छोड़ दीं, चलके कहीं से कहीं ले आए दीं
chhoD deen, chalke kahin se kahin le aaye deen
सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
Satishwar Sahay Verma 'Satish'
छोड़ दीं, चलके कहीं से कहीं ले आए दीं
chhoD deen, chalke kahin se kahin le aaye deen
Satishwar Sahay Verma 'Satish'
सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
और अधिकसतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
छोड़ दीं, चलके कहीं से कहीं ले आए दीं।
बंधल हवा के तनी खुल के खिलखिलाए दीं॥
भले मुस्कान के जंजीर गोड़ बाँध लिहीं,
मगर आवाज के बांधी, धरा पर छाए दीं॥
राह छेकले रहल ई झूठ के रिश्ता नाता,
कहाँ तक माथ पर केहू के हम चढ़ आए दीं॥
किरिन-किरिन के रंग में लाल लहू दउड़त बा,
छाँह छइले रही, मत घाम के बिलाए दीं॥
समय के बनके पहरूआ केहू जगावत बा—
बरिस ना दिन हरेक छन के सुगबुगाए दीं॥
कमल के नोक से गोदी हिया के अच्छर के
नया इतिहास के पन्ना के फड़फड़ाए दीं॥
- पुस्तक : जल के धारा में दीयना (भोजपुरी गजल-संग्रह) (संकलन : अम्बदत्त गुंजन) (पृष्ठ 34)
- रचनाकार : सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
- प्रकाशन : भारतीय भोजपुरी साहित्य परिषद, मुजफ्फरपुर
- संस्करण : 1996
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.