Font by Mehr Nastaliq Web

विष्णु खरे के उद्धरण

आज के बहुत सारे, विशेषतः युवा कवि, ऐसा लगता है मानो बेंत लेकर जनता को प्रतिबद्धता तथा क्रांति पढ़ाने के लिए कमर कसे हुए हैं। यह जनता के प्रति घोर अविश्वास तथा, भगवान करे मैं ग़लत होऊँ, एक तरह की नफ़रत का निशान है।