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क्षमा करो, किंतु हृदय से
क्षमा करो, किंतु हृदय से। भीतर गरम होकर अपारगतावशतः क्षमाशील होने मत जाओ।
श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र
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लोहा भले ही गरम हो जाए
सरदार वल्लभ भाई पटेल
तपाये जाने पर लोहा भी गरम हो जाता है
तपाये जाने पर लोहा भी गरम हो जाता है, शरीरधारियों की तो बात ही क्या।
कालिदास
ऐक अचंभा ऐसा भया
ऐक अचंभा ऐसा भया, उलटि स्याल सिंघ कू गह्या।बकरी उलटि चीता कू घेर्या, फिरि मूसै गही मजारी।
सेवादास
छांड़ो मेरे लाल अजहुँ लरकाई
छांड़ो मेरे लाल अजहुँ लरकाई।यही काल देखिकैं तोकों ब्याह की बात चलावन आई॥
परमानंद दास
लरिकाई को प्रेम कहौ अलि
लरिकाई को प्रेम, कहौ अलि, कैसे करिकै छूटत?कहा कहौं ब्रजनाथ-चरित अब अंतरगति यों लूटत॥
सूरदास
अपनी ज़िंदगी को
एक को छोड़ बीजा को भजै
एक को छोड़ बीजा को भजै रसनाज कटो उस लब्बर की।अब तो गुनियाँ दुनियाँ को भजै शिर बांधत पोट अटब्बर की।
गंग
एक जाति दूसरी को म्लेच्छ समझती है
हजारीप्रसाद द्विवेदी
ग़रीबी एक साहित्यिक मूल्य
साहित्यकार के हक़ में ग़रीबी को एक साहित्यिक मूल्य मान लिया गया है।
श्रीलाल शुक्ल
बहुपत्नीक पुरुष
वात्स्यायन
एक रूपदक्ष को एक छवि अथवा एक कविता लिखने
एक रूपदक्ष को एक छवि अथवा एक कविता लिखने के समय अक्लांत भाव से अनेक शक्तियों के प्रयोग करना पड़ता है।
अवनींद्रनाथ ठाकुर
व्यावहारिकता भाषा
व्यावहारिकता भाषा को एक तरह इस्तेमाल करती है, कला बिल्कुल दूसरी तरह और बिल्कुल अपनी तरह।