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मेरे रचनात्मक द्वंद्व

मैं एक लेखक हूँ, यह कहने के लिए कितने उतार-चढ़ावों का सामना करना पड़ा है। बतौर लेखक यहाँ या कहीं भी, खड़े होने के लिए मैंने लंबी यात्रा तय की है। प्रथमतः आत्म-स्वीकृति। इस आत्म-स्वीकृति तक पहुँचना जटिलताओं का समावेश किए रहा। लेखक होने के क्या नियम-क़ायदे होते हैं, यह जानने-समझने में वर्षों बीत गए। अब भी जान सकी, यह दावा सौ फ़ीसद नहीं कर सकती हूँ। लिख देना, छप जाना, क्या इतने भर से लेखक बना जा सकता है? वह क्या है जो किसी व्यक्ति को लेखक में बदल देता है? भीतर की हलचल बाहर उँड़ेल देने की आतुरता, बाहरी क्षणों को पकड़ पाने की उत्सुकता। लिखते रहने के कई वर्षों बाद धीरे-धीरे मुझे लगा अब मैं सचमुच लेखक हूँ। ‘इनलाइटेनिंग मोमेंट’ का कोई विशेष क्षण नहीं आया। उत्तरोत्तर यह सत्य जीवन में घुलता गया, किंतु लेखक बने रहने के लिए लिखते रहना आवश्यक है और लेखन के अपने संघर्ष होते हैं। लेखक के जीवन में द्वैत प्रकृति के ‘फ़ोर्स’ काम करते हैं जो लेखन से विमुख भी करते हैं और लेखन को गति भी देते हैं। रचनात्मकता हर कलाकार के भीतर अनिवार्य रूप से द्वंद्व की भूमि है।

मैं जब लिखने बैठती हूँ, तो महसूस करती हूँ कि कहानीकार मात्र कथाओं का रचयिता नहीं होता। वह अपने समय, समाज, संबंधों और आत्मा के गहरे संघर्षों का संवाहक भी होता है। यदि रचनात्मक द्वंद्व की प्रकृति को देखें तो हर रचनाकार के भीतर दो सत्ताएँ निरंतर टकराती हैं। एक जो आदर्श और मूल्यों को थामे रखना चाहती है और दूसरी जो जीवन की ठोस सच्चाइयों से टकराकर आगे बढ़ती है। 

परंतु एक कहानी के रचनात्मक अंतर्जीवन के सारे द्वंद्व साहित्यिक नहीं होते। लिखने के लिए जब भी लैपटॉप खोलती हूँ तो मेरे नाम की पुकार मचती है। दुनिया भर के आवश्यक काम उसी समय आन खड़े होते हैं और लिखना पृष्ठभूमि में चला जाता है।  मौन का आह्वान करती हुई मैं शोर के भँवर में समा जाती हूँ। अनलिखे शब्द, अधलिखे ड्राफ़्ट विस्मय से मुझे देखते हुए बीत जाते हैं। मैं छिप जाना चाहती हूँ ऐसी जगह जिसे कोई आवाज़ न भेद पाती हो। मैं कल्पना करती हूँ आसमान की, पंछियों की, नदियों की किंतु घिरा हुआ पाती हूँ ख़ुद को कंक्रीट के जंगल से। लेखन को बिजली के स्विच की तरह ऑन या ऑफ़ नहीं किया जा सकता कि यह समय ख़ाली है, यही लेखन के लिए नियत है। लेखन को चाहिए बग़ैर पूर्णविराम वाला समय और अविराम दुनिया। किंतु मिलता क्या है? समय के टूटे-फूटे अंश और टुकड़ा भर संसार। लिखने के लिए दूरबीन-सी आँख चाहिए और चाहिए ‘माइक्रोस्कोपिक’ दृष्टि। वह जो यात्राओं से पनपती है, यात्राओं में मिले अनुभवों से मिलती है, किंतु यात्राएँ कहाँ हो पाती हैं? होती हैं ‘ट्रिप्स’ जो अपनी बुनावट में मशीनी, उथली, जल्दी बीत जाने वाली और एक दूसरे की नक़ल होती हैं। वहाँ अमूमन ऐसा कुछ नहीं घटता जो नहीं घटना चाहिए। वहाँ अक्सर ऐसे लोग नहीं मिलते या कहें कि लोगों को जानने का अवसर नहीं मिलता कि उन्हें किरदारों में उतारा जा सके। न वह एकांत प्राप्त होता है कि आंतरिक एकालाप कर उसे सहेजा जा सके जो विचार-तत्त्व को तर्क की आस्था देता है। यूँ स्त्रियों में अकेले घूमने का चलन इन दिनों बढ़ा है, किंतु पुरुषों के मुक़ाबले अब भी यह प्रतिशत कम है—जितना है वह भी सुरक्षा और अँधेरे के अवरोधों से घिरा। ऐसा ही एक व्यवधान लोगों से बग़ैर अक़्ल दौड़ाए बात करने का है। स्त्रियाँ चाह कर भी पुरुषों जितनी मुखर और बेतकल्लुफ़ नहीं हो पाती हैं। जब जिससे जी चाहा, उससे जो चाहे बात कर ली, ऐसा नहीं हो पाता है। कुछ तो हमारी कंडीशनिंग ऐसी होती है। कुछ अनुभवों के तीखे व्याघात ऐसा बना देते हैं। बची वे स्थितियाँ जहाँ संकोच त्याग कर हम बात कर लेते हैं, वहाँ उस बात का क्या बनेगा, कौन-सी बात का अर्थ क्या लिया जाएगा हम नहीं जानते। स्त्रियों की निजी बातचीत, किसी भी कारणवश, जब सार्वजनिक की जाती है तो निर्दोष बातों पर भी प्रश्नचिह्न लग जाता है, चरित्र पर चंद्रमा कलंक की भाँति आरोपित हो जाता है। भली प्रकार न स्थानों का अन्वेषण हो पाता है, न लोगों का। सीमाओं में बँधा लेखन, कुछ समय पश्चात् टहनियों के कंकाल जैसा प्रतीत होने लगता है, बिना कोंपल का। कहानियों के लिए चाहिए ढेर कहानियाँ, लोगों की ज़ुबानी भी। अपनी आँख के साथ चाहिए दूसरी बहुत-सी आँखें। आख़िर दो आँखें कितनी भी खुली हों, वह सब नहीं देख सकतीं जो लेखन को विविधता दे सके। लेखन का सामर्थ्य केवल विचार से नहीं आता, वह हमारे जिए हुए अनुभवों, हमारी विफलताओं, हमारे पाने-खोने और आत्ममंथन से निकलता है। 

