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मोहन राकेश के प्रसिद्ध और सर्वश्रेष्ठ उद्धरण

मोहन राकेश के प्रसिद्ध

और सर्वश्रेष्ठ उद्धरण

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एक वस्तु का अपना प्राकृतिक गुण होता है। व्यक्ति का भी अपना प्राकृतिक गुण होता है। मूल्य व्यक्ति और वस्तु के प्राकृतिक गुण का लगाया जाकर प्राय: दूसरों की उस गुण को बेचने की शक्ति का लगाया जाता है।

मोहन राकेश

वह मुस्कराहट जो तहों में छिपे हुए मनुष्यत्व को निखारकर बाहर ले आती है, यदि सोद्देश्य हो तो, वह उसके सौंदर्य की वेश्यावृत्ति है।

मोहन राकेश

संसार में जितने धनी व्यक्ति हैं, उनमें से अधिकांश दलाली करके—वस्तु या व्यक्ति के गुण को बेचने में माध्यम बनकर धन कमाते हैं। यह दलाली वस्तु और व्यक्ति के वास्तविक मूल्यांकन और मूल्य ग्रहण में बाधा है।

मोहन राकेश

जिस हवा में फूल अपने पूरे सौंदर्य के साथ नहीं खिल सकता, वह हवा अवश्य दूषित हवा है। जिस समाज में मनुष्य अपने व्यक्तित्व का पूरा विकास नहीं कर सकता, वह समाज भी अवश्य दूषित समाज है।

मोहन राकेश

मैं अपनी हर सुबह अपने काम (लेखन) के लिए चाहता था, हालाँकि यह भी सच है कि नौकरी छोड़ने के बाद कोई ज़रूरी नहीं कि मैंने हर सुबह काम किया ही हो।

मोहन राकेश

अतीत कभी भविष्य के गर्भ से बचकर वर्तमान नहीं रह सका।

मोहन राकेश

द्वंद्व एक ही व्यक्ति तक सीमित नहीं होता, परिवर्तन एक ही दिशा को व्याप्त नहीं करता।

मोहन राकेश

हर आबाद शहर में कोई एकाध सड़क ज़रूर ऐसी होती है जो जाने किस मनहूस वजह से अपने में अलग और सुनसान पड़ी रहती है।

मोहन राकेश

न्याय, जो सदियों से नस्लों और परंपराओं का सामूहिक कृत्य है, यदि एक व्यक्ति के वर्तमान में रहने से अपने लिए आशंका देखता है, तो वह न्याय जर्जर और गलित आधार का न्याय है।

मोहन राकेश

एक व्यक्ति को इसलिए फाँसी की सज़ा दे दी जाती है कि वह व्यक्ति न्याय-रक्षा के लिए ख़तरा है। वह व्यक्ति जो न्याय-रक्षा के लिए ख़तरा हो सकता है, वह नि:संदेह उस न्याय से अधिक शक्तिवान होना चाहिए।

मोहन राकेश

मनुष्य को फाँसी देकर नष्ट करना वहशत ही नहीं, पागलपन भी है। यह पागलपन और वहशत डरे हुए हृदय के परिणाम होते हैं जो अपने पर विश्वास और नियंत्रण खो देता है।

मोहन राकेश

मैं महज़ एक इंट्रोवर्ट था जो कि स्थितियों को किसी किसी तरह बदलने के फेरबदल में लगा रहता था।

मोहन राकेश

किसी भी अपरिचित व्यक्ति से, चाहे उसकी भाषा, उसका मज़हब, उसका राजनीतिक विश्वास तुमसे कितना ही भिन्न हो, यदि मुस्कराकर मिला जाए तो जो तुम्हारी ओर हाथ बढ़ाता है, वह कोरा मनुष्य होता है।

मोहन राकेश

समय सदा दिन के साथ और अगले कल का साथ देता है।

मोहन राकेश

जहाँ तक चलते जाने का प्रश्न है, चलते जाया जा सकता है। परंतु जहाँ ठहरने का प्रश्न आता है, वहाँ बहुत-सी अपेक्षाएँ जाग्रत हो उठती हैं और उन सबकी पूर्ति असंभव होने से, फिर चल देने की धुन समा जाती है।

मोहन राकेश

वर्षों का व्यवधान भी विपरीत को विपरीत से दूर नहीं करता।

मोहन राकेश