मेरी रचनात्मकता और मेरे द्वंद्व
मनोज रूपड़ा
03 अप्रैल 2026
बरसों पहले मैंने एक लेख लिखा था, लगभग इसी मामले में कुछ सोचा था कि रचनाकार की अनुभूति और जो जीवन वह जीता है और जो कुछ भी वह लिखता है या लिख पाता है उसमें कितना अंतर्विरोध होता है। किसी भी रचनाकार के लिए इससे बड़ा द्वंद्व क्या हो सकता है कि वह जीवन को एक तरह से जिए और उसे काग़ज़ में दूसरी तरह से उतरना पड़े। जिए-भोगे को काग़ज़ में न उतार पाने के द्वंद्व के कई कारण हो सकते हैं। मैंने अपने उस लेख में दो कारणों को फ़ोकस किया था—राजनीतिक तानाशाही और सामाजिक वर्जनाएँ। ये दो चीज़ें लेखक की अभिव्यक्ति में सबसे बड़ी रूकावट रही है।
‘वास्तविक दुनिया और कलाकारों का प्रतिसंसार’ शीर्षक से लिखे गए उस लेख में मैंने अपने व्यक्तिगत रचनात्मक द्वंद्व के बारे में तो कुछ नहीं कहा था, लेकिन दुनिया के कई महानन् उस्ताद लेखकों और कलाकारों के बारे में लिखा था, जिनमें से कुछ ऐसे लेखक थे जो किसी भी तरह के द्वंद्व में नहीं पड़े थे और सीधे संग्राम में कूद पड़े थे। लेकिन कुछ लेखक ऐसे भी थे जो अपने समय की भयंकर सच्चाइयों का सामना न कर पाने के कारण रचनात्मक-वैचारिक और भावनात्मक द्वंद्व में पड़कर अवसाद और आत्मनाश के शिकार हो गए। जर्मनी में नाज़ी शासन के दौरान जब दमन और संहार अपनी चरमसीमा पर था, तब कई बुद्धिजीवियों और लेखकों ने अपने आपको तटस्थ कर लिया। बाद में वे अवसाद के शिकार हुए और उनमें से कई ने आत्महत्या कर ली। स्टीफ़न स्वाइग उनमें से प्रमुख हैं। इसके विपरीत स्पेन की मुक्ति के लिए इंटरनेशनल बिग्रेड में शामिल होकर कई लेखकों ने अपनी आहुति दी। इनमें जॉन कॉर्नफ़ोर्ड, राल्फ़ फ़ॉक्स और क्रिस्टोफ़र कॉड्वेल प्रमुख हैं। हमारे यहाँ आज़ादी की लड़ाई और फिर नक्सलवाद के उभार और फिर इमरजेंसी के दौरान बहुत सारे लेखकों में यह कशमकश थी। सिर्फ़ भारत में ही नहीं, ठीक उसी दौरान तीसरी दुनिया के अनेक देशों में, लैटिन अमेरिका में और अफ़्रीका में, अनेक अश्वेत लेखक इस भयंकर द्वंद्व से जूझते रहे कि क़लम उठानी चाहिए या उसे छोड़कर बंदूक़ उठा लेनी चाहिए या दोनों काम एक साथ करने चाहिए।
दक्षिण अफ़्रीका के सबसे अधिक प्रतिभाशाली युवा कवि आर्थर नात्जे ने इसी द्वंद्व में पड़कर मात्र इक्कीस साल की उम्र में आत्महत्या कर ली। आर्थर नात्जे की मौत ठीक उसी समय हुई थी, जिस समय हमारे यहाँ गोरख पांडेय ने आत्महत्या की थी। ठीक उसी समय वेनेज़ुएला में कार्लोस रेंजल ने आत्महत्या की थी। ठीक उसी समय महाराष्ट्र में विलास घोगरे ने आत्महत्या की। ठीक उसी समय नाइजीरिया के कवि केन सारो वीवा को फाँसी पर चढ़ाया गया। ठीक उसी समय अल्जीरिया के कवि ताऊहर जाऊल और भारत में पंजाबी के सबसे ज़्यादा प्रतिभाशाली कवि पाश की उग्रवादियों ने हत्या कर दी। इन सबकी मौत का एक ही कारण था—या तो वे चुप नहीं रह पाए या फिर बोल नहीं पाए। कुछ लेखकों की मौत उनकी राजनीतिक सक्रियता के कारण हुई और कुछ लेखकों को सक्रिय हिस्सेदार न बन पाने की हताशा और शर्म ने मार डाला।
