दोहे

चार चरणों का अर्द्धसम मात्रिक छंद। विषम चरणों में 13-13 और सम चरणों में 11-11 मात्राएँ। चरण के अंत में गुरु-लघु (ऽ।) अनिवार्य।

राम नाम अवलंब बिनु, परमारथ की आस।

बरषत वारिद-बूँद गहि, चाहत चढ़न अकास॥

राम-नाम का आश्रय लिए बिना जो लोग मोक्ष की आशा करते हैं अथवा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चारों परमार्थों को प्राप्त करना चाहते हैं वे मानो बरसते हुए बादलों की बूँदों को पकड़ कर आकाश में चढ़ जाना चाहते हैं। भाव यह है कि जिस प्रकार पानी की बूँदों को पकड़ कर कोई भी आकाश में नहीं चढ़ सकता वैसे ही राम नाम के बिना कोई भी परमार्थ को प्राप्त नहीं कर सकता।

राम-नाम का आश्रय लिए बिना जो लोग मोक्ष की आशा करते हैं अथवा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चारों परमार्थों को प्राप्त करना चाहते हैं वे मानो बरसते हुए बादलों की बूँदों को पकड़ कर आकाश में चढ़ जाना चाहते हैं। भाव यह है कि जिस प्रकार पानी की बूँदों को पकड़ कर कोई भी आकाश में नहीं चढ़ सकता वैसे ही राम नाम के बिना कोई भी परमार्थ को प्राप्त नहीं कर सकता।

तुलसीदास

मस्जिद सों कुछ घिन नहीं, मंदिर सों नहीं पिआर।

दोए मंह अल्लाह राम नहीं, कहै रैदास चमार॥

तो मुझे मस्जिद से घृणा है और ही मंदिर से प्रेम है। रैदास कहते हैं कि वास्तविकता यह है कि तो मस्जिद में अल्लाह ही निवास करता है और नही मंदिर में राम का वास है।

तो मुझे मस्जिद से घृणा है और ही मंदिर से प्रेम है। रैदास कहते हैं कि वास्तविकता यह है कि तो मस्जिद में अल्लाह ही निवास करता है और नही मंदिर में राम का वास है।

रैदास

हिंदू पूजइ देहरा मुसलमान मसीति।

रैदास पूजइ उस राम कूं, जिह निरंतर प्रीति॥

हिंदू मंदिरों में पूजा करने के लिए जाते हैं और मुसलमान ख़ुदा की इबादत करने के लिए मस्जिदों में जाते हैं। दोनों ही अज्ञानी हैं। दोनों को ही ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम नहीं है। रैदास कहते हैं कि मैं जिस राम की आराधना करता हूँ, उसके प्रति मेरी सच्ची प्रीति है।

हिंदू मंदिरों में पूजा करने के लिए जाते हैं और मुसलमान ख़ुदा की इबादत करने के लिए मस्जिदों में जाते हैं। दोनों ही अज्ञानी हैं। दोनों को ही ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम नहीं है। रैदास कहते हैं कि मैं जिस राम की आराधना करता हूँ, उसके प्रति मेरी सच्ची प्रीति है।

रैदास

गज बर कुंभहिं देखि तनु, कृशित होत मृगराज।

चंद लखत बिकसत कमल, कह जमाल किहि काज॥

हाथी के कुंभस्थल को देखकर, सिंह दुबला क्यों हो रहा है? और चंद्रमा को देखकर कमल क्यों विकासत हो रहा है? इन विपरीत कार्यों का क्या कारण है? अभिप्राय यह है कि नायिका के हाथी के कुंभस्थल समान स्तनों को बढ़ते देखकर सिंह अर्थात् कटि प्रदेश दुबला हो गया है। नायिका के चंद्रमुख को देखकर, नायक के कमल रूपी नेत्र विकसित हो जाते हैं।

हाथी के कुंभस्थल को देखकर, सिंह दुबला क्यों हो रहा है? और चंद्रमा को देखकर कमल क्यों विकासत हो रहा है? इन विपरीत कार्यों का क्या कारण है? अभिप्राय यह है कि नायिका के हाथी के कुंभस्थल समान स्तनों को बढ़ते देखकर सिंह अर्थात् कटि प्रदेश दुबला हो गया है। नायिका के चंद्रमुख को देखकर, नायक के कमल रूपी नेत्र विकसित हो जाते हैं।

जमाल

तूँ तूँ करता तूँ भया, मुझ मैं रही हूँ।

वारी फेरी बलि गई, जित देखौं तित तूँ

जीवात्मा कह रही है कि ‘तू है’ ‘तू है’ कहते−कहते मेरा अहंकार समाप्त हो गया। इस तरह भगवान पर न्यौछावर होते−होते मैं पूर्णतया समर्पित हो गई। अब तो जिधर देखती हूँ उधर तू ही दिखाई देता है।

जीवात्मा कह रही है कि ‘तू है’ ‘तू है’ कहते−कहते मेरा अहंकार समाप्त हो गया। इस तरह भगवान पर न्यौछावर होते−होते मैं पूर्णतया समर्पित हो गई। अब तो जिधर देखती हूँ उधर तू ही दिखाई देता है।

कबीर

प्रेम लटक दुर्लभ महा, पावै गुरु के ध्यान।

अजपा सुमिरण कहत हूं, उपजै केवल ज्ञान॥

सहजो कहती हैं कि ईश्वरीय प्रेम की अनुभूति अत्यन्त दुर्लभ है। वह सद्गुरु के ध्यान से ही मिलती है। इसलिए स्थिर मन से ईश्वर एवं गुरु का स्मरण-ध्यान करना चाहिए, क्योंकि उसी से ईश्वरीय ज्ञान की साक्षात् अनुभूति हो पाती है।