आत्मा में अटकी फाँस जैसी एक कसक मुझमें रहती है और मैं सोचती हूँ कि मैं कहाँ हूँ और क्यों हूँ? अगर मुझे लिखना है तो मुझे कहाँ होना चाहिए? मैं लेखकों की आत्मकथाएँ उठाती हूँ। उनकी लेखन-यात्रा से गुज़रती हूँ। पढ़ती हूँ : वे कैसे लिख पाए, सोचती हूँ : क्या मैं भी वैसे ही लिख पाऊँगी? उनके जूतों में पाँव रखती हूँ। जूते मेरे माप के नहीं तो उतार छोड़ती हूँ। सबके संघर्ष अलग हैं, उन संघर्षों से पार पाने के तरीक़े भी भिन्न होंगे। मैं अपने इर्द-गिर्द लोगों की ओर दृष्टि करती हूँ। क्या मेरे संघर्षों को स्वीकृति मिलेगी? याद पड़ता है किसी ने कहा था कि तुम्हारे जीवन में कोई दुख नहीं, पीड़ा नहीं, अभाव नहीं—लिखोगी क्या और कैसे? एक ने नहीं, बहुत लोगों ने यह कहा। मेरे लिए ही नहीं बहुत-सी लेखिकाओं के लिए कहा। खाई-पी-अघाई औरतों वाली बात बहुत पुरानी नहीं है, अब भी गाहे-बगाहे सुनाई पड़ जाती है। किंतु किसी का जीवन ऐसा नहीं जो अभावरहित हो। उन अभावों पर उँगली रख उन्हें चीह्न पाना सहज-साध्य नहीं। बहुत कुछ होते हुए भी जो अनुपस्थित होता है, मन उसी पर अनुरक्त रहता है। ये अनुपस्थिति अपने जीवन के अतिरिक्त किसी और के जीवन की भी हो सकती है। लेखक उन अनुपस्थितियों को थाम कर, अभावों की अजानी पगडंडियों पर नंगे पाँव चलते हुए, राह में पड़े काँटों से लहूलुहान होते हुए लिखता है। ये कंटक जो खरोंच देते हैं, उसी की ख़लिश से बहता है लेखन। लेखन अयोग का योग है, अप्राप्त की प्राप्ति है, कच्चे लोहे का आघात है, कंकुजल की पुकार है। 

