कथाकार यदि सचमुच जीवन का गहरा और व्यापक ज्ञान रखता है, तो वह प्रसंग-स्थिति में बद्ध मनुष्य की संवेदनात्मक प्रतिक्रियाओं को ही महत्त्व नहीं देगा वरन् उस स्थिति से संबंध रखने वाले जो वस्तु-सत्य हैं, उनको बनाने वाले तत्त्वों पर अर्थात् व्यक्ति-स्वभाव की विशेषताओं, वास्तविकता की पेचीदगियों और अब तक चलते आए इन सबके विकास-क्रम पर, इन सब पर अवश्य ही ध्यान देकर, इस प्रसंग-स्थिति के वस्तु-सत्य के सारे ताने-बाने (कलात्मक प्रभावशाली रूप से, भोंड़े ढंग से नहीं) प्रस्तुत करेगा।