यह देश कैसे बच सकता है?
अतुल तिवारी
09 अक्तूबर 2026
जब लोग मेरी और राहुल गांधी की मैच्योर न होने की समस्या को समस्या मानना बंद कर दें। झूठ बोलने के लिए सच याद रखना पड़े और व्यंजना की व्याख्या करने की ज़रूरत न पड़े। जब मैं कहूँ कि मेरी बात का बुरा मत मानना और सामने वाला पहली बार सच में बुरा न माने। बुरा न माने बारहवाँ खिलाड़ी भी। अपने खेलने से ज़्यादा टीम के खेलने की वजह समझे। ...कि आराम की ज़रूरत को दफ़्तर, छुट्टी की साज़िश न माने। वांछित चेतना इतनी वांछित न रहे कि उसे पाने के लिए पूरा जीवन इंतिज़ार करना पड़े।
यह देश शायद तब भी बचेगा जब कानपुर को दुपहर की नींद वापस मिल जाए। इलाहाबाद को फिर से यह भरोसा कि तीन नदियाँ मिलने के बाद भी आदमी अकेला रह सकता है। ख़त्म होते लखनऊ को अतीत की तहज़ीब वापस भले न मिले। पीछे हट सकने की आदत फिर से ईजाद हो जाए। दिल्ली को सर्दियों की धूप मिले। मुंबई को बारिश में बिना छतरी के भीगने का अधिकार और कोलकाता को बीत गए ट्राम की धीमी रफ़्तार। चेन्नई को भरपूर दिसंबर के साथ पूर्वोत्तर रेलवे के हेडक्वार्टर और गोरखपुर को वह शाम मिल जाए जिसमें ट्रेन पकड़ने की जल्दी न हो। सारे देश को अलीगढ़ का ताला लगाने की ज़रूरत कम पड़े और दरवाज़े पर बैठने की आदत ज़्यादा। चंडीगढ़ को उसकी सीधी सड़कों के बीच कोई टेढ़ी-मेढ़ी प्रेम कहानी मिलती ही होगी। ...और मिले। नागपुर को संतरे के साथ मिले प्रगतिशीलता। अजमेर ख़्वाजा की दरगाह तक जाने वाली उस धीमी चाल के बीच दलाल न मिले और नासिक को शराब से पहले ज़रूर याद आएँ अंगूर। मैसूर को दशहरे के हाथियों के बीच बैठा वह बच्चा मिल जाए जिसे अभी यह नहीं मालूम कि बड़े होकर उसे क्या बनना है।
बचाने की इतनी सारी छोटी-छोटी वजहें हों तो बचाने की बड़ी चिंता कुछ देर टाली जा सकती है। आठवें दशक के कवियों ने देश को बचाने पर इतना साहित्य ख़र्च किया कि बाद की पीढ़ियों के पास देश बचाने के लिए सिर्फ़ उसकी आलोचना बची। ...तो क्यों न कोसा जाए लोकतंत्र को, जिसे कभी-कभी ख़तरे में रहने का शौक़ होता है! पहले यह पता चले कि ख़तरा किस तरफ़ से है। आपके अनुप्रास की भाषा में मौजूद अतिशयोक्ति अलंकार की तरफ़ से या मेरे दाहिने पैर के अँगूठे की खुजली से जिसका सालों से कोई इलाज नहीं मिल रहा। मेरी तनख़्वाह कहाँ जा रही इसका हिसाब नहीं मिल रहा। पता नहीं चल रहा कि मेरी प्रेमिका की रुचि मुझमें कम क्यों हो रही! क्या मैं उसकी रुचि को परखने की उम्र को पार कर चुका हूँ? ‘क्यों’ के शिल्प में ही पूछता हूँ कि क्यों रेलवे स्टेशन के बाहर बालों से खुरंट नोचते पागलों के नाख़ूनों में ख़ून जमकर काला हो चुका है, मगर उँगलियाँ हैं कि रुक नहीं रहीं। क्यों आपको पता नहीं कि आपका शहर आँखों से शुरू होता है? क़ुलियों, भिखारियों, दलालों, टैक्सी और पानवालों की आँखें हमारी आँखों में अजनबी तत्त्व खोजकर हमें कच्चे माल में बदल रही हैं। अनुप्रास और अतिशयोक्ति की भाषा में यह समझ नहीं आएगा कि दरअस्ल अजनबी आँखें ही ठगी का सामान हैं। आँखों में ढील खोज लेने वाले क़दम-क़दम पर हैं। हम कितनी बार आँखें बचाकर और आँखें बनाकर चलें? क्यों पृथ्वी अपने अक्ष पर हमारी पराजय से बेख़बर घूम रही है? सूदख़ोर स्मृतियाँ जितना प्रेम देती हैं, उससे ज़्यादा पछतावा क्यों वसूलती हैं? ख़तरा इधर भी है, उधर भी। बीच में लोकतंत्र है।