अपनी एक कहानी ‘महानगर की एक रात’ का ज़िक्र करना चाहूँगी। इसमें नायिका रात के समय टैक्सी लेकर घर लौट रही है। रास्ते में एक्सीडेंट में बेहोश होने के बाद अस्पताल में उसकी आँख खुलती है। पूछने पर उसे पता चलता है कि एक्सीडेंट और ड्राइवर द्वारा उसे अस्पताल में दाख़िल करवाने के बीच तीन घंटे की लंबी अवधि का गैप है। इस दौरान क्या हुआ होगा, यह सोचते-सोचते एक शक उसके मन में घर कर जाता है कि टैक्सी-ड्राइवर ने उसकी बेहोशी का अनुचित लाभ लिया है। कहानी में मैंने ड्राइवर के बलाद्-भोगी होने न होने के पर्याप्त कारण रखे, पर अंत लिखते समय मैं द्वंद्व में थी कि टैक्सी-ड्राइवर दोषी है या नहीं इसका निर्णय कर दूँ या इसे खुला छोड़ दूँ। पाठकों के तईं मेरा कर्त्तव्य बनता था कि उन्हें सच पता चले, परंतु मैंने अंत को ख़ुला छोड़ दिया। मैं चाहती थी कि पाठक कहानी को एक लड़की की दृष्टि से विचारें कि क्योंकर शहर में बाहर निकलते हुए कहानी की नायिका को समय देखना पड़ता है, किसी के संग पर आश्रित रहना पड़ता है, क्यों पार्टी में आए कथित सभ्य सहकर्मियों से भी लिफ़्ट माँगते वह हिचकती है कि कहीं यह भी उसका आमंत्रण न समझ लिया जाए, क्यों सामान्य बातों को भी वह सशंकित हो देखती है। पाठक नायिका की मानसिक स्थिति से न केवल पूरी कथा में गुज़रें, वरन् अंत में भी वे उसकी की ओर से सोचें और मुख्य समस्या को पहचानें, यही मैं चाहती थी। कहानी में मेरा ज़ोर अंत में कौन सही निकला कौन ग़लत, पर है ही नहीं। मेरा उद्देश्य था—समस्या को प्रस्तुत करना। कहानी के अनिर्णीत अंत से पहले जो समस्या है, विचार उस पर अपेक्षित है। अंत में दिया गया निर्णय कथा में एक स्थूल घटनात्मकता ही पैदा करता और पाठक का ध्यान कहानी की समस्या से हटा देता। वह अपने अनुमानों के ठीक या ग़लत निकलने पर ही केंद्रित हो जाता और फिर शासन, क़ानून आदि को कोस कर कथा से बाहर निकल जाता; जबकि अब वह चिंतनशील हो फिर से कहानी में अनन्या के शंकाकुल मन के लिए उत्तरदायी संकेतों, कारकों पर नज़र दौड़ाएगा। जैसे निर्मल ने कहा था कि साहित्य पाठक को पानी नहीं देता, वह उसे उसकी प्यास का बोध कराता है। और पाठकों की प्रतिक्रिया से मैंने पाया कि कहानी के अंत को लेकर जो रचनात्मक द्वंद्व मुझमें था उसका परिणाम अपेक्षित रहा। 

