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बैठि रही अति सघन बन

baithi rahi ati saghan ban

बिहारी

बिहारी

बैठि रही अति सघन बन

बिहारी

और अधिकबिहारी

    बैठि रही अति सघन बन, पैठि सदन-तन माँह।

    देखि दुपहरी जेठ की, छाँहौं चाहति छाँह

    बिहारी ने प्रत्यक्ष रूप से तो जेठ की दुपहरी की भयंकरता का वर्णन किया है, किंतु एक दूसरा संकेत भी है। जेठ की भीषण दुपहरी को देखकर एक नायिका नायक से कह रही है कि तुम इस भयानक गर्मी में कहीं मत जाओ। घर में ही रहो। वह कहती है कि देखो न, जेठ के महीने में इतनी गर्मी पड़ रही है कि छाया भी छाया चाह रही है अर्थात् छाया कहीं है ही नहीं मानों वह भी अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए किसी दूसरी छाया के नीचे छिप जाना चाहती है। यह एकांत-मिलन का सुंदर अवसर है। ऐसा अवसर बार-बार नहीं मिलता है। नायिका यह कहकर व्यंजित कर रही है कि इस अवसर का सदुपयोग कर लो अन्यथा पश्चाताप होगा।

    स्रोत :
    • पुस्तक : बिहारी सतसई (पृष्ठ 199)
    • संपादक : हरिचरण शर्मा
    • रचनाकार : बिहारी
    • प्रकाशन : श्याम प्रकाशन, जयपुर
    • संस्करण : 2007

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