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बबुआ बोलता ना

babua bolta na

रामजियावान दास ‘बावला’

और अधिकरामजियावान दास ‘बावला’

    सीय सँगे सुकुवारि निहारि गँवारी बिचारि थकै लहेला

    गौर किसोर सँवारल साँवर रोक रखीं मन मोर कहैला।

    केहू जने बन जोग रे अनियाय कइसे विधाता सहैला।

    आँचर आँजत आँखिन में सब पूछैं बटोही कहाँ तूँ रहैला।

    कहवाँ से आवैला कवन ठाउँ जइबा बबुआ बोलता ना।

    कौन दिहले तोके बनबास, बबुआ बोलता ना।

    कवने करनवाँ बतावा अइला बनवां।

    कोने कोने घूमेला भँवरवा जइसे मनवाँ।

    कउनी हो नगरिया में अँजोरिया नाहीं भावै, बबुआ बोलता ना।

    कहवां रात भावै बरहो मास बबुआ बोलता ना॥

    रूठि गइलीं रिधि सिधि चललीं रिसियाइ के।

    कउनी हो नगरिया में अगिया लगाइ के।

    कहवाँ के लोगवा के भोगवा नाहीं भावे बबुआ बोलता ना।

    दिहलें तोहके घरवा से निकास, बबुआ बोलता ना॥

    विधना जरठ मति अटपट कइलैं रे।

    कि या कवनों भूल तीनों मूरती से भइलैं रे।

    किया रे अभागा कउनों लागा बाँदी कइलैं, बबुआ बोलता ना।

    कि या कतहूँ पउला ना सुपास, बबुआ बोलता ना॥

    हम बनवासी बबुआ माना हमरी बतिया।

    बावला समाज में बिताय ला एक रतिया।

    कन्द मूल फल जल सेवा में जुटइबै बबुआ बोलता ना।

    सेवा करबै माना बिसवास, बबुआ बोलता ना॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : गीतलोक (पृष्ठ 70)
    • रचनाकार : रामजियावान दास ‘बावला’
    • प्रकाशन : सेवक प्रकाशन, वाराणसी
    • संस्करण : 1997

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