मन के सुगना बना लिहले बानी
man ke sugna bana lihle bani
सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
Satishwar Sahay Verma 'Satish'
मन के सुगना बना लिहले बानी
man ke sugna bana lihle bani
Satishwar Sahay Verma 'Satish'
सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
और अधिकसतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
नाँव अइसन समाइल जिया में मन के सुगना बना लिहले बानी॥
अपना पलका के ओटे ई देखीं एगो सपना सजा लिहले बानी॥
प्रेम के हथकड़ी हाथे बाँधल अब जिनगी ई जेहल बनल बा
केहू लोहा ना समझे ना रूपा सोना कंगना गढ़ा लिहले बानी।
तुं लुका ल भले आपन सूरत हमरो जीये के बाटे ठेकाना
तोहरि मूरत गढ़ल बा कुछ अइसन हियरा दिअना जरा लिहले बानी।
सांस के लेके काँवर ई जग में ढो रहल बानी जानी ना कब से?
राह में टोक लागे ना तनिको सूरमा नयना लगा लिहले बानी।
झूठ के साँच कहि के जमाना 'सतीशो' के देता भुलावा—
अलगा संसार से अपना भीतरे साँच सजना बसा लिहले बानी।
- पुस्तक : जल के धारा में दीयना (भोजपुरी गजल-संग्रह) (संकलन : अम्बदत्त गुंजन) (पृष्ठ 5)
- रचनाकार : सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
- प्रकाशन : भारतीय भोजपुरी साहित्य परिषद, मुजफ्फरपुर
- संस्करण : 1996
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