उन सबको यह एहसास हो गया था कि वे कविता में काल्पनिक रूप से जहाँ चाहें वहाँ गोली दाग सकते हैं, जिस किसी तानाशाह को सूली पर चढ़ा सकते हैं। वे पोस्टरों पर रूपकों-प्रतीकों-बिम्बों में उसे उल्टा भी लटका सकते हैं और गधे पर भी बैठा सकते हैं, लेकिन हक़ीक़त में उसका एक बाल भी बाँका नहीं कर सकते। आज तीसरी दुनिया के सभी देशों के द्वंद्व का असली कारण यही है कि वैचारिक रूप से वे चाहे कितने भी ताक़तवर हों, लेकिन आख़िरकार निहत्थे हैं। यही निहत्थापन उनके लिए रचनात्मक द्वंद्व का सबसे बड़ा कारण बन जाता है।
हमारे समकालीन कवियों-लेखकों को कई बार हाइपर-टेंशन और नर्वस-डिप्रेशन से गुज़रना पड़ता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि उनके उन्हीं मानसिक-वैचारिक संघर्षों से कई बार बहुत उत्कृष्ट सृजनात्मक लेखन भी उत्पन्न होता है और कई बार इन्हीं संघर्षों के कारण वे ख़ुद स्नायु रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं। कितनी विचित्र बात है कि एक लेखक के इंद्रिय-वेग, जीवन-वेग और भाव-वेग के बीच जो द्वंद्व-प्रतिद्वंद्व चलता है, वही उसकी उत्कृष्ट रचना का कारण बनता है और वही द्वंद्व उससे उसका स्वास्थ छीन लेता है। महानतम कलाकारों के साथ ऐसा ही हुआ है—मंटो, ऋत्विक घटक, मायकोव्स्की, स्टीफ़न स्वाइग, हेमिंग्वे, गुरुदत्त, निराला, मुक्तिबोध, काफ़्का... और भी न जाने कितने लेखक होंगे जो द्वंद्व की चरम पराकाष्ठा के बाद सृजन की एक उज्ज्वल अवधि के बाद या तो पागल हो गए या या स्नायविक तनाव से मर गए या एल्कोहलिक हो गए या उन्होंने आत्महत्या कर ली।
अगर हम चाहें तो मनोवैज्ञानिकों के विश्लेषणों के आधार पर लेखकों के रचनात्मक द्वंद्व का भाव-वर्णन और विवेचन कर सकते हैं, पर पहले इस बात से सहमत होना पड़ेगा कि लेखक एक आम इंसान नहीं है। लेखक एक अलग क़िस्म का प्राणी है। उसकी भावनाओं और विचार की एक अलग अवस्था है, जिसमें कई प्रकार के विकार भी उत्पन्न हो सकते हैं; क्योंकि उसका दिमाग़ हमेशा रैशनल नहीं होता, उसके दिल-ओ-दिमाग़ की सूक्ष्म कोशिकाओं में कई तरह के उलटफेर होते हैं, ज़रूरी नहीं कि हर बार वे तर्कसंगत हों। मानसिक दृष्टि से वह उत्तेजना या उद्वेग की स्थिति है, जिसमें प्रबल अनुभूति और बाहरी विरोधाभासों के बीच संघर्ष चलता रहता है। जितना बाहर विरोधाभास दिखाई देगा, उतना