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माँ होने से पहले एक स्त्री

घर से निकलकर अगर पेड़-पौधों पर नज़र दौड़ाई जाए तो क्या इनके इतिहास का पता लगाया जा सकता है? ये अचानक यहाँ आकर तो खड़े नहीं हुए। इनके जन्म, वृद्धि और विकास की भी अपनी कहानी है, जिसे स्पष्टतः कोई नहीं जानता, लेकिन जिसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

यक़ीनन कुछ बीज स्वतः पौधे का रूप लेकर विशाल वृक्ष बन जाते हैं, जिन्हें पेड़ का रूप देना किसी का उद्देश्य नहीं होता। कुछ ऐसे बीज भी होंगे, जिन्हें फल प्राप्ति के उद्देश्य से बोया गया होगा और आज वे पेड़ बनकर हमारे सामने हैं। अर्थात् अनुमान तो लगाया जा सकता है, लेकिन दावा नहीं किया जा सकता।

वर्तमान का विशाल वृक्ष अतीत के बीज का परिणाम है। यह पेड़ समाज के लिए अच्छा है या बुरा, यह उसकी प्रवृत्ति पर निर्भर करता है। आम का पेड़ फल देगा, नीम का पेड़ स्वच्छ वायु और बबूल है तो काँटे देगा।

ऐसा ही हाल समाज में बोए गए बीजों का भी होता है और ये बीज विचारों के हैं। जाने-अनजाने समाज में कुछ विचारों के बीज ऐसे ही बोए गए हैं, जो बाद में वृक्ष बनकर सकारात्मक और नकारात्मक परिणाम देते हैं। कभी-कभी तो एक ही विचार किसी के लिए सकारात्मक और किसी के लिए नकारात्मक परिणाम भी देता है। बिल्कुल वैसे ही जैसे अत्यधिक वर्षा धान के पौधे के लिए ऊर्जा है और गेहूँ के पौधे के लिए अभिशाप।

इतना ही नहीं, अधिकतर एक ही विषय पर दो अलग लोगों के लिए अलग विचार, अलग नियम और अलग फैसले भी होते हैं। जिन्हें स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन किया जाता है। क्यों?

लोग अक्सर कहते हैं कि स्त्रियों की प्रगति का समाज विरोध करता है या सामाजिक ढाँचा ऐसा है कि वह स्त्रियों को आगे नहीं बढ़ने देता। क्या कभी किसी ने इसके कारण पर विचार किया है? चर्चा की है? कारण पर बात करने से सभी बचते हैं और बचते रहेंगे।

इन्हें कौन समझाए? काँटों से भरा पेड़ बार-बार काटने से नहीं, बल्कि जड़ से उखाड़कर फेंकने से ख़त्म होगा।

सामाजिक ढाँचा भी ऐसा ही है। आधुनिकता समाज से नहीं, बल्कि समाज की जड़ों में मौजूद आधुनिक विचारों से आएगी। यही सच है। हम जिस समाज की बात करते हैं, वह समाज अपने आप तो नहीं बना। समाज का हर व्यक्ति अलग है। इसका मतलब है कि हर व्यक्ति के समाज के लोग भी अलग हैं। हर व्यक्ति का समाज उसके पास-पड़ोस, मित्रों और रिश्तेदारों से बनता है, जिसकी शुरुआत उसके अपने परिवार या नज़दीक रहने वालों से होती है।

परिवार अपने ही हर सदस्य के लिए अलग नियम बनाता है और अलग फ़ैसले लेता है। ऐसा ही एक नियम, फ़ैसला या रूढ़िवादिता है—जहाँ पुरुष का पुनर्विवाह परिवार, समाज, मित्र और रिश्तेदार, सभी को स्वीकार है। इतना ही नहीं, उसकी अपनी संतान भी इसमें आपत्ति नहीं करती। वहीं स्त्री का पुनर्विवाह समाज तो बहुत दूर, उसकी अपनी संतान ही स्वीकार नहीं कर पाती। आख़िर क्यों नहीं कर पाती?

विचार! विचारों की रूढ़िवादिता—जिसके बीज अतीत में किसी ने बो दिए और वर्तमान में वह अपनी जड़ें इतनी मज़बूत कर चुकी है कि उसे जड़ से उखाड़ना बेहद मुश्किल हो गया है। जो किसी के लिए वरदान है और किसी के लिए अभिशाप—अर्थात् ज़िंदगी भर की मनोवैज्ञानिक घुटन।

किसी स्त्री के लिए फ़ैसला तब तक ही मुश्किल होता है, जब तक उसके परिवार के लोग उसका साथ नहीं दे रहे होते। परिवार में सबसे अधिक भूमिका उसकी अपनी संतान की होती है। वह हमेशा माँ बनकर बच्चे के लिए ताक़तवर होती है और अपने लिए कमज़ोर।

किसी की असल ज़िंदगी में ताक-झाँक करने से अच्छा है कि कहानी का सहारा लिया जाए। एक पॉपुलर सीरियल ‘सैराब’ की मुख्य किरदार नयनिका एक सिंगल मदर है। उसका लगभग 18 साल पहले तलाक़ हो गया है। तलाक़ उसके पति के विश्वासघात के कारण हुआ, जहाँ उसने अपनी पत्नी के अधिकार किसी और को दे दिए। इसका ख़मियाज़ा नयनिका ने ज़िंदगी भर तलाक़शुदा होने के ताने, दर्द और तन्हाई के रूप में चुकाया।

नयनिका अकेली अपनी बेटी टिन्नी की परवरिश करती रही। ज़िंदगी के बेशक़ीमती साल उसने सिर्फ़ माँ की भूमिका निभाने में ख़र्च कर दिए।