यह बात भी उतनी ही सच है कि एक लेखक की खाल अच्छी-ख़ासी मोटी होनी चाहिए तभी वह लिख सकता है अन्यथा उपहास-उत्प्रास के प्रहार उसके लेखन को लील सकते हैं। यह दीगर बात है कि यह बात इस बात के ठीक विपरीत है कि लेखक को संवेदनशील होना चाहिए। जीवन की क्लिष्टताएँ, विकटताएँ और विद्रूपताएँ लेखक को अंततः सख़्त बना देती हैं। उसकी अनुभूति-प्रवणता पर राहु-स्पर्श हो ही जाता है। लेखक के लिए उसका लेखन सबसे अधिक वेध्य होता है। कभी-कभी सबसे बड़ा प्रश्न यही होता है कि अपने निजी सत्य को कितना साझा करूँ, कहाँ तक उसे सार्वजनीन बना दूँ। कई बार सामाजिक दबाव, परंपरा और आधुनिकता के बीच झूलती मानसिकता यही रचनात्मक द्वंद्व गहरा देती है। लेखक जब लिखता है, अपना निज खोले न खोले, अपनी विचार-प्रक्रिया का निज अवश्य खोल कर रख देता है। चाहे न चाहे लेखक को उसके विचारों के तराज़ू पर तौला ही जाता है। कोई भी लेखक इससे बच नहीं पाता है। लिखते हुए कभी लगता है आत्मस्वर इतना मुखर हो गया है कि समाज का स्वर पीछे छूट जा रहा है, तो कभी सामाजिक ज़िम्मेदारी के बोझ से अपनी निजता दब जाती है। यही संतुलन साधने की कोशिश, यही द्वंद्व, मुझे रचने और फिर से सोचने के लिए बाध्य करता है। और प्रयत्न मेरा भी यही रहता है कि किसी बात का असर लिए बग़ैर ठंडी वस्तुपरकता से लिख सकूँ। लिख देने के परिणाम से पृथक होकर। परिवार, मित्रों, पाठकों का मेरे लिए क्या मत होगा, इस बोझिल विचार से एक निश्चित दूरी बनाकर। फिर भी कभी-कभी विचार आ ही जाता है कि इस विषय पर लिखूँ अथवा नहीं। ‘मॉरल कंपासिंग’ का अंदेशा, औचित्यहीन लेखक का ठप्पा लग जाने का खटका, आलोचना की आशंका... डायरी प्रकाशित होने जा रही थी, तब कई पन्नों पर यह ख़याल आया। कुछ-एक कहानियाँ लिखते समय भी। हालाँकि मेरा वोट हमेशा लिखने के पक्ष में ही जाता है, पर नफ़ा-नुक़सान वाला भाव कई दफ़ा कौंध जाता है। लिखने की आकांक्षा का जन्म हुआ तो बिना लिखे कैसे रहा जाएगा! मस्तिष्क में विचार का बीजारोपण होते ही रचना का आरंभ माना जा सकता है। हर रचनाकार के भीतर एक और संघर्ष होता है, कुछ नया कहने की चाह और परंपरा का आदर। कभी वह बिल्कुल नया रास्ता अपनाता है, तो कभी अपनी जड़ों से लौटकर ताक़त लेता है। नवीनता और परंपरा का यह द्वंद्व उसकी रचनात्मकता का तापमान तय करता है। अक्सर वही रचना सबसे सशक्त होती है, जो इस विरोध के बीच भी अपनी सच्चाई बनाए रखती है। किंतु अड़चनें दूसरी भी तो होती हैं। प्रकाशक की माँग, बाज़ार का झुकाव। यह दुविधा विषय, शैली इत्यादि से लेकर भाषा के स्तर तक खड़ी मिलती है। हमारे बहुभाषिक समाज में कहानीकार के सामने एक और चुनौती होती है। अभिव्यक्ति के लिए सही भाषा, सही स्वरूप और सही लय का चयन। मेरे भीतर अक्सर यह प्रश्न उठता है कि क्या मैं उस भाषा में लिखूँ, जो मेरे मन की मिट्टी से जुड़ी है, या उस भाषा में जो पाठकों तक आसानी से पहुँचती है? भाषा समाज की पहचान होती है, पर सर्जनात्मक विकास से ही उसका चरित्र बनता है और समकालीन नवरूपायन संभव होता है। अपने युग की सृजनात्मक आकांक्षाओं की पूर्ति भी तो इन्हीं से होनी है। भाषा में बातूनी स्थानीयता की गंध बचाना और समकालीन लोच का स्वाद देना, इन दोनों के बीच संतुलन साधना सचमुच कठिन होता है।

