कब चलल ई तीर-हम ना जानि पवलीं
kab chalal ii teer hum na jani pavlin
सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
Satishwar Sahay Verma 'Satish'
कब चलल ई तीर-हम ना जानि पवलीं
kab chalal ii teer hum na jani pavlin
Satishwar Sahay Verma 'Satish'
सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
और अधिकसतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
कब चलल ई तीर-हम ना जानि पवलीं।
घाव बा गंभीर—हम ना जानि पवलीं॥
देह परिछांही से अलगा दूर भागल
मीत बा बेपीर—हम ना जानि पवलीं॥
मन रही अब इयाद के जंगल में भटकत
के धराई धीर—हम ना जानि पवलीं॥
फूल के लतरी से झांकत घाम तीता
दी करेजा चीर—हम ना जानि पवलीं॥
दांव पर जिनगी लगावत जी रहल जे
हार में बा मीर—हम ना जानि पवलीं॥
अब 'सतीशो' के ना सुरूता पर चढ़ाई
मिट गइल तसबीर हम ना जानि पवलीं॥
- पुस्तक : जल के धारा में दीयना (भोजपुरी गजल-संग्रह) (संकलन : अम्बदत्त गुंजन) (पृष्ठ 13)
- रचनाकार : सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
- प्रकाशन : भारतीय भोजपुरी साहित्य परिषद, मुजफ्फरपुर
- संस्करण : 1996
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