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रागदर्पण : वे कैसी मासूमियत के दिन थे...

वो कौन हैं जिन्हें तौबा की मिल गई फ़ुर्सत
हमें  गुनाह भी  करने को  ज़िंदगी  कम  है

— आनंद नारायण मुल्ला

कल रात यह शेर कहने वाले को दिल से सलाम कहा कि इसे पढ़ते हुए मैं बहुत पीछे तक झाँक आई।

वे कैसी मासूमियत के दिन थे, जब पाप-पुण्य, गुनाह और सवाब की तमीज़ न थी। उन बे-फ़िक्र दिनों को सोचते हुए, मुझे याद आने लगे कानों पर जनेऊ टाँगें, घुटे हुए सिर पर शिखा और धवल धोती वाले रेवती हेड मास्साब। वह इसलिए कि मेरा पहला गुनाह उन्हीं ने पकड़ा था।

माघ की कड़कती ठंड में या जेठ की पछोरती गर्मी में, छठे-छमाहे ही कभी माँ गाँव ले जाती थी वह भी बस में। रास्ते भर सुग्गे की तरह रटाते हुए, “ढोर डंगर की तरह गाँव भर में न फिरना। हिरा जाओगी। अगर घर भूल जाओ तो किसी से कह देना बामनों में से हूँ। रेवती मास्साब की पोती।”

एक दिन खेल-खेल में मैं सचमुच ही भटक गई। किसी ने हैरान-परेशान देखकर पूछा, “अरी किसकी है?”

मैंने रटी-रटाई बात बोल दी, “बामनों में से हूँ।”

जवाब में हँसी भरा सवाल आया, “रंग से तो बामन की ना लगै?”

मैंने तन्नाकर कहा, “रेवती मास्साब की पोती हूँ।”

बदले में उस चेहरे पर उतर आए अपने बाबा के रुआब और ठसक को देखकर मुझे ख़ूब अच्छा लगा। लेकिन अपनी रंगत को लेकर मैं उदास हो गई।

बाबा को ब्राह्मण होने का ऐसा दंभ था, जैसे ब्राह्मण होने में उनका अपना ख़ुद का श्रम या हाथ है। अपनी जाँघ ठोककर और मूँछों पर ख़म देकर बाबा कहते, “काला बामन हूँ। काला बामन और गोरा डोम ख़तरनाक होवें।” अम्मा (दादी) रीझकर कहतीं कि मैं बिल्कुल बाबा पर पड़ी हूँ। मैं सोचती कि क्यों पड़ गई बाबा पर, न पड़ती तो दीदी की तरह उजली होती। अगर ख़तरनाक होना ही ख़ूबी है, तो गोरा डोम होना अच्छा है।

मुझे पीला बसंती रंग पहनने का शौक़ था। मुझे लाल गुलाबों से ज़्यादा कनेर, अमलतास और सरसों के फूल अच्छे लगते थे; लेकिन जब भी पीला पहनती, कोई न कोई माँ को टोक देता, “अन्ना छोटी को रंग देखकर पहनाए कर। आँख-नाक तो चोखे हैं, बस रंग से उतर गई।” माँ नीला-पीला पहनाने का परहेज़ करने लगी। मैंने तभी से अपने को बाग़ी होते पाया।

गाँव में बस एक ही सहेली थी, सुधा। गोरी डोम। बाबा को यह सहेलीपना पसंद नहीं था। “नाइयों के संग बामनों का क्या जोड़!” मगर मुझे उसका साथ अच्छा लगता था। हम सरसों के खेतों में दौड़ लगाते। कभी जोहड़ किनारे जलमुर्गियाँ देखते। मैं उसके घर बैठकर मेथी और बथुवे के पराँठे खाती। एक दिन मेरे इस पाप की ख़बर मुझसे पहले घर पहुँच गई। “छोटी, नाइयों के चौके में जीम रही थी।”

आवाज़ की ख़ुश्की से अंदाज़ा हो गया कि बाबा भरे पड़े हैं। “नीच जात की परछाई से भी बामनों को पाप चढ़ता है समझी?” पाप शुद्धि के लिए देहरी चढ़ने से पहले गंगाजल छिड़का गया। मंत्रोच्चार और अनुष्ठान हुए। उस रोज़ मुझे गुनाह की समझ हो गई। उसके बाद मुझसे ऐसे बेहिसाब गुनाह हुए। निषिद्ध दिनों में अम्मा की तुलसी का बिरवा नोच खाया। भंडार में रखे अचार के मर्तबानों में सेंध मारी। लड्डू गोपाल के हिस्से के सवा रुपए कच्ची इमली के नाम कर दिए। अम्मा दिन भर कोसती, “सयानी हो रई है। लौंडियों वाले गुन-लक्खन सीख। लड़की जात दिन भर मोहल्ले-टोले के लौंडों के साथ गेंद-बल्ला घुमाए कोई अच्छी बात है?”

इन बातों पर मुँहज़ोरी भी मेरे गुनाहों में शुमार थी। धीरे-धीरे पहले यार-दोस्त, फिर गेंद-बल्ला छूट गया। उठने-बैठने का शऊर, हँसने-बोलने की तमीज़ और बनने-सँवरने के सलीक़ों से उस समय मेरा कोई वास्ता नहीं था। जब वास्ता हुआ तो दूजी तरह के गुनाह हुए। हाँ गुन-लक्खन सीखने के बाद पीला रंग ख़ूब पहना। जब किसी ने कहा कि ‘लीथल प्रिटी’ तब भी रेवती मास्साब याद आए, जबकि काली ब्राह्मणी के बारे में उन्होंने कुछ न कहा था।

एक रोज़ बूढ़े हो चुके काले ख़तरनाक ब्राह्मण ने सदा को आँखें मूँद ली और मैंने एक बड़ा गुनाह किया, जिसकी शुद्धि किसी तरह न हो सकी।

कोई लकीर तभी तक बड़ी है, जब तक उसके नज़दीक कोई बड़ी लकीर नहीं। कोई गुनाह भी सिर्फ़ तभी तक बड़ा है।

इन दिनों मौसम करवट ले रहा है। सुबह की धूप में हल्की नरमी उतर आई है। रात की हवाओं में ख़ुशगवार-सी छुअन है। अक्सर उदास रहने वाला एक लड़का बेबात हँसने लगा है और ख़ूब हँसने वाली लड़की जाने किस बात पर उदास है।

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अन्य रागदर्पण यहाँ पढ़िए : रागदर्पण : क़िस्सागो अम्मा

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