पथरा गइल नयन—दीआ बुता चुकल रहीं
pathra gail nayan—dia buta chukal rahin
सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
Satishwar Sahay Verma 'Satish'
पथरा गइल नयन—दीआ बुता चुकल रहीं
pathra gail nayan—dia buta chukal rahin
Satishwar Sahay Verma 'Satish'
सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
और अधिकसतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
पथरा गइल नयन—दीआ बुता चुकल रहीं।
आठो पहर ले गीत तोहर गा चुकल रहीं॥
कइसे दो लोग जी रहल बासी उमेद पर
केतना बेरि हम परान के अझुरा चुकल रहीं॥
कठुआत आस के मिलल नरम गरम हवा
बालू से तेल पेर के अकुता चुकल रहीं॥
सितुहा के समुंदर समुझके मन अघा गइल
कागज के नाव धार में लगा चुकल रहीं॥
ई सांस के फँसरी में टंगल बा कवनो तबीज
निज लोर से तस्वीर के नहला चुकल रहीं॥
मउअत के नाँव पर बहुत भखनी ह देवता,
जिनगी के हम देवास में चढ़ा चुकल रहीं॥
- पुस्तक : जल के धारा में दीयना (भोजपुरी गजल-संग्रह) (संकलन : अम्बदत्त गुंजन) (पृष्ठ 15)
- रचनाकार : सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
- प्रकाशन : भारतीय भोजपुरी साहित्य परिषद, मुजफ्फरपुर
- संस्करण : 1996
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