ही अंदर भाव तीव्र होगा और यह तीव्र भाव न केवल उसके दिमाग़ को अस्त-व्यस्त करते हैं, बल्कि उसे पीड़ा भी पहुँचाते हैं और वह पीड़ा लेखक के लिए उत्प्रेरक शक्ति का काम करती है। वह और अधिक सोचता है, ख़ुद को और अधिक पीड़ित करता है; क्योंकि हर सर्जक के भीतर एक संहारक वृत्ति भी होती है, जिसके वशीभूत होकर वह चाहता तो है उन स्थितियों को नष्ट करना जो अमानवीय हैं, भद्दी हैं और बहुत जटिल और कुटिल हैं, लेकिन जब वह ऐसा कर नहीं पाता तो प्रकारांतर से ख़ुद अपने ही स्नायुओं को नुक़सान पहुँचा देता है। उसका विद्रोह उलट जाता है। वह एक तरह के रिवर्स-एक्टिविज़्म का शिकार हो जाता है।
मैंने अपने उस लेख में यही विचार सामने रखा था कि कुल-मिलाकर लेखक के द्वंद्व का असली कारण यह है कि वह वास्तविकता के अराजक संसार को अपने ढंग से अनुकूलित करना चाहता है, क्योंकि वह ऐसा मानकर चलता है कि उसकी रचनात्मक दुनिया वास्तविक दुनिया की अपेक्षा ज़्यादा सुंदर, ज़्यादा स्वतंत्र, ज़्यादा व्यवस्थित, ज़्यादा मानवीय है। ऐसी दुनिया जो उसकी मानसिक बनावट के अनुकूल होती है और जो अपना रूप एक बड़े पैमाने पर ख़ुद अपने ही द्वारा ईजाद किए गए निजी मानसिक उपकरणों और तंत्रों से ग्रहण करती है। लेखक अपनी इस आदर्श संभावनाओं की काल्पनिक लेकिन बेहद मानवीय दुनिया को वास्तविक दुनिया की अराजकता और अमानवीयता पर स्थापित करना चाहता है। लेखक अमरत्व और शाश्वत में विश्वास करता है, इसलिए वह सौंदर्य के विनाश की कल्पना से दुखी हो जाता है। हालाँकि वह जानता है कि हर चीज़ का कभी न कभी कहीं न कहीं अंत होगा। लेकिन फिर भी उसकी यह कामना रहती है कि उसकी प्रिय वस्तुएँ शाश्वत रहें, उनका सौंदर्य कभी नष्ट न हो। वह किसी भी तरह के बंधन को बर्दाश्त नहीं करता। उसके लिए राजनीतिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता में कोई फ़र्क नहीं होता। वह सिर्फ़ राजनीतिक स्वतंत्रता ही नहीं चाहता, सामाजिक स्वतंत्रता भी चाहता है। वह जानता है कि प्रेम और स्वच्छंदता के रास्ते में वर्जना दैत्य की तरह खड़ी रहती है। वह यह भी जानता है कि वर्जना न हो तो सभ्यता और संस्कृति का गढ़ ताश के महल की तरह ढह जाएगा, लेकिन फिर भी वह इंसान को अतृप्ति और प्यास से दम तोड़ते नहीं देख सकता। वह दो अलग विरोधी वस्तुओं के बीच सामंजस्य रचना चाहता है। इसी मनःस्थिति में फँसे रहने के कारण वह कभी रचनात्मक द्वंद्व से उबर नहीं पाता।