सहजो कहती हैं कि ईश्वरीय प्रेम की अनुभूति अत्यन्त दुर्लभ है। वह सद्गुरु के ध्यान से ही मिलती है। इसलिए स्थिर मन से ईश्वर एवं गुरु का स्मरण-ध्यान करना चाहिए, क्योंकि उसी से ईश्वरीय ज्ञान की साक्षात् अनुभूति हो पाती है।

सहजोबाई

‘तुलसी’ काया खेत है, मनसा भयौ किसान।

पाप-पुन्य दोउ बीज हैं, बुवै सो लुनै निदान॥

गोस्वामी जी कहते हैं कि शरीर मानो खेत है, मन मानो किसान है। जिसमें यह किसान पाप और पुण्य रूपी दो प्रकार के बीजों को बोता है। जैसे बीज बोएगा वैसे ही इसे अंत में फल काटने को मिलेंगे। भाव यह है कि यदि मनुष्य शुभ कर्म करेगा तो उसे शुभ फल मिलेंगे और यदि पाप कर्म करेगा तो उसका फल भी बुरा ही मिलेगा।

गोस्वामी जी कहते हैं कि शरीर मानो खेत है, मन मानो किसान है। जिसमें यह किसान पाप और पुण्य रूपी दो प्रकार के बीजों को बोता है। जैसे बीज बोएगा वैसे ही इसे अंत में फल काटने को मिलेंगे। भाव यह है कि यदि मनुष्य शुभ कर्म करेगा तो उसे शुभ फल मिलेंगे और यदि पाप कर्म करेगा तो उसका फल भी बुरा ही मिलेगा।

तुलसीदास

तेरी मुख-समता करी, साहस करि निरसंक।

धूरि परी अरबिंद मुख, चंदहि लग्यौ कलंक॥

हे राधिके, कमल और चंद्रमा ने तुम्हारे मुख की समता करने का साहस किया, इसलिए मानो कमल के मुख पर तो पुष्परज के कण रूप में धूल पड़ गई, और चंद्रमा को कलंक लग गया। यद्यपि कमल में पराग और चाँद में कलंक स्वाभाविक है तथापि उसका यहाँ एक दूसरा कारण राधा के मुख की समता बताया गया है।

हे राधिके, कमल और चंद्रमा ने तुम्हारे मुख की समता करने का साहस किया, इसलिए मानो कमल के मुख पर तो पुष्परज के कण रूप में धूल पड़ गई, और चंद्रमा को कलंक लग गया। यद्यपि कमल में पराग और चाँद में कलंक स्वाभाविक है तथापि उसका यहाँ एक दूसरा कारण राधा के मुख की समता बताया गया है।

मतिराम

कहि रहीम इक दीप तें, प्रगट सबै दुति होय।

तन सनेह कैसे दुरै, दृग दीपक जरु दोय॥

रहीम कहते हैं कि जब एक ही दीपक के प्रकाश से घर में रखी सारी वस्तुएँ स्पष्ट दीखने लगती हैं, तो फिर नेत्र रूपी दो-दो दीपकों के होते तन-मन में बसे स्नेह-भाव को कोई कैसे भीतर छिपाकर रख सकता है! अर्थात मन में छिपे प्रेम-भाव को नेत्रों के द्वारा व्यक्त किया जाता है और नेत्रों से ही उसकी अभिव्यक्ति हो जाती है।

रहीम कहते हैं कि जब एक ही दीपक के प्रकाश से घर में रखी सारी वस्तुएँ स्पष्ट दीखने लगती हैं, तो फिर नेत्र रूपी दो-दो दीपकों के होते तन-मन में बसे स्नेह-भाव को कोई कैसे भीतर छिपाकर रख सकता है! अर्थात मन में छिपे प्रेम-भाव को नेत्रों के द्वारा व्यक्त किया जाता है और नेत्रों से ही उसकी अभिव्यक्ति हो जाती है।

रहीम

रूप, कथा, पद, चारु पट, कंचन, दोहा, लाल।

ज्यों ज्यों निरखत सूक्ष्मगति, मोल रहीम बिसाल॥

रहीम कहते हैं कि किसी की रूप-माधुरी, कथा का कथानक, कविता, चारु पट, सोना, छंद और मोती-माणिक्य का ज्यों-ज्यों सूक्ष्म अवलोकन करते हैं तो इनकी ख़ूबियाँ बढ़ती जाती है। यानी इन सब की परख के लिए पारखी नज़र चाहिए।

रहीम कहते हैं कि किसी की रूप-माधुरी, कथा का कथानक, कविता, चारु पट, सोना, छंद और मोती-माणिक्य का ज्यों-ज्यों सूक्ष्म अवलोकन करते हैं तो इनकी ख़ूबियाँ बढ़ती जाती है। यानी इन सब की परख के लिए पारखी नज़र चाहिए।

रहीम

मतवालो जोबन सदा, तूझ जमाई माय।

पड़िया थण पहली पड़ै, बूढ़ी धण सुहाय॥

हे माता! तुम्हारा दामाद सदा यौवन में मस्त हैं। उन्हें पत्नी का वृद्धत्व नहीं सुहाता। इसलिए पत्नी के स्तन ढीले पड़ने के पहले ही वे अपना देहपात कर डालेंगे। अर्थात्

प्रेम और शौर्य दोनों का एक साथ निर्वाह वीरों का आदर्श रहा है।

हे माता! तुम्हारा दामाद सदा यौवन में मस्त हैं। उन्हें पत्नी का वृद्धत्व नहीं सुहाता। इसलिए पत्नी के स्तन ढीले पड़ने के पहले ही वे अपना देहपात कर डालेंगे। अर्थात्