यहाँ याद आता है कि मेरी किताब के शीर्षक को प्रकाशक ने बदलने का सुझाव दिया था। कुछ शब्दों को, शब्द-युग्मों को जो पारंपरिक शब्दकोश में नहीं थे अथवा कम सुने हुए थे, बदल देना चाहा था । कुछ कहानियों का अंत संपादक बदलना चाहते थे तो किसी ने विषय आधारित लेखन की माँग की थी, किंतु किसी कृति का मूल स्वर कैसे विकसित होगा, यह निर्णय अंततः मेरा ही रहता है—प्रकाशक और बाज़ार की माँग से परे जाकर। लेखन प्रगल्भता का संस्कार भी है, अविचलन की टेर भी, अवहेलना का भाव और हठीलेपन की सत्ता भी है। कई बार पाठकों से मिले प्यार और प्रशंसा से भी लेखक ऐसा बँध जाता है कि उन्हीं विषयों पर लिखता चलता है जो उसके पाठक-वर्ग को प्रसन्न रखें। एक कथाकार के तौर पर मुझे इस द्वंद्व से गुज़रना पड़ा कि मेरा प्रथम कहानी-संग्रह अधिकतर प्रेम-कथाओं के लिए सराहा गया, तब क्या सिर्फ़ यही लिखती रहूँ अथवा? और तब मैंने चुना और अलग विषयों पर भी लिखना। रचनाकार को पाठकों से उन बातों पर भी मुख़ातिब होना चाहिए जिसके बारे में बात करते वे डरते हैं या असहज हो जाते हैं। जब मैंने ‘मग़रिबी अँधेरे’ लिखी, तब पाया कि मृत्यु पर बात करना सभी के लिए उतना सहज नहीं। मृत्यु जीवन का अनिवार्य; किंतु रहस्यमय अंत है, जो आकर्षण और भय दोनों जगाती है। जब कहानी मानव-जीवन के विविध पहलुओं को समझने का माध्यम है, तो मृत्यु भी उसके अध्ययन और चिंतन का एक अपरिहार्य हिस्सा है। ‘मग़रिबी अँधेरे’ की नायिका का मृत्यु को चुनने का असर पाठकों पर ऐसा बैठा कि वे मुझसे पूछने लगे कि आप जीवन से निराश हैं क्या? पाठकों की प्रतिक्रियाएँ भी एक ही विषय को लेकर अलग हो जाती हैं। अपनी दो कहानियों ‘परवर्ट’ और ‘प्रेम पथ ऐसो कठिन’ की ही बात करूँ तो दोनों में कथा का मुख्य पात्र बहुप्रेम में है। दोनों कहानियों में यही एक साम्य है, परंतु बहुत बड़े अंतर के साथ। ‘परवर्ट’ में बहुप्रेमी एक आदमी है तो ‘प्रेम पथ ऐसो कठिन’ में नारी पात्र एक ही समय में चार लड़कों से प्रेम करती है। ‘परवर्ट’ को पुरुषों से ज़्यादा प्रशंसा मिली और महिलाओं से आलोचना। वहीं ‘प्रेम पथ ऐसो कठिन’ को महिलाओं से तारीफ़ मिली, पर पुरुषों से आलोचना। यानी बहुप्रेम से किसी को ज़्यादा दिक्कत नहीं थी, पर वह कर कौन रहा है—मुद्दा यह रहा। 

आलोचना कहानियों पर ही नहीं, मुझे अपने स्वभाव पर भी मिली हैं। एक लेखक ने मुझसे कहा था, “तुम घर-परिवार में रमी हुई हो। यह स्वभाव तुम्हारे लेखन को लील जाएगा। तुम्हें उनसे कुछ दूरी बरतनी चाहिए।” मैं सोचती हूँ कि क्या अपने उत्तरदायित्वों से मुँह मोड़ कर ही अच्छा और निष्ठावान् लेखक बना जा सकता है? हाँ, जो अकेले रहते हैं, उनके पास लिखने का अधिक समय और अवसर होते हैं। किंतु जो दायित्व स्वयं आगे बढ़कर लिए हों, प्रेम से भरे हों... उन्हें दरकिनार कैसे किया जा सकता है? मैं उनकी ओर देखती हूँ; जो मुझ पर निर्भर हैं, अपनी ओर देखती हूँ, जिसके जीवन का उत्तम्भ लेखन है। लेखक अपने लेखन की प्रशाखा होता है। लेखन और कर्त्तव्य में संतुलन बनाने की जटिलताएँ, गुलझटें, व्यथाएँ, वेदनाएँ, कातरताएँ, असंतोष, तिलमिलाहटें, व्याकुलताएँ—निट स्टिच के फंदों की भाँति, भाव-भाव शब्दों का पैटर्न बुनते हैं। 

लेखन संतुलनों का सधाव है, प्रतिलोमों की संगतता है। 

लेखन में वंध्या हो जाने की स्थिति से साक्षात्कार की शिकायत सभी लेखकों को होती है, तब लिखना तो लिखना, लेखन के बारे में बात करना भी मुश्किल जान पड़ता है। मैंने भी यह वक़्त देखा है, पर इसका विपरीत मुझे अधिक दुसह्य जान पड़ा, मन के तलघरे में दबे पड़े कई विषय जब एक साथ उठ खड़े हुए, तब किसको पहले लिखूँ, कौन-सा विचार पहले कहानी हो जाने का पात्र है, यह फ़ैसला लेने के द्वंद्व ने राइटर्स-ब्लॉक जितना ही सताया। उसमें भी डर यह कि एक के लिए तलघरे का दरवाज़ा पहले खोलने पर दूसरे विषय अपने लिखे जाने के इंतिज़ार में एक दूरी बना लेते हैं और जब मैं उन तक पहुँचती हूँ, तब ख़ुद के प्रति अनास्था की पीड़ा से पीड़ित उनकी बड़ी मनुहार करनी पड़ती है।

