बनत नइखे गणित ई जिंदगी के जोर मुश्किल बा
banat naikhe ganit ii jindgi ke jor mushkil ba
बनत नइखे गणित ई जिंदगी के जोर मुश्किल बा
करीं बहुते गुणा भागा, मगर हर तोर मुश्किल बा।
बसल भीतर कलह के आग बुझते अब कहाँ बाटे,
गहिर बा रात करिया ई, सुहावन भोर मुश्किल बा।
चलत बानीं डगर पर काँट छितरल बा चलीं कइसे,
सहल जाई भला कइसे, सुनल ऊ शोर मुश्किल बा।
बुझत बानीं सभे बतिया, मगर दिल हार गइनीं हम,
कुहुक के हूक के पनिया, छुपावल लोर मुश्किल बा।
खुदे जोतल हमर बा जाल उल्फ़त से बचीं कइसे,
भले होखो बहुत तकरार तूड़ल डोर मुश्किल बा।
- पुस्तक : गुजर रहल बा जिन्दगी (कविता-संग्रह) (पृष्ठ 111)
- रचनाकार : अनीता साह
- प्रकाशन : ओरिएन्टल पब्लिकेशन हाउस प्रा. लि., काठमांडू, नेपाल
- संस्करण : 2025
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