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गाँव से बिछड़ना

gaanv se bichhaDna

अवनीश यादव

अवनीश यादव

गाँव से बिछड़ना

अवनीश यादव

और अधिकअवनीश यादव

    गाँव से पलायन की स्थिति रुकने का नाम नहीं ले रही है

    माँ से भी बेटों का बिछड़ना रूक नही रहा है

    बहनों से भी भाइयों के बीच की दूरी लगातार बढ़ रही है

    गाँव जो छूट गया है

    हम सभी का ध्यान गाँव से हट नही पा रहा है

    शहर फिर भी हमे अपना नही पा रहा है

    शहर जो भर चुका है पहले से ज़्यादा,

    गर्मी भी पहले से ज़्यादा बढ़ चुकी है

    कमरे का किराया भी दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है

    सड़को पर भीड़ भी है

    सब्जी के दामों मे भी बृद्धि हो रही है

    चाय पर चर्चा भी हो रही है

    शहर फिर भी अकेला है

    और हम भी अकेले है

    इतना अकेलापन होने के बावजूद भी

    शहर हमें अपना नही पा रहा है

    ना हम शहर को अपना पा रहे है

    हम दोनो ही द्वंद में फसें है

    कुछ ही दिन के ठहराव के बाद

    उबते हुए शहर से,

    हम वापस गाँव के तरफ़ भागते है,

    उस गाँव की तरफ़

    जिसे शहर आते वक्त

    हम मुड़ के भी नहीं देखते है

    गाँव जो हमारी प्रतीक्षा में पड़ा है

    वैसा का वैसा ही जैसा अंतिम समय में हम छोड़ गए थे,

    गाँव हमें देख मुस्कुराता है

    हम भी मुस्कुरातें है

    और दोनो एक दूसरे को स्पर्श करतें हुए आलिंगन करतें है

    बिना किसी शिकायत के हम दोनों एक-दूसरें के साथ

    दौड़ते है भागते है और हस्तें है

    यहाँ शहर के जैसे कोई भीड़ नहीं है

    यहाँ कोई शिकायत नहीं है

    हम सब ख़ुश है

    मात्र इस ख़्याल से की हम बिछड़े नहीं है

    हम साथ-साथ है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : अवनीश यादव
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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