जब तक मैं अपने देश में थी, ऐसे लिख पाती थी जैसे जन्मते ही मेरे भीतर शब्द बहने लगे और लिखना सीखते ही मैं लिखने लगी। वहाँ रहते मेरे लेखन पर कभी विराम नहीं लगा। समय पाते ही, बल्कि समय पाए बग़ैर भी मैं लिखती थी। समय की प्रतीक्षा के अधीन कभी रहना नहीं पड़ा। शब्द ख़ुद-ब-ख़ुद उतरते थे। एक पड़ाव के बाद अगले पड़ाव तक पहुँचने का ऐसा निर्भीक उछाह कि अपनी ही गति पर आश्चर्य होता। न लैपटॉप की, न एकांत की, न मूड की आवश्यकता। लेखन को स्थगित करने का कोई बहाना नहीं। जब जहाँ जैसा अवसर मिला, वहीं लिखने बैठ गई ज्यों मेरी गर्भनाल लेखन से जुड़ी हो। जब देश से दूर आई, वे बंधन ढीले पड़े। अपने स्थान से उखड़ कर नई जगह स्वयं को जा रोपना, मन कैसा तो डाँवाडोल रहता। मेरे दो देशों के बीच दूरी भले ही अधिक न हो, वक़्त का अंतराल भी डेढ़ घंटे का ही, पर मन के भीतर इतने बड़े अंतराल ने घर कर लिया कि नापे नहीं नापा जा सकता। जिस ज़मीन से मैं जुड़ी रही वहाँ के संकट, समस्याएँ, समाधान सब भिन्न थे। मैं जहाँ रही, धमनियों में जो स्थान बहता रहा, जो लिखने की ज़मीन और अंतःप्रेरणा दोनों बना रहा, उससे अलग होकर लिखना अब इतने वर्षों बाद भी मुझे कठिन लगता है। जहाँ के हम होते हैं, वहाँ से उखड़ जाते हैं; जहाँ के नहीं होते, वहाँ सर्वाइवल के लिए जड़ें जमा तो लेते हैं, किंतु आउटसाइडर ही बने रहते हैं। भौतिकताओं से घिरे शहर में रहते हुए, जहाँ पग-पग पर दिखावे और टीम-टाम के अलावा किसी को कुछ नहीं सूझता, वहाँ लिखने के लिए गहन-बारीक बातें चुनना, असंभव न सही, कठिन अवश्य है। यहाँ व्यक्ति को व्यक्ति से, उनकी विचार-शृंखला को एक-दूसरे से अलगाना मुश्किल है। यहाँ जो बातें हैं, वे मुझे लिखने के लिए वैसे प्रेरित नहीं करती हैं। अपने देश में रहते हुए जो आप ही आप पारदर्शी हो गुज़रता था, लेखन के कैटेलिस्ट हर ओर विद्यमान रहते थे, उजाड़पन की छाया यहाँ सब चीज़ों में ऐसी है कि वही उत्प्रेरक यहाँ खोजने पड़ते हैं। यूँ बाहर से देखें तो अब लिखने के लिए ज़्यादा बातें हैं, किरदारों को रंग देने के लिए शेड्स भी ज़्यादा हैं। अलग-अलग राष्ट्रीयताओं के लोगों से रोज़-दिन मिलते हुए कितनी ही बातें कौंधती भी हैं, पर वह मन कहाँ से लाऊँ जो लेखन से बद्ध था और अतृप्तता में भी संपूर्ण शांत रहता था।

