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काहे जननी क सनेहिया परइला तोड़ के

kahe janani ka sanehiya paraila toD ke

रामजियावान दास ‘बावला’

रामजियावान दास ‘बावला’

काहे जननी क सनेहिया परइला तोड़ के

रामजियावान दास ‘बावला’

और अधिकरामजियावान दास ‘बावला’

    बबुआ कहा काहे अइला तूँ नगरिया छोड़ के।

    काहे जननी सनेहिया परइला तोड़ के॥

    सपना निरास होई माई अँगनवा।

    पालि के सयान कइलीं प्यार ललनवा।

    कूदि जाई छतिया से दूध फोड़ के,

    काहे जननी सनेहिया परइला तोड़के॥

    बेदना प्रसव काल वाली गोहराई।

    निदिया उमंग भरि बिंदिया लगाई।

    गोदिया पलनवाँ से मुंह मोड़ के,

    काहे जननी सनेहिया परइला तोड़के॥

    उड़ि उड़ि अँखिया बिराने ओर जइहैं।

    अँगना में चान अँजोर नाहीं अइहैं।

    कोनवा में कँहरी पनहियाँ गोड़ के,

    काहे जननी सनेहिया परइला तोड़के॥

    बावला बिबस मन इत उत डोली।

    कबहूँ अगनवाँ सुगनवा बोली।

    दही और भात रोई संग जोड़ के,

    काहे जननी सनेहिया परइला तोड़के॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : गीतलोक (पृष्ठ 67)
    • रचनाकार : रामजियावान दास ‘बावला’
    • प्रकाशन : सेवक प्रकाशन, वाराणसी
    • संस्करण : 1997

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