यह द्वंद्व किसी शोले की तरह उसके अंदर सुलगता रहता है और लेखक के तापमान को बढ़ाता रहता है। एक समय के बाद यही तपिश उसका स्थायी भाव बन जाती है। अपने दोस्त अहमद नदीम कासमी को मंटो ने एक पत्र लिखा था, ‘‘मेरी ज़िंदगी एक दीवार है, जिसका पलस्तर मैं नाख़ूनों से खुरचता रहता हूँ। कभी चाहता हूँ कि इसकी तमाम ईंटें गिरा दूँ, कभी यह जी में आता है कि इस मलबे के ढेर पर एक नई ईमारत खड़ी कर दूँ। इसी उधेड़बुन में लगा रहता हूँ। दिमाग़ हर वक़्त काम करने के कारण तपता रहता है। मेरा सामान्य तापमान किसी भी सामान्य आदमी से एक डिग्री ज़्यादा है, जिससे आप मेरी भीतरी तपिश का अंदाज़ लगा सकते हैं।’’
मंटो ने ऐसा इसलिए कहा था; क्योंकि हर बड़े लेखक के अंदर एक दूसरा आदमी होता है, जो सामान्य और औसत दर्जे की ज़िंदगी को स्वीकार नहीं करता। वह दूसरा आदमी हर चीज़ को अपनी कलानुभूति के अनुसार जीना चाहता है। वह एक बेदाग़ संपूर्णता चाहता है।
गुरुदत्त की मृत्यु के बाद वहीदा रहमान ने उनकी कला और उनकी ज़िंदगी पर महत्त्वपूर्ण बात कही थी कि ‘‘वह अपनी कला में और अपनी ज़िंदगी में एक ऐसी परिपूर्णता चाहते थे जो सिर्फ़ ख़्वाब में ही मुमकिन थी। वह मानने को शायद तैयार नहीं थे कि कला में और ज़िंदगी में बेदाग़ परिपूर्णता नामुमकिन है। ज़िंदगी के कुछ ढाँचे इतने पक्के होते हैं कि तोड़ने से नहीं टूटते, सिर्फ़ इतना ही नहीं... हम उन्हें बदल भी नहीं सकते।’’
वहीदा रहमान ने यह बात इसलिए कही होगी, क्योंकि वह उन्हें क़रीब से जानती थीं। उन्होंने गुरुदत्त के अंदर के उस दूसरे आदमी को देख लिया होगा जो समाज में फैली तथाकथित शांति और व्यवस्था को बर्दाश्त नहीं कर पाता और अपनी कला और अपनी ज़िंदगी से उसका कोई समाधान नहीं निकाल पाने के कारण बेचैन रहता था और यह बेचैनी सिर्फ़ उसे सृजन की ऊँचाइयों की तरफ़ नहीं ले जा रही थी, मौत की तरफ़ भी ले जा रही थी।
कुछ लेखक ऐसे भी थे जिन्होंने अपने भीतर के उस दूसरे आदमी को ख़ुद पहचान लिया था। अपनी आत्महत्या से पहले मायकोव्स्की ने कहा था, ‘‘राजनीति में, कविता में यहाँ तक समुद्र पार हाथों में मेगाफ़ोन लिए जब मैं ‘नेत्ते’ जहाज़ को संबोधित करता हूँ—अपने भीतर के दूसरे मायकोव्स्की से कोई डर नहीं लगता, लेकिन भावुकता की झील के पास, जहाँ बुलबुल गाती है, जहाँ झिलमिलाता चाँद नीचे उतरकर प्यार की कश्ती खे रहा होता है—वहाँ मेरा दूसरा मुझ पर ताक़तवर हो जाता है। ...मुझे महसूस होता है कि मैंने अपने असली ‘मेटलिक’ मायकोव्स्की की हत्या न की तो बहुत संभव है कि वह एक खंडित मनुष्य की तरह जीता चला जाए।
क्या होती है खंडित मनुष्य की तरह जीने की पीड़ा, यह केवल वही समझ सकता है जिसका व्यक्तित्व खंडित हो चुका हो। ठीक इसी तरह का अनुभव काफ़्का को भी हुआ था। काफ़्का ने भी अपनी डायरी में लिखा था, ‘‘मैं एक प्रकार के मानसिक सन्निपात की पीड़ा अनुभव कर रहा हूँ। जीवन की दशा को झेलना असंभव है, क्योंकि घड़ियों में एकरूपता नहीं है। भीतर की घड़ी शैतानी गति से चली जा रही है, जो भी हो उसकी चाल मनुष्य जैसी नहीं है और बाहर वाली असाधारण गति से लँगडाती हुई विपरीत दिशा में चल रही है। दूसरा क्या हो सकता है यही तो कि आंतरिक और बाह्य संसार अलग हो जाएँ और ये अलग हो रहे हैं।’’