प्रेम और शौर्य दोनों का एक साथ निर्वाह वीरों का आदर्श रहा है।

सूर्यमल्ल मिश्रण

कंत घरे किम आविया, तेहां रौ घण त्रास।

लहँगे मूझ लुकीजियै, बैरी रौ विसास॥

कायर पति के प्रति वीरांगना की व्यंग्यात्मक उक्ति है—हे पति-देव! घर कैसे पधार

आए? क्या तलवारों का बहुत डर लगा? ठीक तो है। आइए, मेरे लहँगे में छिप

कायर पति के प्रति वीरांगना की व्यंग्यात्मक उक्ति है—हे पति-देव! घर कैसे पधार

आए? क्या तलवारों का बहुत डर लगा? ठीक तो है। आइए, मेरे लहँगे में छिप

सूर्यमल्ल मिश्रण

तोय मोल मैं देत हौ, छीरहि सरिस बढ़ाइ।

आँच लागन देत वह, आप पहिल जर जाइ॥

दूध पानी को अपने में मिलाकर उसका मूल्य अपने ही समान बना देता है। पर जब दूध को आग पर गर्म किया जाता है तो दूध से पहले पानी अपने को जला लेता है और दूध को बचा लेता है। मित्रता हो तो दूध और पानी जैसी हो।

दूध पानी को अपने में मिलाकर उसका मूल्य अपने ही समान बना देता है। पर जब दूध को आग पर गर्म किया जाता है तो दूध से पहले पानी अपने को जला लेता है और दूध को बचा लेता है। मित्रता हो तो दूध और पानी जैसी हो।

रसनिधि

मोहन लखि जो बढ़त सुख, सो कछु कहत बनै न।

नैनन कै रसना नहीं, रसना कै नहिं नैन॥

श्रीकृष्ण को देखकर जैसा दिव्य आनंद प्राप्त होता है, उस आनंद का कोई वर्णन नहीं कर सकता, क्योंकि जो आँखें देखती हैं, उनके तो कोई जीभ नहीं है जो वर्णन कर सकें, और जो जीभ वर्णन कर सकती है उसके आँखें नहीं है। बिना देखे वह बेचारी जीभ उसका क्या वर्णन कर सकती है!

श्रीकृष्ण को देखकर जैसा दिव्य आनंद प्राप्त होता है, उस आनंद का कोई वर्णन नहीं कर सकता, क्योंकि जो आँखें देखती हैं, उनके तो कोई जीभ नहीं है जो वर्णन कर सकें, और जो जीभ वर्णन कर सकती है उसके आँखें नहीं है। बिना देखे वह बेचारी जीभ उसका क्या वर्णन कर सकती है!

रसनिधि

लाल लली ललि लाल की, लै लागी लखि लोल।

त्याय दे री लय लायकर, दुहु कहि सुनि चित डोल॥

लाल को लली से और लली को लाल से मिलने की इच्छा है। दोनों मुझे कहते हैं, अरी तू उससे मुझे मिलाकर विरहाग्नि को शांत कर। इनकी बातें सुनते-सुनते मेरा भी चित्त विचलित हो गया है।

लाल को लली से और लली को लाल से मिलने की इच्छा है। दोनों मुझे कहते हैं, अरी तू उससे मुझे मिलाकर विरहाग्नि को शांत कर। इनकी बातें सुनते-सुनते मेरा भी चित्त विचलित हो गया है।

दयाराम

गुरुवचन हिय ले धरो, ज्यों कृपणन के दाम।

भूमिगढ़े माथे दिये, सहजो लहै राम॥

सहजो कहती हैं कि सुगंधित सुंदर फूलों की माला के समान सद्गुरु के वचनों को हदय में धारण करना चाहिए। अतीव विनम्रता रखकर, सहर्ष मन में धारण कर सद्गुरु-वचनों को अपनाने से ईश्वर की प्राप्ति हो जाती है।

सहजो कहती हैं कि सुगंधित सुंदर फूलों की माला के समान सद्गुरु के वचनों को हदय में धारण करना चाहिए। अतीव विनम्रता रखकर, सहर्ष मन में धारण कर सद्गुरु-वचनों को अपनाने से ईश्वर की प्राप्ति हो जाती है।

सहजोबाई

अड़सठ तीरथ गुरु चरण, परवी होत अखंड।

सहजो ऐसो धामना, सकल अंड ब्रह्मंड॥

सद्गुरु के चरणों में सारे अड़सठ पवित्र तीर्थ रहते हैं, अर्थात उनके चरण अड़सठ तीर्थों के समान पवित्र एवं पूज्य है। उनका पुण्यफल पवित्रतम है। इस समस्त संसार में ऐसा कोई धाम या तीर्थ नहीं है जो सद्गुरु के चरणों में नहीं है।

सद्गुरु के चरणों में सारे अड़सठ पवित्र तीर्थ रहते हैं, अर्थात उनके चरण अड़सठ तीर्थों के समान पवित्र एवं पूज्य है। उनका पुण्यफल पवित्रतम है। इस समस्त संसार में ऐसा कोई धाम या तीर्थ नहीं है जो सद्गुरु के चरणों में नहीं है।

सहजोबाई

प्रेम दिवाने जो भये, मन भयो चकना चूर।

छके रहे घूमत रहैं, सहजो देखि हज़ूर॥

सहजोबाई कहती हैं कि जो व्यक्ति ईश्वरीय-प्रेम के दीवाने हो जाते हैं, उनके मन की सांसारिक वासनाएँ-कामनाएँ एकदम चूर-चूर हो जाती हैं। ऐसे लोग सदा आनंद से तृप्त रहते हैं तथा संसार में घूमते हुए परमात्मा का साक्षात्कार कर लेते हैं।

सहजोबाई कहती हैं कि जो व्यक्ति ईश्वरीय-प्रेम के दीवाने हो जाते हैं, उनके मन की सांसारिक वासनाएँ-कामनाएँ एकदम चूर-चूर हो जाती हैं। ऐसे लोग सदा आनंद से तृप्त रहते हैं तथा संसार में घूमते हुए परमात्मा का साक्षात्कार कर लेते हैं।

