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जनतंत्र

jantantr

केकर केकर लेहीं नाँव कमरी ओढले सगरों गाँव, का बताई मितवा॥

दुख देले परिछाईं का बताईं मितवा॥

राम राज के सपना में अपना केहु कहीं बाटै।

उलट के छूरा भाई अपने भाई गर काटै, का बताईं मितवा॥

लागैं चारो ओरियाँ चाईं का बताईं मितवा॥

अनहोनी लगल बा नम्बर आये दिन दुर्घटना।

नट बिदवा खेल होत बा बइठ के दिल्ली पटना, का बताई मितवा॥

केके दोषी ठहराईं का बताईं मितवा॥

एक ओर खाईं धँसल जात बा चोटी जात अकासे।

समाज वादी नारा देलैं कथा गइल कैलासे, का बताईं मितवा॥

कइसे दोविधा हम मेटाईं का बताईं मितवा॥

मंत्र लागै मंत्रिन षड्यन्त्री भइलैं आगे।

बड़ी समस्या बिकट बावला सुलझै अपने भागे, का बताईं मितवा॥

केकरे मुँह में जिभिया नाईं का बताईं मितवा॥

स्रोत :
  • पुस्तक : गीतलोक (पृष्ठ 190)
  • रचनाकार : रामजियावान दास ‘बावला’
  • प्रकाशन : सेवक प्रकाशन, वाराणसी
  • संस्करण : 1997

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