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वह कल

wo kal

निकोलाई रेरिख

और अधिकनिकोलाई रेरिख

    मुझे मालूम थी बहुत-सी उपयोगी चीज़ें

    पर अब मैं उन सबको भूल चुका हूँ।

    लुटे हुए यात्री की तरह

    अपनी संपत्ति खोए निर्धन की तरह

    मुझे याद आता है अपना वैभव

    जिसका मैं कभी मालिक हुआ करता था।

    याद आता है अचानक, बिना सोचे

    बिना जाने कि कब प्रकट होगा वह मृत ज्ञान।

    कल ही तो मैं बहुत कुछ जानता था

    पर एक रात की अवधि में ही

    सब चीज़ों पर अंधकार छा गया है

    यह सच है कि दिन महान था

    और रात—लंबी और अंधकार भरी।

    ख़ुशबुओं से भरी सुबह आई।

    सब कुछ था सुंदर और स्वच्छ।

    नए सूर्य से आलोकित हो

    मैं भूल गया, खो बैठा

    जो कुछ मैंने जुटा रखा था।

    नए सूर्य की किरणों के नीचे

    मेरा ज्ञान पिघल गया, गड्ड-मड्ड हो गया

    मैं अब पहचान नहीं पाता

    अपने मित्रों, अपने दुश्मनों को।

    मुझे नहीं मालूम कब सामना होगा ख़तरों से,

    कब रात होगी—मालूम नहीं।

    मैं नए सूर्य का स्वागत नहीं कर सकूँगा।

    इस सारे वैभव का

    मैं कभी मालिक था

    पर अब वैभवहीन हूँ।

    अपमानजनक है यह कि मैं पुनः जानने लगूँगा वह कल

    जिसकी पहले कभी ज़रूरत नहीं समझी।

    बहुत लंबा है आज का दिन

    पता नहीं कब आएगा—

    वह कल?

    स्रोत :
    • पुस्तक : निकोलाई रेरिख की कविताएँ (पृष्ठ 18)
    • रचनाकार : निकोलाई रेरिख
    • प्रकाशन : रेरिख अध्ययन परिषद, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1995

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