एक स्त्री का विदा-गीत
जाड़े की पतली धूप फुनगियों से आहिस्ता-आहिस्ता उतर रही थी, जैसे सद्यः प्रसूता बंदरिया उतरती है, पेड़ से अपना बच्चा चिपकाए हुए। हवा के झोंकों से डालें रह-रहकर सिर उठातीं तो जाड़े का आसमान डालों के परे ख़ूब साफ़, पर घिसी-जीर्ण नीली धोती-सा चमकता।
सावित्री