अक्सर सोचती हूँ कि सांसारिक कामों में रमे रहकर लिखना संभव है अथवा नहीं?  संभव हो या असंभव, विकल्प नहीं। मैं एक महानगर में रहती हूँ। महानगर अज़दहे की तरह सब निगल जाते हैं। मनुष्य की आत्मा को, उसके समय को, प्रेम को, संबंधों को, महसूस करने की क्षमता को। महानगर एक ऐसी जगह है, जहाँ कुछ बनने-पाने की होड़ में, कुछ पा लेने की आकांक्षा में समय मुट्ठी से रिसता जाता है; पर ठीक से हिसाब किया जाए वह ‘कुछ’ इतना भर होता है कि जीवन एक लय में चलता रहे। लेखन से व्यावहारिक जीवन की लय संभव हो पाती तो कितना अच्छा रहता। मैं कल्पना करती हूँ कि लेखन का तालमेल आर्थिक पक्ष से बैठ जाए तो लेखकों के आगे चुनने की दुविधा कुछ तो कम होगी। बेहतर लिखा जा सकेगा, अधिक लिखा जा सकेगा। लेखक को नाकारा समझने की प्रवृत्ति भी ख़त्म होगी। अगर किसी रोज़ सचमुच ही ज़रूरत आन पड़े तो सत्य यही है कि लेखन से मेरा गुज़ारा संभव नहीं हो सकेगा। मेरे जीवन में लेखन के अलावा कोई भी दूसरा काम इसी असंभव का परिणाम है। कुछ पाने का अर्थ सदा कुछ और खोना होता है। घर से ऑफ़िस, ऑफ़िस से घर—एक वृत्त, कभी न ख़त्म होने वाला चक्र जिसमें जीवन इस तरह रुद्ध हो जाता है कि बाहर आने के सारे रास्ते धीरे-धीरे मिटने लगते हैं। दफ़्तर एकरस होते हैं। वे सर्जनशीलता को स्याहीचटे की भाँति सोख लेते हैं। वहाँ व्यक्तित्व के उन आयामों का कोई अर्थ नहीं होता जो धनोपार्जन में सहयोग नहीं करते। वहाँ व्यक्ति सिर्फ़ एक मशीन हो सकता है, जिसे इनपुट को अधिक से अधिक आउटपुट में तब्दील करना है। वहाँ काम के अतिरिक्त उठते हुए ख़यालों को सुला देना पड़ता है, क्योंकि वे काम में बाधा डालते हैं।

इन सबके बावजूद अधिक दिनों तक किसी लेखक को अलेखक बनाए रखना बड़ा कठिन है। लेखन अँगीठे की आँच है, जो सुलगती रहती है। बग़ैर लिखे भी वह सोते-जागते, चलते-फिरते बहर-हाल लेखन में ही मुब्तिला रहता है। जब समाज अन्याय, भेदभाव या असमानता से जूझता है; तब रचनाकार का मन भी बेचैन हो उठता है। वह सोचता है, अपनी क़लम से वह किस तरह हस्तक्षेप करे? यह द्वंद्व उसकी रचनाओं में कभी विद्रोह के रूप में, कभी मूक संवेदना के रूप में झलकता है। लेखन अनवरत आवेग है। जैसे रोशनी की किरण खोभार तक पहुँचने की राह खोज लेती है, ठीक उस तरह नित जीवन में भी खिड़कियाँ खुलती हैं, जब पात्र चलकर आप ही हाथ थाम लेते हैं। कहानियाँ लेकर लोग स्वयं चले आते हैं। अपने जीवन की, दूर-दराज़ के देशों की, हृदय के प्रकोष्ठों की। जब उनको मालूम पड़ता है कि मैं लिखती हूँ तो हठात् ही वे बतरस के ललचौंहे हो उठते हैं। मेरी अनेक कहानियों की पृष्ठभूमि यूँ ही मिली। ‘यार-ए-ग़ार’ का पता दिया था अफ़ग़ानिस्तान से आकर बैंकॉक में बस गसे एक व्यक्ति ने। ‘प्यार की कीमिया’ को निरावृत किया था रशिया से आई एक कामलेखा ने। हाल ही में मुझे एक व्यक्ति मिला जो अपने देश की सुरक्षा-व्यवस्था सँभालता है और अपनी सुरक्षा के लिए बॉडी-गार्ड लेकर चलता है। अतिव्यस्त जीवन, परंतु ऐसा प्रेमिल मन कि पत्नी को प्रसन्न करने के लिए, उसे सरप्राइज़ देने के लिए नाना प्रकार के पत्थर चुनता रहा। यूँ सहसा मुझे मिल जाते हैं स्त्री और पुरुषों के मन के अनदेखे-अनसुने कोने जो अनूठे होते हैं। लेखन गोपन का अनावरण है। किंतु यहाँ भी एक असमंजस आन खड़ा होता है। दूसरों के जीवन को लिख देना उनके प्रति कुघात तो नहीं? सभी लोग तो कहानी हो जाने के अनुकांक्षी नहीं होते। कुछ सिर्फ़ अपनी बात कहकर आगे बढ़ जाते हैं। अनुमति की मोहलत तक नहीं देते। मन ललकता है, लिख देना चाहता है। किंतु सही-ग़लत का प्रश्न आ खड़ा होता है। कितनी ही ऐसी कहानियाँ लिखे जाने की अपेक्षा में या विदा की अभिलाषा में प्रतीक्षारत हैं। वे अनावाहित, किंतु प्रिय अतिथि की मानिंद हैं। 

