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हम धरती के सीना चीरीं

hum dharti ke sina chirin

मोहनलाल यादव

मोहनलाल यादव

हम धरती के सीना चीरीं

मोहनलाल यादव

और अधिकमोहनलाल यादव

    हम धरती के सीना चीरीं बोईं गेहूँ धान।

    हमरेन दम पे हर होंठन पे खेल रही मुसकान॥

    हमरइ जाँगर धरती मइया पहिनइ चूनर धानी

    हमरइ जाँगर बाली बाली में चमकै सोना-चानी,

    हमरइ जाँगर ऊसर बंजर में आवै हरियाली

    हमरइ जाँगर उजरौटी अउ हर चेहरे पे लाली।

    हमरइ जाँगर मिटै अँधेरा आवै नवा बिहान।

    हम धरती के सीना चीरीं बोईं गेहूँ धान॥

    बून बून हमरे तन से टपके नमकीन पसीना

    बिरवा बिरवा बिहँसि पड़े तब फूलइ हमरा सीना,

    धूप-छाँव अउर गरमी सरदी ईहै तो संगी साथी

    झूरा बूड़ा पाला पाथर से खेलीं दिन राती।

    खिलखिलाइ सरसों के फुलवा मटर फूल मुसकान।

    हम धरती के सीना चीरीं बोईं गेहूँ धान॥

    हम दुनिया के पेट भरीं हमहिन खुद सोईं भूखा

    ओनके घरवाँ सावन बरसै मोर अँगनवाँ सूखा

    खाद बीज महँगा होइ मूड़े पे लदि करजा

    एकै रस्ता हमरे आगे जहर खाइ के मरि जा।

    दिल्ली सरकार भई आन्हर कइसे होई कल्यान।

    हम धरती के सीना चीरीं बोईं गेहूँ धान॥

    कब तक आपन सपना मारीं कब तक दुखड़ा रोईं

    कब तक भूख कर्ज के सहिके कब तक नैन भिगोईं,

    कब तक मौन व्यथा के सहबै कब तक रहब बेचारा

    कब तक झूठ-मूठ के जुमला सुनिके करी गुजारा।

    कब तक करीं गरीबी अउर बदहाली के विषपान।

    हम धरती के सीना चीरीं बोईं गेहूँ धान॥

    रोना धोना छोड़ दे लल्ला करी गगन हुंकार

    काँपि जाइ दुसमन की छाती काँप जाइ सरकार,

    गुस्सा जब फूटी सड़कन पे कुर्सी डगमग डोली

    दुइनौ हाथ उठाइ के बोलौ इंकलाब के बोली।

    सोषणहीन समाज बनावौ करौ युद्ध एलान।

    हम धरती के सीना चीरीं बोईं गेहूँ धान॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : अलगौझी (पृष्ठ 29)
    • रचनाकार : मोहनलाल यादव
    • प्रकाशन : हंस प्रकाशन, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2023

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