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रोशनदान

roshandan

महिमा श्रीवास्तव

और अधिकमहिमा श्रीवास्तव

    रोशनदान से छनकर

    आती धूप की टुकड़ियाँ

    रात को आती चल कर

    चाँदनी की गिलहरियाँ।

    रोशनदान में ही बना लेतीं

    घोंसले ये भूरी गौरैयाँ

    किनारे चहलकदमी करतीं

    छोटी-बड़ी छिपकलियाँ।

    रोशनदान से चली आती

    सौंधी गंध गीली माटी की

    कमरे का बासीपन हरती

    ताज़ी हवा बरसातों की।

    रोशनदान में बाबा छुपाते

    रूपए उधार चुकाने के

    अम्माँ हँसती उन्हें हटाते

    झाड़ती जाले मकड़ी के।

    बंद हुए आजकल रोशनदान

    ए.सी. की ठँडक पाने को

    हम मस्त सोते चादर तान

    बंद कर मन के तहख़ाने को।

    स्रोत :
    • रचनाकार : महिमा श्रीवास्तव
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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