जिंदगी साज बनि के बज रहल बहुत बाटे
jindgi saaj bani ke baj rahal bahut bate
सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
Satishwar Sahay Verma 'Satish'
जिंदगी साज बनि के बज रहल बहुत बाटे
jindgi saaj bani ke baj rahal bahut bate
Satishwar Sahay Verma 'Satish'
सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
और अधिकसतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
जिंदगी साज बनि के बज रहल बहुत बाटे।
आदमी आज कसहूँ सज रहल बहुत बाटे॥
कबले हर मोड़ पर होते रही ई समझौता—
दरद अब खाड़ हो के कह रहल बहुत बाटे॥
माथ पर आके हवा जा रहल उपरे-उपरे—
बेछुअल तन में सांस चल रहल बहुत बाटे
मन अधातुर भइल जब रूप के ऊगल सूरज
छाँव संग जोत सगरो जल रहल बहुत बाटे॥
सून आकाश में बादर के छोट टुकड़ा बा,
असगरे नाव एगो दह रहल बहुत बाटे॥
कहाँ बा फासला जनम-मरन में अब कवनों
मउत गोदी में ठहरें पल रहल बहुत बाटे॥
- पुस्तक : जल के धारा में दीयना (भोजपुरी गजल-संग्रह) (संकलन : अम्बदत्त गुंजन) (पृष्ठ 32)
- रचनाकार : सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
- प्रकाशन : भारतीय भोजपुरी साहित्य परिषद, मुजफ्फरपुर
- संस्करण : 1996
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