सहजोबाई

कबीर माया पापणीं, हरि सूँ करे हराम।

मुखि कड़ियाली कुमति की, कहण देई राम॥

यह माया बड़ी पापिन है। यह प्राणियों को परमात्मा से विमुख कर देती है तथा

उनके मुख पर दुर्बुद्धि की कुंडी लगा देती है और राम-नाम का जप नहीं करने देती।

यह माया बड़ी पापिन है। यह प्राणियों को परमात्मा से विमुख कर देती है तथा

उनके मुख पर दुर्बुद्धि की कुंडी लगा देती है और राम-नाम का जप नहीं करने देती।

कबीर

‘तुलसी’ सब छल छाँड़िकै, कीजै राम-सनेह।

अंतर पति सों है कहा, जिन देखी सब देह॥

गोस्वामी जी कहते हैं कि सब छल-कपटों को छोड़ कर भगवान् की सच्चे हृदय से भक्ति करो। उस पति से भला क्या भेदभाव है जिसने सारे शरीर को देखा हुआ है। भाव यह कि जैसे पति अपनी पत्नी के सारे शरीर के रहस्यों को जानता है वैसे ही प्रभु सारे जीवों के सब कर्मों को जानता है।

गोस्वामी जी कहते हैं कि सब छल-कपटों को छोड़ कर भगवान् की सच्चे हृदय से भक्ति करो। उस पति से भला क्या भेदभाव है जिसने सारे शरीर को देखा हुआ है। भाव यह कि जैसे पति अपनी पत्नी के सारे शरीर के रहस्यों को जानता है वैसे ही प्रभु सारे जीवों के सब कर्मों को जानता है।

तुलसीदास

ऊँचे कुल के कारणै, ब्राह्मन कोय होय।

जउ जानहि ब्रह्म आत्मा, रैदास कहि ब्राह्मन सोय॥

मात्र ऊँचे कुल में जन्म लेने के कारण ही कोई ब्राह्मण नहीं कहला सकता। जो ब्रहात्मा को जानता है, रैदास कहते हैं कि वही ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी है।

मात्र ऊँचे कुल में जन्म लेने के कारण ही कोई ब्राह्मण नहीं कहला सकता। जो ब्रहात्मा को जानता है, रैदास कहते हैं कि वही ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी है।

रैदास

माथे तिलक हाथ जपमाला, जग ठगने कूं स्वांग बनाया।

मारग छाड़ि कुमारग उहकै, सांची प्रीत बिनु राम पाया॥

ईश्वर को पाने के लिए माथे पर तिलक लगाना और माला जपना केवल संसार को ठगने का स्वांग है। प्रेम का मार्ग छोड़कर स्वांग करने से ईश्वर की प्राप्ति नहीं होगी। सच्चे प्रेम के बिना परमात्मा को पाना असंभव है।

ईश्वर को पाने के लिए माथे पर तिलक लगाना और माला जपना केवल संसार को ठगने का स्वांग है। प्रेम का मार्ग छोड़कर स्वांग करने से ईश्वर की प्राप्ति नहीं होगी। सच्चे प्रेम के बिना परमात्मा को पाना असंभव है।

रैदास

प्रेम पंथ की पालकी, रैदास बैठियो आय।

सांचे सामी मिलन कूं, आनंद कह्यो जाय॥

रैदास कहते हैं कि वे प्रेम−मार्ग रूपी पालकी में बैठकर अपने सच्चे स्वामी से मिलने के लिए चले हैं। उनसे मिलने की चाह का आनंद ही निर्वचनीय है, तो उनसे मिलकर आनंद की अनुभूति का तो कहना ही क्या!

रैदास कहते हैं कि वे प्रेम−मार्ग रूपी पालकी में बैठकर अपने सच्चे स्वामी से मिलने के लिए चले हैं। उनसे मिलने की चाह का आनंद ही निर्वचनीय है, तो उनसे मिलकर आनंद की अनुभूति का तो कहना ही क्या!

रैदास

पंचहँ णायकु वसिकरहु, जेण होंति वसि अण्ण।

मूल विणट्ठइ तरुवरहँ, अवसइँ सुक्कहिं पण्णु॥

पाँच इंद्रियों के नायक मन को वश में करो जिससे अन्य भी वश में होते हैं। तरुवर का मूल नष्ट कर देने पर पर्ण अवश्य सूखते हैं।

पाँच इंद्रियों के नायक मन को वश में करो जिससे अन्य भी वश में होते हैं। तरुवर का मूल नष्ट कर देने पर पर्ण अवश्य सूखते हैं।

जोइंदु

फूलति कली गुलाब की, सखि यहि रूप लखै न।

मनौ बुलावति मधुप कौं, दै चुटकी की सैन॥

एक सखी दूसरी सखी से चटचटा कर विकसित होती हुई कली का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि, इस खिलती हुई गुलाब की कली का रूप तो देखो न। यह ऐसी प्रतीत होती है, मानो अपने प्रियतम भौंरे को रस लेने के लिए चुटकी बजाकर इशारा करती हुई अपने पास बुला रही हो।

एक सखी दूसरी सखी से चटचटा कर विकसित होती हुई कली का वर्णन करती हुई कहती है कि हे सखि, इस खिलती हुई गुलाब की कली का रूप तो देखो न। यह ऐसी प्रतीत होती है, मानो अपने प्रियतम भौंरे को रस लेने के लिए चुटकी बजाकर इशारा करती हुई अपने पास बुला रही हो।