काफ़्का, मायकोव्स्की, मंटो, गुरुदत्त, ऋत्विक घटक और भी कई ऐसे कलाकार लेखक होंगे; जिन्होंने अपनी अनुभूतियों के अनुरूप अपना जीवन जीने की क़ीमत चुकाई। मैंने यहाँ सिर्फ़ कुछ ही उदाहरण दिए हैं।
बहरहाल, यह तो हो गई जगबीती अब आपबीती पर आते हैं। जब मैंने इस तरह के स्वपीड़क लेखकों पर अपना लेख लिखा था, तब मेरी उम्र सिर्फ़ चौबीस साल थी। उस लेख को पढ़ने के बाद मेरे अग्रज लेखकों सत्येन कुमार और मंज़ूर एहतेशाम ने मुझे डाँट लगाई थी कि तुम इन सब चक्करों में क्यों पड़ गए हो। अभी तुम्हारी उम्र रोमांस करने की है। ऊपरवाले ने तुमको अच्छी शक्ल-ओ-सूरत दी है और कहानी लिखने का हुनर दिया है, तुम क्यों इस तरह के द्वंद्व-फंद में पड़े हो? जाओ पहले दो-चार ख़ूबसूरत लड़कियों से आँखें मिलाओ, मोहब्बत करना सीखो फिर दो-चार यादगार और शानदार कहानी लिखो। इस तरह का लेख लिखने के लिए ज़िंदगी एक उम्र का हिसाब माँगती है। पहले ख़ुद के तजुर्बे हासिल करो। दूसरों की ज़िंदगी के द्वंद्व के बारे में लिखना आसान है, ख़ुद अपने जीवन की उलझनों के बारे में लिखना ज़्यादा मुश्किल है।
यह बात मुझे चुभ गई थी और उसके बाद मैंने दूसरों की ज़िंदगी में ताक-झाँक करना बिल्कुल बंद कर दिया। अब मेरी उम्र साठ के पार चली गई है; बीते सालों में मैंने कभी रचनात्मक द्वंद्व के बारे में कुछ नहीं सोचा, लेकिन इतने सालों बाद जब प्रियंवद जी ने यह विषय सामने रखा तो लगा अब अपने गिरहबान में झाँकने की नौबत आ गई है। जब मैंने अपने भीतर झाँक कर देखा तो मुझे अपने भीतर दूर-दूर तक कोई ऐसी बात दिखाई नहीं दी, जिसने मुझे और मेरे लेखक को द्वंद्व में डाला हो। हालाँकि मैंने ऐसी कई कहानियाँ लिखी हैं, जिनमें कई तरह की मानसिक उथल-पुथल है। दमन और अत्याचार है। आत्मपीड़न और आत्महत्याएँ भी हैं; लेकिन मेरी कहानियों में जितनी भी लोमहर्षक घटनाएँ हैं, उनमें से किसी एक ने भी मुझे व्यक्तिगत रूप से इतना विचलित नहीं किया कि मैं द्वंद्व में पड़ जाऊँ और उसे लिख ही न पाऊँ। क्यों? क्या इसलिए कि यह सब ख़ून-ख़राबा किसी और के साथ हुआ था, मेरे साथ नहीं? शायद हाँ! असली द्वंद्व तो तब होता है, जब ख़ुद आपके साथ कुछ होता है और आप उसे लिख नहीं पाते। मेरे साथ ऐसा कब हुआ था? वह कौन-सा क्षण या कौन-सी बात थी, जिसने सबसे ज़्यादा मेरे दिल-ओ-दिमाग़ को प्रभावित किया और उस प्रभाव को मैं शब्दों में परिभाषित नहीं कर पाया?
