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गजानन माधव मुक्तिबोध के उद्धरण

सत् और असत् का विवेक नित्यशः इतना सीधा और सरल नहीं होता कि साहित्य-सृजन की जो वास्तविक जीवन-भूमि है, उससे उस वास्तविक जीवन-भूमि की विविध परिस्थितियों तथा प्रक्रियाओं से, साहित्यिक कलाकारों के बाह्य तथा अंतर्जीवन से—इन सबसे या इनमें से किसी एक से, असंपृक्त और संबंधहीन बनकर, उनके और अपने बीच लंबे-चौड़े फ़ासले क़ायम करके, वह समीक्षकीय सत्-असत्-विवक—एक अनिवार्यतः होने वाले परिणाम की भाँति अपने ही आप सत्य प्राप्त कर सके।