मतिराम

अर तैं टरत वर-परे, दई मरक मु मैन।

होड़ा-होड़ी बढ़ि चले चित, चतुराई नैन॥

एक सखी दूसरी सखी से कह रही है कि ऐसा प्रतीत होता है कि कामदेव रूपी नायक की प्रेरणा से ‘चित-चातुरी’ और ‘नयन-विस्तार’ रूपी दूती और दूत में इस बात की स्पर्धा जगी हुई है कि नायिका के शरीर को कौन कितनी शीघ्रता से काम के प्रभाव से प्रभावित कर पाता है। वास्तविकता यह है कि नायिका के शरीर में यौवनोन्मेष के साथ-साथ उसके चित्त की चपलता और नेत्रों का विस्तार बढ़ता जा रहा है। इन दोनों अंगों में कौन अधिक बढ़ा है या गतिमय हुआ है, यह निर्णय करना कठिन हो गया है। यही कारण है कि बिहारी ने मनोगत चंचलता की वृद्धि और नेत्रों के विस्तार की गति में होड़ की कल्पना की है।

एक सखी दूसरी सखी से कह रही है कि ऐसा प्रतीत होता है कि कामदेव रूपी नायक की प्रेरणा से ‘चित-चातुरी’ और ‘नयन-विस्तार’ रूपी दूती और दूत में इस बात की स्पर्धा जगी हुई है कि नायिका के शरीर को कौन कितनी शीघ्रता से काम के प्रभाव से प्रभावित कर पाता है। वास्तविकता यह है कि नायिका के शरीर में यौवनोन्मेष के साथ-साथ उसके चित्त की चपलता और नेत्रों का विस्तार बढ़ता जा रहा है। इन दोनों अंगों में कौन अधिक बढ़ा है या गतिमय हुआ है, यह निर्णय करना कठिन हो गया है। यही कारण है कि बिहारी ने मनोगत चंचलता की वृद्धि और नेत्रों के विस्तार की गति में होड़ की कल्पना की है।

बिहारी

प्रतिपालक सेवक सकल, खलनि दलमलत डाँटि।

शंकर तुम सम साँकरैं, सबल साँकरैं काटि॥

सब सेवकों का पालन करने वाले और दुष्टों का दमन करने वाले—नष्ट-भ्रष्ट कर देने वाले—हे भगवान् शंकर! आपके समान दु:खों या कष्टों की मज़बूत शृंखलाओं—ज़ंजीरों को काटने वाला भला मेरे लिए और दूसरा कौन है!

सब सेवकों का पालन करने वाले और दुष्टों का दमन करने वाले—नष्ट-भ्रष्ट कर देने वाले—हे भगवान् शंकर! आपके समान दु:खों या कष्टों की मज़बूत शृंखलाओं—ज़ंजीरों को काटने वाला भला मेरे लिए और दूसरा कौन है!

मतिराम

अगलिअ-नेह-निवट्टाहं जोअण-लक्खु वि जाउ।

वरिस-सएण वि जो मिलइ सहि सोक्खहं सो ठाउ॥

अगलित स्नेह में में पके हुए लोग लाखों योजन भी चले जाएँ और सौ वर्ष बाद भी यदि मिलें तो हे सखि, मैत्री का भाव वही रहता है।

अगलित स्नेह में में पके हुए लोग लाखों योजन भी चले जाएँ और सौ वर्ष बाद भी यदि मिलें तो हे सखि, मैत्री का भाव वही रहता है।

हेमचंद्र

साव-सलोणी गोरडी नवखी वि विस-गंठि।

भडु पच्चलिओ सो मरइ जासु लग्गइ कंठि॥

सर्वांग सुंदर गोरी कोई नोखी विष की गाँठ है। योद्धा वास्तव में वह मरता है जिसके कंठ से वह नहीं लगती।

सर्वांग सुंदर गोरी कोई नोखी विष की गाँठ है। योद्धा वास्तव में वह मरता है जिसके कंठ से वह नहीं लगती।

हेमचंद्र

जिस मरनै थै जग डरै, सो मेरे आनंद।

कब मरिहूँ कब देखिहूँ, पूरन परमानंद॥

जिस मरण से संसार डरता है, वह मेरे लिए आनंद है। कब मरूँगा और कब पूर्ण परमानंद स्वरूप ईश्वर का दर्शन करूँगा। देह त्याग के बाद ही ईश्वर का साक्षात्कार होगा। घट का अंतराल हट जाएगा तो अंशी में अंश मिल जाएगा।

जिस मरण से संसार डरता है, वह मेरे लिए आनंद है। कब मरूँगा और कब पूर्ण परमानंद स्वरूप ईश्वर का दर्शन करूँगा। देह त्याग के बाद ही ईश्वर का साक्षात्कार होगा। घट का अंतराल हट जाएगा तो अंशी में अंश मिल जाएगा।

कबीर

बिरह जिलानी मैं जलौं, जलती जलहर जाऊँ।

मो देख्याँ जलहर जलै, संतौ कहा बुझाऊँ॥

विरहिणी कहती है कि विरह में जलती हुई मैं सरोवर (या जल-स्थान)

के पास गई। वहाँ मैंने देखा कि मेरे विरह की आग से जलाशय भी जल रहा है। हे संतो! बताइए मैं अपनी विरह की आग को कहाँ बुझाऊँ?

विरहिणी कहती है कि विरह में जलती हुई मैं सरोवर (या जल-स्थान)

के पास गई। वहाँ मैंने देखा कि मेरे विरह की आग से जलाशय भी जल रहा है। हे संतो! बताइए मैं अपनी विरह की आग को कहाँ बुझाऊँ?