मौलिकता का प्रश्न भी मेरे लिए बड़ा ऊहापोह है। जो लिखना चाहती हूँ, वह पहले लिखा तो नहीं जा चुका? जब भी लिखना शुरू करती हूँ, यह प्रश्न मेरे सामने ज़रूर आ खड़ा होता है। कई दफ़ा होता है कि सत्य को व्यापक सत्य बनाने की प्रक्रिया में दो या दो से अधिक लेखक एक ही विषय पर क़लम चलाते हैं। कभी अजाने ही ऐसा हो जाता है, क्योंकि समान परिस्थितियों में मनुष्यों की प्रतिक्रिया भी मिलती-जुलती हो सकती है; हालाँकि संप्रेषण-प्रणाली भिन्न होती है और पाठक से उसकी रागात्मकता भी। तो कभी जानते-बूझते यह होता है कि उसी विषय पर जो पहले लिखा जा चुका है; वह लेखक को विषय के प्रति न्याय करता प्रतीत नहीं होता, अथवा उस विषय पर नई रचनात्मक संभावना उसे दीख पड़ती है। तर्क दिया जाता है मौलिक कुछ नहीं, सब कुछ पहले लिखा जा चुका है।  किंतु उस अमौलिक में लेखक का भिन्न दृष्टिकोण जागृत होता है और उन्हीं परिस्थितियों का एक और सर्जनात्मक प्रत्युत्तर वह देने लगता है। 

प्रकाशित होना और कुछ करता हो न करता हो पर लिखने का प्रेरणास्रोत ज़रूर बना रहता है। किंतु अब एक प्रश्नात्मकता घेर लेती है कि लिखा हुआ कहाँ प्रकाशित होगा? प्रकाशित हुआ भी तो कितने से पाठकों तक पहुँचेगा? ऑनलाइन छपेगा तो उसकी भी कितनी-सी शेल्फ़ वैल्यू होती है। अगले रोज़ कुछ नया आ जाता है। प्रतियोगिता किससे करें जब एआई ने उर्वरता और रचनात्मकता को चुनौती दे दी है। कभी-कभी लिखने-छपने का पूरा प्रसंग ही बेमानी-सा लगता है। न लिखने से चेतना का स्वभाव बदल रहा है, न लोगों की परिस्थितियों के प्रति सोच; बल्कि ओवर-थिंकर का टैग और मिल जा रहा है! सारे लेखन को ही ज़्यादा सोचने के साइड-इफ़ेक्ट कहकर समाज में हस्तक्षेप करने के उसके अधिकार को ही ख़ारिज कर दिया जाता है। 

रही-सही कसर तकनीक ने पूरी कर दी है। रोज़-दिन बदल रही तकनीक ने पढ़ना-लिखना कैसा तो मुश्किल कर दिया है! पाठकों की प्राथमिकता बदल गई है। पहले जिन लोगों के एकांत की साथी मात्र किताबें होती थीं, अब उनके एकांत में तकनीक ने दख़ल देकर उनकी रुचियों को बदल दिया है। लोग पढ़ने की बजाय देखने को तरजीह देने लगे हैं। हर विषय जब दृश्य में बदल रहा है, दृश्य भी ऐसे जिन तक आप पहुँचना चाहें न चाहें, वे आप तक ज़रूर पहुँच जाएँगे। सारी सूचनाएँ, सारे समाचार जब एक क्लिक भर भी दूर नहीं रह गए हों, क्या मेरा लिखा पाठकों को रुचेगा? यह ख़याल अक्सर आता है। लिखा हुआ बार-बार पढ़ती हूँ। असंतुष्ट होकर काट-पीट करती हूँ। कभी फिर से लिखती हूँ। मेरा यही रचनात्मक द्वंद्व बार-बार स्वयं का परीक्षण करने पर विवश करता है। हर कहानी के बाद मैं ख़ुद से पूछती हूँ, क्या मैं अब भी अपने भीतर के सत्य और संवेदना के प्रति ईमानदार हूँ या सिर्फ़ अपने परिवेश की गूँज भर बनकर रह गई हूँ? यही आत्म-मूल्यांकन मुझे नएपन की दिशा में ले जाता है। मेरे रचनात्मक द्वंद्व मेरी ऊर्जा का स्रोत हैं। यह द्वंद्व ही मुझे नए प्रश्नों तक पहुँचाता है, नए उत्तर खोजने की प्रेरणा देता है। मैं न समाज से भागती हूँ, न अपने अनुभवों से। मेरे लिए रचनात्मकता आत्म-साक्षात्कार और सामाजिक उत्तरदायित्व का संगम है। मैं इसमें ही साँस लेती हूँ, संघर्ष करती हूँ, गिरती हूँ, फिर उठती हूँ।

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‘अकार’ के 73वें अंक से साभार प्रस्तुत।

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