बहुत सोचने के बाद मुझे अपने बचपन की एक घटना याद आई। मैं जब बारह साल था का था, तब एक बिल्ली के बच्चे को मुझसे प्यार हो गया था। वह बच्चा अपनी माँ से बिछड़कर मेरी दुकान में चला आया था। मैंने जब उसे पुचकारा और उसके सिर को सहलाया तो बस उसी एक पल में उसने अपनी पूरी ज़िंदगी मेरे नाम कर दी। उसे मुझसे इतना प्यार हो गया कि वह एक पल भी मेरे बिना रह नहीं पाता था। मैं जहाँ भी जाऊँ, वह बिल्ली मेरे पीछे-पीछे आती थी। उसकी आँखों में हमेशा एक अजीब तरह की प्रेम की भूख दिखाई देती थी। मैं उसे गोद में लेकर उसके माथे को सहलाता था, लेकिन कितना भी सहलाऊँ उसका मन नहीं भरता था। मुझे जब स्कूल जाना होता था तो उसे एक कमरे में बंद कर देता था ताकि वह मेरे पीछे-पीछे न आए। उसे यह समझाना बहुत मुश्किल था कि गली में आवारा कुत्ते भी हैं, जो उसे ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे। उसे तो बस मेरा साथ चाहिए था—किसी भी क़ीमत पर, चाहे उसके लिए उसकी जान ही क्यों न चली जाए! एक बार जब मैं सड़क क्रास कर रहा था तो वह मेरे पास आने के लिए एकदम से दौड़ी और राह से गुज़रती एक साइकिल के पिछले पहिये में उसकी दोनों पिछली टाँगें कुचल गईं। मैं उसे वेटनरी हॉस्पिटल ले गया। डाक्टर ने उसके पैरों में पट्टियाँ बाँध दीं, एक इंजेक्शन लगा दिया और यह भी बता दिया कि अब यह ज़्यादा दिन जिएगी नहीं। मैं उसे घर ले आया और अपना सब काम छोड़कर उसकी देखभाल करने लगा। उसे इस बात का ज़रा भी बोध नहीं था कि उसके साथ क्या हो गुज़रा है। वह अब भी अपनी पिछली टाँगों को घसीटते हुए मेरे पीछे-पीछे चलती रहती थी। कुछ दिनों बाद उसके ज़ख़्मों से बदबू आने लगी। उसका जिस्म बिल्कुल सिकुड़ गया, उसने दूध पीना भी छोड़ दिया; लेकिन उसकी आँखों में प्रेम पाने की भूख अभी तक ज्यों कि त्यों बरकरार थी। घरवालों ने कहा कि उसे कहीं छोड़ आओ; क्योंकि वह ज़िंदा सड़ने लगी थी, लेकिन मेरा मन नहीं माना। एक दिन जब वह एकदम सुस्त पड़ गई और बार-बार थपथपाने के बाद भी बहुत मुश्किल से अपनी आँखें खोल पा रही थी तो मैं घबरा गया और उसे लेकर अस्पताल की ओर दौड़ा। हड़बड़ी और बौखलाहट के कारण मुझे यह भी नहीं सूझा कि उसे किसी टोकरी या किसी झोले में डालकर ले जाऊँ, ताकि कुत्ते उसे देख न पाएँ। लेकिन आख़िर वही हुआ, कुछ कुत्ते मेरे पीछे पड़ गए। मैंने बहुत कोशिश की उनसे बचने की, लेकिन एक कुत्ते ने मेरे हाथ से उसे झपट लिया, फिर दुसरे कुत्तों ने भी बिल्ली के जिस्म की छीना-झपटी शुरू कर दी। जब आसपा-स के लोगों ने कुत्तों को खदेड़ा तो मैंने बिल्ली को उठाया। जब मैंने उसकी आँखों को देखा मुझे एक विचित्र-सा एहसास हुआ, वह ऐसा एहसास था जिसे मैं बयान नहीं कर सकता। उस दिन के बाद मुझ पर चुप्पी का भयानक दौरा पड़ा। मैंने पंद्रह दिनों तक किसी से कोई बात नहीं की, लेकिन उन पंद्रह दिनों के मौन के बाद मुझे लगा कि मैं एक दूसरा लड़का हूँ। मेरे अंदर कुछ हमेशा के लिए बदल गया है। पंद्रह दिनों पहले जो लड़का था, वह कोई और था। उस लड़के का ह्रदय बहुत कोमल था, लेकिन नया लड़का पत्थरदिल है; उसकी हिस मर गई है, वह बेहिस है। उसके सामने चाहे कुछ भी हो गुज़रे, उसे भावनात्मक रूप से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। वह तटस्थ होकर उस पर कहानी लिख लेगा; लेकिन रोएगा नहीं, क्योंकि उसके अंदर कोई द्वंद्व नहीं है।
