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दुर्गा भागवत के उद्धरण

धर्मानुसंधान तथा कलानुसंधान के लिए प्रज्ञा आवश्यक होती है और जहाँ जीवन का समग्रता से विचार करना होता है, वहाँ ईश्वर को प्रकृति से भिन्न नहीं समझा जा सकता।

अनुवाद : वासंतिका पुणतांबेकर