कहीं इंजोर बा, कहीं अन्हार हो जाला
kahin injor ba, kahin anhar ho jala
सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
Satishwar Sahay Verma 'Satish'
कहीं इंजोर बा, कहीं अन्हार हो जाला
kahin injor ba, kahin anhar ho jala
Satishwar Sahay Verma 'Satish'
सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
और अधिकसतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
कहीं इंजोर बा, कहीं अन्हार हो जाला।
कहीं उठल धुआँ, कहीं अंगार हो जाला॥
झनक के टूटि गईल तार सजल बीना के।
उदास तार कहीं तन सितार हो जाला॥
कहीं इ आँखि के आगि जरा गईल हियरा।
कहीं नयन मिलल नयन से पियार हो जाला॥
भरम में डालि के साथी कहीं रोआवे ला।
कहीं इ आँखि के मोती सिंगार हो जाला॥
बड़ा सम्हार के हिरदया में बात तोपल बा।
अजब 'सतीश' के मन बेसम्हार हो जाला॥
- पुस्तक : जल के धारा में दीयना (भोजपुरी गजल-संग्रह) (संकलन : अम्बदत्त गुंजन) (पृष्ठ 2)
- रचनाकार : सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
- प्रकाशन : भारतीय भोजपुरी साहित्य परिषद, मुजफ्फरपुर
- संस्करण : 1996
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