कबीर

काबा फिर कासी भया, राम भया रहीम।

मोट चून मैदा भया, बैठ कबीर जीम॥

सांप्रदायिक सद्भावना के कारण कबीर के लिए काबा काशी में परिणत हो गया। भेद का मोटा चून या मोठ का चून अभेद का मैदा बन गया, कबीर उसी को जीम रहा है।

सांप्रदायिक सद्भावना के कारण कबीर के लिए काबा काशी में परिणत हो गया। भेद का मोटा चून या मोठ का चून अभेद का मैदा बन गया, कबीर उसी को जीम रहा है।

कबीर

बेटा जाए क्या हुआ, कहा बजावै थाल।

आवन जावन ह्वै रहा, ज्यौं कीड़ी का नाल॥

बेटा पैदा होने पर हे प्राणी थाली बजाकर इतनी प्रसन्नता क्यों प्रकट करते हो?

जीव तो चौरासी लाख योनियों में वैसे ही आता जाता रहता है जैसे जल से युक्त नाले में कीड़े आते-जाते रहते हैं।

बेटा पैदा होने पर हे प्राणी थाली बजाकर इतनी प्रसन्नता क्यों प्रकट करते हो?

जीव तो चौरासी लाख योनियों में वैसे ही आता जाता रहता है जैसे जल से युक्त नाले में कीड़े आते-जाते रहते हैं।

कबीर

चकमक सु परस्पर नयन, लगन प्रेम परि आगि।

सुलगि सोगठा रूप पुनि, गुन-दारू दूड जागि॥

चकमक के सदृश नेत्र जब आपस में टकराते हैं तो उनसे प्रेम की चिनगारियाँ निकलती हैं। फिर रूप रूपी सोगठे (रूई) पर इनके गिरने से आग सुलग जाती है, किंतु पूर्णतया प्रज्वलित तभी होती है जब उसका संयोग गुण रूपी शराब से होता है।

चकमक के सदृश नेत्र जब आपस में टकराते हैं तो उनसे प्रेम की चिनगारियाँ निकलती हैं। फिर रूप रूपी सोगठे (रूई) पर इनके गिरने से आग सुलग जाती है, किंतु पूर्णतया प्रज्वलित तभी होती है जब उसका संयोग गुण रूपी शराब से होता है।

दयाराम

करम हीन रहिमन लखो, धँसो बड़े घर चोर।

चिंतत ही बड़ लाभ के, जागत ह्वै गो भोर॥

कवि रहीम कहते हैं कि कर्महीन व्यक्ति सपने में एक बड़े घर में चोरी करने जाता है। वह सोचता है कि उस संपन्न घर से काफ़ी धन-दौलत पर हाथ साफ़ कर लेगा। वह मन-ही-मन इस बात पर अत्यंत प्रसन्न होने लगा, परंतु सपना देखते-देखते सुबह हो गई, अर्थात जाग जाने से उसका सपना टूट गया। इस तरह उसकी सारी ख़ुशी काफ़ूर हो गई। कोरे सपने देखने से नहीं, बल्कि कर्म करने से ही मनचाहा फल मिलता है।

कवि रहीम कहते हैं कि कर्महीन व्यक्ति सपने में एक बड़े घर में चोरी करने जाता है। वह सोचता है कि उस संपन्न घर से काफ़ी धन-दौलत पर हाथ साफ़ कर लेगा। वह मन-ही-मन इस बात पर अत्यंत प्रसन्न होने लगा, परंतु सपना देखते-देखते सुबह हो गई, अर्थात जाग जाने से उसका सपना टूट गया। इस तरह उसकी सारी ख़ुशी काफ़ूर हो गई। कोरे सपने देखने से नहीं, बल्कि कर्म करने से ही मनचाहा फल मिलता है।

रहीम

रहिमन गली है साँकरी, दूजो ना ठहराहिं।

आपु अहै तो हरि नहीं, हरि तो आपुन नाहिं॥

रहीम कहते हैं कि (मन की) गली संकरी है, उसमें एक साथ दो जने नहीं गुज़र सकते? यदि वहाँ तुम यानी तुम्हारा अहंकार है तो परमात्मा के लिए वहाँ कोई ठौर नहीं और अगर वहाँ परमात्मा का निवास है तो अहंकार का क्या काम! यानी मन ही वह प्रेम की गली है, जहां अहंकार और भगवान एक साथ नहीं गुज़र सकते, एक साथ नहीं रह सकते।

रहीम कहते हैं कि (मन की) गली संकरी है, उसमें एक साथ दो जने नहीं गुज़र सकते? यदि वहाँ तुम यानी तुम्हारा अहंकार है तो परमात्मा के लिए वहाँ कोई ठौर नहीं और अगर वहाँ परमात्मा का निवास है तो अहंकार का क्या काम! यानी मन ही वह प्रेम की गली है, जहां अहंकार और भगवान एक साथ नहीं गुज़र सकते, एक साथ नहीं रह सकते।

रहीम

असमय परे रहीम कहि, माँगि जात तजि लाज।

ज्यों लछमन माँगन गए, पारासर के नाज॥

रहीम कहते हैं कि बुरा समय आने पर, कठिनाई आने पर, मजबूरी में व्यक्ति लज्जा छोड़कर माँग ही लेता है। लक्ष्मण भी विवशता में पाराशर मुनि के पास अनाज माँगने गए थे।

रहीम कहते हैं कि बुरा समय आने पर, कठिनाई आने पर, मजबूरी में व्यक्ति लज्जा छोड़कर माँग ही लेता है। लक्ष्मण भी विवशता में पाराशर मुनि के पास अनाज माँगने गए थे।

रहीम

अमर बेलि बिनु मूल की, प्रतिपालत है ताहि।

रहिमन ऐसे प्रभुहिं तजि, खोजत फिरिए काहि॥

अमरबेल की जड़ नहीं होती, वह बिना जड़ के फलती-फूलती है। प्रभु बिना जड़ वाली उस लता का पालन-पोषण करते हैं। ऐसे प्रभु को छोड़कर अपनी रक्षा के लिए किसी और को खोजने की क्या आवश्यकता है! उस पर ही विश्वास रखना चाहिए।