क्या इतना निर्द्वंद्व होना एक लेखक के लिए अच्छी बात है? क्या निर्द्वंद्व होने और निर्दय होने में कोई फ़र्क़ नहीं होता? अगर द्वंद्व का संबंध भावनाओं और विचारों से है, तो यह कैसे संभव है कि कोई लेखक निर्द्वंद्व होकर लिखता चला जाए? लेकिन मेरे साथ तो यही हो रहा है। कभी-कभी मुझे लगता है कि मेरे अंदर भी एक दूसरा आदमी पैदा हो गया है—एक ऐसा आउटसाइडर जो चीज़ों से बचकर भागता नहीं है, पलायन भी नहीं करता; लेकिन किसी प्रकार का हस्तक्षेप भी नहीं करता और वह चीज़ों के बीच से ऐसे गुज़र जाता है, जैसे उन चीज़ों की भयावह अराजकता की उसे रत्ती भर भी परवाह न हो; जैसे उसके लिए उन चीज़ों की गत्ते या टीन के ख़ाली-खोखले डब्बे या प्लास्टिक कि पिचकी हुई बोतल से ज़्यादा कोई औक़ात न हो, जिसे वह पैर से ठोकर मारना भी ज़रूरी नहीं समझता।
मैं जब सोलह साल का था, तब एक विस्फोट में मैंने अपने सामने सात लोगों को मरते देखा, उनमें से चार बच्चे थे। वे सब एक ग़ुब्बारेवाले को घेरकर खड़े थे जिसका हीलियम गैस से भरा सिलेंडर अचानक फट गया। कुछ देर तक किसी को कुछ समझ में नहीं आया, लेकिन जब समझ में आया तो लोग घायलों की मदद करने की बजाय डरकर दूर चले गए। मैंने देखा कि पूरी सड़क ख़ून से सनी हुई थी। दो लोगों के जिस्म के तो चीथड़े उड़ गए थे। किसी का एक हाथ तो किसी का एक पैर तन से जुदा हो गया था। वे दर्द से तड़प रहे थे। कुछ देर तक मैं भी घटना-स्थल से दूर खड़ा घायलों को तड़पते देखता रहा। फिर पता नहीं क्यों मैं घटना-स्थल की तरफ़ बढ़ा—बिना कुछ सोचे, बिना किसी इरादे के। रास्ते में मुझे एक माल ढोने वाला ठेला दिखाई दिया। मैंने उस ठेले के दोनों हत्थों को थाम लिया और ठेले को खींचते हुए घायलों के नज़दीक पहुँचा और बिना किसी से कुछ कहे, बिना किसे से कुछ पूछे घायलों के शरीर के बिखरे अंगों को समेटने लगा। एक बच्चे का कटा हुआ हाथ और ग़ुब्बारेवाले की कटी हुई टाँग को ठेले में डालने के बाद मैंने दो बच्चो को उठाकर ठेले में रखा। उनमें से एक होश में था और दूसरा शायद बेहोश था या मर चुका था। फिर भीड़ में से एक साथ छह-सात लोग आगे बढ़े और सब मिलकर घायलों और मृतकों को उठा-उठाकर ठेले में लादने लगे। फिर हाहाकार करती भीड़ उस ठेले को ठेलती हुई तेज़ी से ज़िला अस्पताल की तरफ़ दौड़ी। मैं उस भीड़ में शामिल नहीं हुआ। मैंने घर जाकर कपड़े बदले और खाना खाने बैठ गया। खाना खाने के बाद में अपनी दुकान गया और अपने काम में ऐसे व्यस्त हो गया, जैसे इस घटना का मुझसे कोई लेना-देना ही न हो।
