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गजानन माधव मुक्तिबोध के उद्धरण

अपने ही मन को फँसानेवाले रंगीन कुहरीले सपनों या भावों या विचारों की महान परंपरा पहले भी थी और आज भी है; किंतु अपना ही मन सोद्देश्य रूप से फँस जाता है और वे भी सोद्देश्य रूप से फँसा लेते हैं—मानो दोनों, फँसने-फँसाने के लिए तैयार बैठे हों।