42 साल की उम्र में जब नयनिका की ज़िंदगी में ख़ुशियाँ दस्तक देना चाहती हैं, ईशान उसके ज़ख़्मों पर मरहम लगाना चाहता है और उसका हमसफ़र बनना चाहता है। तब समाज के नाम पर परिवारवाले और रिश्तेदार ही सबसे बड़ी रुकावट बन जाते हैं। नयनिका इन्हें नज़रअंदाज़ कर भी दे तो सबसे बड़ी रुकावट उसकी अपनी बेटी टिन्नी है।

जहाँ टिन्नी अपने पिता का विरोध उनकी दूसरी शादी और शादी में रहते हुए माँ के साथ किए गए विश्वासघात को लेकर नहीं करती, वहीं वह अपनी माँ का विरोध ईशान से उसकी दोस्ती पर भी करती है।

अंगना ने इंद्रानील के साथ बिना शादी के रिश्ता रखा और गर्भवती हो गई। उसे अपनी इस ग़लती पर ज़रा भी पछतावा नहीं है। बल्कि इंद्रानील से शादी के इतने साल बाद भी वह नयनिका से ख़ुद को इनसिक्योर समझती है। जब मौक़ा मिलता है, नयनिका को जली-कटी सुनाकर उसका अपमान करती है।

इंद्रानील अपने परिवारवालों की नज़र में बिल्कुल सही है। बहू ने तलाक़ के बाद भी बहू होने की ज़िम्मेदारी निभाई, उसके लिए किसी के दिल में सहानुभूति नहीं है। उनका बेटा दूसरी शादी करके ज़िंदगी गुज़ार सकता है, लेकिन तलाक़शुदा बहू के मन में किसी का ख़याल भी नहीं आना चाहिए।

इंद्रानील ने पति होने पर पति की ज़िम्मेदारी नहीं निभाई, तलाक़ के बाद टिन्नी के पिता होने का कोई फ़र्ज़ अदा नहीं किया। फिर भी वह जब-तब नयनिका का जज बनकर सामने आता है, जैसे नयनिका उसकी संपत्ति हो।

जिन्होंने नयनिका को ज़िंदगी दी, उसके माता-पिता भी उसके ख़िलाफ़ हैं। उन्हें भी यह बर्दाश्त नहीं कि वह अपनी ज़िंदगी किसी के साथ फिर से शुरू करे। उन्हें लगता है कि नयनिका की दूसरी शादी करने से समाज में उनकी इज़्ज़त कम हो जाएगी। वह समाज, जो कभी मदद के लिए नहीं आता, जिसे किसी के दुख से कोई मतलब नहीं है, लेकिन कोई अगर अपनी ज़िंदगी में ख़ुश रहना चाहता है तो जज बनकर फ़ैसला सुनाने ज़रूर आता है। नयनिका के लिए यह समाज कोई अनजान नहीं, उसका अपना परिवार ही है।

जब ईशान की ज़िंदगी ख़तरे में देखकर नयनिका अपनी भावनाओं के इज़हार से ख़ुद को नहीं रोक पाती, तब सबसे ज़्यादा दिल ज़ख़्मी करने वाले अल्फ़ाज़ों से टिन्नी ने ही अपनी माँ को नवाज़ा।

टिन्नी ख़ुद शिर्शो से प्रेम करती है, उसे खोना नहीं चाहती। ऐसे में उसे समझना चाहिए कि जीवनसाथी की क्या अहमियत होती है। लेकिन उसके भीतर की ख़ुदगर्ज़ बेटी को लगता है कि माँ का सिर्फ़ माँ होना काफ़ी है। उसे किसी और की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए। बहुत लोग ज़िंदगी अकेले गुज़ारते हैं, तो उसकी माँ क्यों नहीं ऐसा कर सकती?

टिन्नी अपनी माँ की मानसिक तक़लीफ़ को नज़रअंदाज़ करती रही है। कुदरत ने नयनिका को इस तक़लीफ़ से निकलने का एक मौक़ा दिया, जिसकी सबसे बड़ी रुकावट टिन्नी बन गई। 

बेशक यह कथावस्तु एक धारावाहिक की हो, लेकिन क्या यह समाज का विषय नहीं है? एक ऐसा विषय, जिस पर लोग विचार कर भी लें तो इसकी जड़ों पर काम नहीं करेंगे। स्त्रियों के जीवन में, समाज की दुहाई देकर हर बार कोई अपना ही अपनों की ख़ुशियों के आड़े आ जाता है।

ऐसे न जाने कितने रूढ़िवादी विचार हैं, जिनके बीज किसने बोए, कोई नहीं जानता। यही रूढ़िवादी विचारों की जड़ें न जाने कितनी ज़िंदगियों की ख़ुशियों को जकड़े हुए हैं। इस जकड़न से समाज निकालने नहीं आएगा।

औरत माँ बनकर बेशक अपने लिए कमज़ोर हो जाती है, अब उसे ताक़तवर होना चाहिए। उसे समझना चाहिए कि इन विचारों की जकड़न से निकालने कोई नहीं आएगा। चाहे वह उसकी वही संतान क्यों न हो, जिसे ज़िंदगी देने के लिए उसने ख़ुद को ख़तरे में डाला हो या जिसकी परवरिश में अपना सब कुछ गँवा दिया हो।

सामाजिक जकड़न बहुत ख़तरनाक है, जो इंसान की नैतिकता, ख़ुशियों और स्वतंत्रता को जकड़े हुए है।

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