से ज़्यादा पात्रों की जीवन-गाथा प्रस्तुत करते समय कोई तथ्यात्मक विसंगति सामने न आए।

11. यदि कोई वास्तविक चूक सामने आती है, तो उसे दुरुस्त करने में मुझे ख़ुशी होगी।

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शिवमूर्ति के इस प्रतिलेख पर वागीश शुक्ल का प्रतिउत्तर यहाँ पढ़िए : नाकर्दा गुनाहों की भी हसरत की मिले दाद

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