इस घटना के एक साल बाद मैंने दुर्ग से नागपुर की रेल-यात्रा के दौरान रेल की एक बोगी को जलते देखा। नागपुर चक्रधरपुर पैसेंजर ट्रेन की जिस बोगी में मैं सवार था, उससे ठीक एक बोगी पीछे की बोगी में आग लग गई थी जब ट्रेन एक छोटे से स्टेशन मुसरा में रुकी तो उस बोगी में सवार लगभग चालीस लोग झुलस गए थे—इतने ज़्यादा कि किसी भी लाश की शिनाख़्त मुमकिन नहीं थी। एक गर्भवती औरत का पेट झुलसकर किसी ग़ुब्बारे की तरह फूट गया था और पेट की चमड़ी और जले हुए मांस की दरार के बीच उसके बच्चे की दोनों टाँगें दिखाई दे रही थीं। उस दुर्घटना में चालीस लोगों की मौत हुई और सबको रेलवे-ट्रैक के पास एक लंबा गड्ढा खोदकर उसमें दफ़ना दिया गया। इस बार भी मैंने इस सामूहिक अंतिम संस्कार को उतनी ही तटस्थता और उदासीनता के साथ देखा और एक घंटे बाद जब मैं दूसरी ट्रेन में सवार हुआ तो उस घटना का एक हल्का-सा चिह्न भी मेरे दिल-ओ-दिमाग़ पर नहीं था।
आपको शायद यह लग सकता है कि इस तरह के भदेस और ख़ून-ख़राबे का भला एक रचनाकार के रचनात्मक द्वंद्व से क्या संबंध हो सकता है? दरअस्ल, मेरी सबसे बड़ी दिक़्क़त यही है कि मैं इस तरह की घटनाओं से ऊपरी तौर पर तो बिना किसी एहसास के गुज़र गया, लेकिन इन घटनाओं ने मेरे लेखन को अतिरंजित यथार्थ की तरफ़ मोड़ दिया। मौत ने कभी मेरा पीछा नहीं छोड़ा। मैं अपने पूरे जीवन में सहज सौंदर्य की कोई कहानी नहीं लिख पाया।
मैं जब उन्नीस साल का हुआ तब मैंने लिखना शुरू किया और मेरी शुरुआती कहानियों में मृत्यु ही केंद्रीय तत्त्व थी। मैंने अपने लेखन की यात्रा की शुरुआत ही शवयात्रा के साथ शुरू की—‘दफ़न’, ‘ज़बह’, ‘बीमार सपने’, ‘ख़ात्मा’, ‘आत्मगस्त’ और ‘उत्सव’ इन सभी कहानियों में मौत का क़ब्ज़ा था। आमतौर पर मौत एक डरावनी चीज़ होती है; लेकिन मैं उससे ऐसे दो-चार होता था, जैसे वह कोई खेल हो।
सात साल पहले मैंने एक उपन्यास लिखा था—‘काले अध्याय’—उस उपन्यास के नायक ने बचपन में अपनी आँखों के सामने ज़ंजीर से बँधे एक ज़िंदा हाथी को जंगली कुत्तों द्वारा नोच-नोचकर खाते देखा था। सिर्फ़ वही इस दृश्य को नहीं देख रहा था, ख़ुद हाथी भी अपने आपको खाए जाते हुए देख रहा था। पेड़ पर बैठे उस लड़के ने उस हाथी की मरणासन्न आँखों में कुछ देख लिया था और उसे भी कोई ऐसा एहसास हुआ था जो उसकी समझ के दायरे से बाहर था। बाद में जब वह लड़का बड़ा हुआ तो उस घटना की छाप उसके दिमाग़ पर बनी रही, लेकिन उसे कुछ महसूस नहीं होता था; कोई भी चीज़ उसके अंतर्मन को छूती नहीं थी, वह कई लोमहर्षक घटनाओं का साक्षी बना, अपने सामने उसने हत्या-बलात्कार और नरसंहार देखे, यहाँ तक कि अपने पूरे आदिवासी समुदाय को विखंडित होते देखा; लेकिन वह ज़रा भी विचलित नहीं हुआ। ऐसा नहीं है कि वह उस बारे में कुछ सोचता न हो; वह सोचता था; लेकिन विचलित हुए बिना।
उपन्यास के उस हाथी की मृत्यु वाले दृश्य को लिखने से पहले मेरे अंदर के उस दूसरे ने उसकी पूर्व तैयारी कर ली होगी या शायद उस उपन्यास का नायक मेरे ही अंदर के दूसरे का प्रतिरूप है। मैं अक्सर ये अटकलें लगाता हूँ, लेकिन निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता। मैंने पहले ही कहा है कि लेखक का दिमाग़ हमेशा रैशनल नहीं होता, उसके दिमाग़ में कुछ ऐसे उलटफेर होते रहते हैं जो तर्कातीत होते हैं।
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‘अकार’ के 73वें अंक से साभार प्रस्तुत।
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