अमरबेल की जड़ नहीं होती, वह बिना जड़ के फलती-फूलती है। प्रभु बिना जड़ वाली उस लता का पालन-पोषण करते हैं। ऐसे प्रभु को छोड़कर अपनी रक्षा के लिए किसी और को खोजने की क्या आवश्यकता है! उस पर ही विश्वास रखना चाहिए।

रहीम

कमला थिर रहीम कहि, लखत अधम जे कोय।

प्रभु की सो अपनी कहै, क्यों फजीहत होय।।

रहीम कहते हैं कि लक्ष्मी कहीं स्थिर नहीं रहती! मूर्ख जनों को ही ऐसा लगता है कि वह उनके घर में स्थिर होकर बैठ गई है। उस मूर्ख की फ़ज़ीहत कैसे नहीं होगी जो लक्ष्मी को (जो नारायण की अर्धांगिनी है) अपनी मानकर चलेगा!

रहीम कहते हैं कि लक्ष्मी कहीं स्थिर नहीं रहती! मूर्ख जनों को ही ऐसा लगता है कि वह उनके घर में स्थिर होकर बैठ गई है। उस मूर्ख की फ़ज़ीहत कैसे नहीं होगी जो लक्ष्मी को (जो नारायण की अर्धांगिनी है) अपनी मानकर चलेगा!

रहीम

समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जाय।

सदा रहे नहिं एक सी, का रहीम पछिताए॥

सब समय का खेल है। समय आने पर फल पकते हैं और समय आने पर झड़ भी जाते हैं। रहीम कहते हैं कि समय ही परिस्थितियों को बदलता है अर्थात् समय सदा एक-सा नहीं रहता। इसलिए पछतावा करने का कोई तुक नहीं है।

सब समय का खेल है। समय आने पर फल पकते हैं और समय आने पर झड़ भी जाते हैं। रहीम कहते हैं कि समय ही परिस्थितियों को बदलता है अर्थात् समय सदा एक-सा नहीं रहता। इसलिए पछतावा करने का कोई तुक नहीं है।

रहीम

सीत हरत, तम हरत नित, भुवन भरत नहिं चूक।

रहिमन तेहि रबि को कहा, जो घटि लखै उलूक॥

जो शीत हरता है, अंधकार का हरण करता है अर्थात अँधेरा दूर भगाता है और संसार का भरण करता है। रहीम कहते हैं कि उस सूर्य को अगर उल्लू कमतर आँकता है तो उस सूर्य को क्या फ़र्क पड़ता है! यानी महान लोगों की महानता पर ओछे इंसान के कहने से आँच नहीं आती।

जो शीत हरता है, अंधकार का हरण करता है अर्थात अँधेरा दूर भगाता है और संसार का भरण करता है। रहीम कहते हैं कि उस सूर्य को अगर उल्लू कमतर आँकता है तो उस सूर्य को क्या फ़र्क पड़ता है! यानी महान लोगों की महानता पर ओछे इंसान के कहने से आँच नहीं आती।

रहीम

समय परे ओछे बचन, सब के सहै रहीम।

सभा दुसासन पट गहे, गदा लिए रहे भीम॥

रहीम कहते हैं कि जब समय उल्टा चल रहा हो तो समर्थ इंसान को भी ओछे वचन सुनने पड़ते हैं। यह समय का ही खेल है कि गदाधारी बलवान भीम के सामने दुश्शासन द्रोपदी का चीर हरण करता रहा और भीम हाथ में गदा होते हुए भी नीची आँख किए बैठे रहे।

रहीम कहते हैं कि जब समय उल्टा चल रहा हो तो समर्थ इंसान को भी ओछे वचन सुनने पड़ते हैं। यह समय का ही खेल है कि गदाधारी बलवान भीम के सामने दुश्शासन द्रोपदी का चीर हरण करता रहा और भीम हाथ में गदा होते हुए भी नीची आँख किए बैठे रहे।

रहीम

अमृत ऐसे वचन में, रहिमन रिस की गाँस।

जैसे मिसिरिहु में मिली, निरस बाँस की फाँस॥

अमृत जैसे मधुर वचनों में क्रोध गाँठ या बाधा का काम करता है। वह उसी प्रकार बुरा लगता है जिस प्रकार मिश्री में मिली हुई नीरस बाँस की फाँस बुरी लगती है।

अमृत जैसे मधुर वचनों में क्रोध गाँठ या बाधा का काम करता है। वह उसी प्रकार बुरा लगता है जिस प्रकार मिश्री में मिली हुई नीरस बाँस की फाँस बुरी लगती है।

रहीम

अंड बौड़ रहीम कहि, देखि सचिक्कन पान।

हस्ती-ढक्का, कुल्हड़िन, सहैं ते तरुवर आन॥

रहीम कहते हैं कि अच्छे वृक्ष की जड़, तना, डालियाँ या सुंदर पत्तों का ही महत्त्व नहीं होता है बल्कि वह हाथी के प्रहार तथा कुल्हाड़ियों की चोट को कितना सहन करता है, यह भी देखना चाहिए। क्योंकि इसी से उसकी श्रेष्ठता सिद्ध होती है।

रहीम कहते हैं कि अच्छे वृक्ष की जड़, तना, डालियाँ या सुंदर पत्तों का ही महत्त्व नहीं होता है बल्कि वह हाथी के प्रहार तथा कुल्हाड़ियों की चोट को कितना सहन करता है, यह भी देखना चाहिए। क्योंकि इसी से उसकी श्रेष्ठता सिद्ध होती है।

