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निपट निरंजन

1623 - 1698 | चंदेरी, मध्य प्रदेश

नाथ परंपरा के कवि। चर्पटनाथ के शिष्य। असार संसार में लिप्त जीवों की त्रासदी के सजीव वर्णन के लिए स्मरणीय।

नाथ परंपरा के कवि। चर्पटनाथ के शिष्य। असार संसार में लिप्त जीवों की त्रासदी के सजीव वर्णन के लिए स्मरणीय।

निपट निरंजन के दोहे

ना देवल में देव है, ना मसज़िद खुदाय।

बांग देत सुनता नहीं, ना घंटी के बजाय॥

मुह देखे का प्यार है, देखा सब संसार।

पैसे दमरी पर मरे, स्वार्थी सब व्यवहार॥

मन की ममता ना गई, नीच छोड़े चाल।

रुका सुखा जो मिले, ले झोली में डाल॥

जब हम होते तू नहीं, अब तू है हम नाहीं।

जल की लहर जल में रहे जल केवल नाहीं॥

जहाँ पवन की गती नहीं, रवि शशी उदय होय।

जो फल ब्रह्मा नहीं रच्यो, निपट मांगत सोय॥