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कुँवर नारायण के उद्धरण

मुक्तिबोध की कविता जब चूकती है; तब भी वह मुझे एक फ़िल्म की तरह चूकती लगती है, मानो वे लंबे-लंबे अनकट रशेज़ हों जिनका कुशल संपादन अभी बाक़ी हो, या पढ़नेवाले पर छोड़ दिया गया हो।