रहीम

आदर घटे नरेस ढिंग, बसे रहे कछु नाहिं।

जो रहीम कोटिन मिले, धिग जीवन जग माहिं॥

रहीम कहते हैं कि आदर मिलने या सम्मान घट जाने पर राजा के पास रहना भी व्यर्थ है। आदर बिना यदि राजा करोड़ों रुपए भी दे तो उन रुपयों को प्राप्त करना धिक्कार है। आदर-विहीन जीवन व्यर्थ है।

रहीम कहते हैं कि आदर मिलने या सम्मान घट जाने पर राजा के पास रहना भी व्यर्थ है। आदर बिना यदि राजा करोड़ों रुपए भी दे तो उन रुपयों को प्राप्त करना धिक्कार है। आदर-विहीन जीवन व्यर्थ है।

रहीम

आप काहू काम के, डार पात फल फूल।

औरन को रोकत फिरै, रहिमन पेड़ बबूल।।

रहीम कहते हैं कि कुछ व्यक्ति दूसरों का कोई उपकार तो करते नहीं हैं, उलटे उनके मार्ग में बाधाएँ ही खड़ी करते हैं। यह बात कवि ने बबूल के माध्यम से स्पष्ट की है। बबूल की डालें, पत्ते, फल-फूल तो किसी काम के होते नहीं हैं, वह अपने काँटों द्वारा दूसरों के मार्ग को और बाधित किया करता है।

रहीम कहते हैं कि कुछ व्यक्ति दूसरों का कोई उपकार तो करते नहीं हैं, उलटे उनके मार्ग में बाधाएँ ही खड़ी करते हैं। यह बात कवि ने बबूल के माध्यम से स्पष्ट की है। बबूल की डालें, पत्ते, फल-फूल तो किसी काम के होते नहीं हैं, वह अपने काँटों द्वारा दूसरों के मार्ग को और बाधित किया करता है।

रहीम

करत निपुनई गुन बिना, रहिमन निपुन हजूर।

मानहु टेरत बिटप चढ़ि, मोहि समान को कूर॥

कवि रहीम कहते हैं कि स्वयं गुणों से रहित होने अर्थात अवगुणी होने पर भी जो गुणियों के समक्ष चतुराई दिखाने की कोशिश करता है, तो उसकी पोल खुल जाती है और वह पकड़ा जाता है। उसका यह प्रयास ऐसा होता है कि मानो वह वृक्ष पर चढ़कर अपने पाखंडी होने की घोषणा कर रहा हो, स्वयं को चिल्ला-चिल्लाकर बेवक़ूफ़ बता रहा हो।

कवि रहीम कहते हैं कि स्वयं गुणों से रहित होने अर्थात अवगुणी होने पर भी जो गुणियों के समक्ष चतुराई दिखाने की कोशिश करता है, तो उसकी पोल खुल जाती है और वह पकड़ा जाता है। उसका यह प्रयास ऐसा होता है कि मानो वह वृक्ष पर चढ़कर अपने पाखंडी होने की घोषणा कर रहा हो, स्वयं को चिल्ला-चिल्लाकर बेवक़ूफ़ बता रहा हो।

रहीम

समदरसी ते निकट है, भुगति-भुगति भरपूर।

विषम दरस वा नरन तें, सदा सरबदा दूर॥

जो लोग समदर्शी हैं, प्राणीमात्र के लिए समान भाव रखते हैं, उनको भोग और मोक्ष दोनों अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं। इसके विपरीत जो विषमदर्शी हैं, जो भेद-भावना से काम लेते हैं, उन्हें वह मुक्ति कदापि नहीं प्राप्त हो सकती। ऐसे लोगों से भोग और मोक्ष दोनों दूर भागते हैं।

जो लोग समदर्शी हैं, प्राणीमात्र के लिए समान भाव रखते हैं, उनको भोग और मोक्ष दोनों अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं। इसके विपरीत जो विषमदर्शी हैं, जो भेद-भावना से काम लेते हैं, उन्हें वह मुक्ति कदापि नहीं प्राप्त हो सकती। ऐसे लोगों से भोग और मोक्ष दोनों दूर भागते हैं।

चंदबरदाई

साधु मिले गुरुपाइयां, मिट गये सब संदेह।

सहजों कोसम हो गयो, कह गिरिवर कह गेह॥

सहजोबाई कहती हैं कि यदि सन्त जन मिल जाए, तो सद्गुरु की प्राप्ति हो जाती है और सारा संदेह या अज्ञान मिट जाता है। सन्त जन के प्रभाव से चाहे बड़ा पर्वत हो या घर, सब एक समान लगते हैं।

सहजोबाई कहती हैं कि यदि सन्त जन मिल जाए, तो सद्गुरु की प्राप्ति हो जाती है और सारा संदेह या अज्ञान मिट जाता है। सन्त जन के प्रभाव से चाहे बड़ा पर्वत हो या घर, सब एक समान लगते हैं।

सहजोबाई

मन में तो आनंद है, तनु बौरा सबअंग।

ना काहू के संग है, सहजो ना कोई संग॥

सहजोबाई कहती हैं कि मन में भगवत्प्रेम से अनुभूत आनंद छा जाने पर शरीर के सब अंग भाव-मग्न हो जाते हैं। उस दशा में तो किसी के साथ रहने की ज़रूरत पड़ती है और कोई संगी-साथी रह पाता है। अर्थात् ईश्वरी प्रेमानन्द में बाहरी साधन व्यर्थ हो जाते हैं।

सहजोबाई कहती हैं कि मन में भगवत्प्रेम से अनुभूत आनंद छा जाने पर शरीर के सब अंग भाव-मग्न हो जाते हैं। उस दशा में तो किसी के साथ रहने की ज़रूरत पड़ती है और कोई संगी-साथी रह पाता है। अर्थात् ईश्वरी प्रेमानन्द में बाहरी साधन व्यर्थ हो जाते हैं।

सहजोबाई