आचार्य रामचंद्र शुक्ल का आलोचनात्मक लेखन
आदिकाल
आदिकाल प्रकरण 1 सामान्य परिचय प्राकृत की अंतिम अपभ्रंश अवस्था से ही हिंदी साहित्य का आविर्भाव माना जा सकता है। उस समय जैसे 'गाथा' कहने से प्राकृत का बोध होता था वैसे ही 'दोहा' या 'दूहा' कहने से अपभ्रंश या प्रचलित काव्यभाषा का पद्य समझा जाता था। अपभ्रंश
सगुणधारा (कृष्णभक्ति शाखा)
पूर्व मध्य काल : भक्ति काल (संवत् 1375-1700) प्रकरण 5 सगुणधारा कृष्णभक्ति शाखा 1. श्रीबल्लभाचार्य जी—पहले कहा जा चुका है कि विक्रम की पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी में वैष्णव धर्म का जो आंदोलन देश के एक छोर से दूसरे छोर तक रहा उसके श्रीबल्लभाचार्य
उत्तर मध्यकालः रीतिकाल (संवत् 1700-1900)
प्रकरण 1 सामान्य परिचय हिंदी काव्य अब पूर्ण प्रौढ़ता को पहुँच गया था। संवत् 1598 में कृपाराम थोड़ा-बहुत रसनिरूपण भी कर चुके थे। उसी समय के लगभग चरखारी के मोहनलाल मिश्र ने 'शृंगारसागर', नामक एक ग्रंथ शृंगारसंबंधी लिखा। नरहरि कवि के साथी करनेस कवि ने
उपन्यास
आजकल उपन्यास लिखने में बहुत लोगों की धड़क खुल गई है। इनमें यदि थोड़े ऐसे हैं जिन्हें अपनी कल्पना और अनुभव का सहारा है, तो बहुत से ऐसे भी हैं जिनका अन्य भाषाओं की विख्यात पुस्तकों पर गुज़ारा है। उपन्यास साहित्य का एक प्रधान अंग है। मानव प्रकृति पर इसका
सगुणधारा (रामभक्ति शाखा)
पूर्व मध्य काल : भक्ति काल (संवत् 1375-1700) प्रकरण 4 सगुणधारा रामभक्ति शाखा जगत्प्रसिद्ध स्वामी शंकराचार्य जी ने जिस अद्वैतवाद का निरूपण किया था, वह भक्ति के सन्निवेश के उपयुक्त न था। यद्यपि उसमें ब्रह्म की व्यावहारिक सगुण सत्ता का भी स्वीकार था,