डिजिटल इंडिया होता रहेगा। कैशलेस भारत और जाति-जनगणना समेत संख्या के बहुत सारे सवालों की आवाजाही बनी रहेगी। चुनाव होंगे, उपचुनाव होंगे, घोषणापत्र आएँगे, भविष्यकाल में वादे किए जाएँगे और कार्यकाल में उनका हिसाब माँगा जाएगा। दिल्ली में बसें हड़ताल पर जाएँगी तो मेट्रो एक दिन में बयासी लाख से ज़्यादा यात्रियों को ढो देंगी। शहर अचानक यह जान लेगा कि सार्वजनिक परिवहन वह अदृश्य चीज़ है जिसके रुकते ही आबादी अपने पैरों की असली संख्या गिनने लगती है। मेट्रो रिकॉर्ड बनाएगी, अतिरिक्त ट्रेनें चलेंगी और आदमी फिर भी प्लेटफ़ॉर्म पर किसी तरह अपनी जगह बना लेगा। ईपीएफ़ओ की वेतन-सीमा बढ़ेगी। सेमीकंडक्टर और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस आएगा। डेटा सेंटर आएँगे। देश अपनी सारी पुरानी समस्याओं के ऊपर नई तकनीक की एक चमकदार परत चढ़ाता रहेगा। जो होता आया है, उसका कुछ हिस्सा फिर होगा। जो कभी नहीं हुआ, उसका उद्घाटन पहले हो जाएगा। देश कभी एक्सप्रेसवे और कभी गड्ढे में चलता रहेगा।
यह देश तब भी बचेगा जब ‘दीवार’ के विजय को इतना आत्मविश्वास हो कि सामंत को पता नहीं चलेगा कि वह डाबर सा’ब का आदमी है। दिलवाले अपनी दुल्हनिया तभी ले जा पाएँगे जब रास्ते में हर आदमी बराती होने के बजाय चौकीदार बनने से इनकार कर दे। ‘चुपके-चुपके’ जैसी शरारतों में फिर वह मासूमियत लौटे जिसमें किसी को किसी की नागरिकता, विचारधारा या स्क्रीनशॉट की चिंता न हो। अमरीका से लौटा ‘स्वदेस’ का मोहन गाँव में बिजली पहुँचाने के बाद कावेरी अम्मा को गले लगाए। ‘गंगाजल’ फ़िल्म में कमीशन की लंबी इन्क्वायरी और सैकड़ों गवाहों के बयान का कुछ भी परिणाम नहीं निकला था। अंत में सभी आरोपी पुलिसकर्मी बहाल और बरी हो गए थे। तेजपुर की जनता का सच चाहे जो भी रहा हो, अमित कुमार अपना सच जानते थे। उसे उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। एसपी अमित कुमार की तरह हम भी अपने-अपने सत्य को पहचाने और उसके साथ खड़े होने की हिम्मत रखें।
यह वाक्य मैं दिल्ली से बोल रहा हूँ। दिल्ली को पुरानी दिल्ली की भूख वापस मिल जाए। खाने की चीज़ों से अधिक उसके आस-पास की आवाज़ें, धुआँ, ठेला, मोलभाव, पसीना और किसी अनजान आदमी की सलाह शामिल हो जाने वाली आदत भी। यह देश कैसे बच सकता है? यह सवाल क्या सिर्फ़ इसलिए कि हम उसे बचाने की चिंता करते रहें? क्या हर सुबह अख़बार खोलकर यह देखना ज़रूरी है कि देश आज कितना बचा और कितना ख़तरे में आया? क्या आदमी का इतना समझदार होना ज़रूरी है कि वह अपनी मूर्खता को भी पहचान सके? इसलिए कहता हूँ कि यह देश तभी बचेगा जब मैं और मेरा दोस्त एक कमरे में साथ रहेंगे। आधा-आधा किराया देंगे। बिजली का बिल बराबर बाँटेंगे। महीने के आख़िरी पाँच दिन एक-दूसरे से पैसे छिपाएँगे और पहली तारीख़ को फिर दोस्त हो जाएँगे। शुक्रवार की रात ख़ूब शराब पीकर एक-दूसरे और दुनिया को गालियाँ देंगे। यह देश तब भी बचेगा जब हम यह भ्रम छोड़ देंगे कि देश कोई अलग चीज़ है।
अंत में “बस इतना बताना था कि बिस्मिल का संदेश आया है... शाहजहाँपुर से लखनऊ जाने वाली 8 डाउन पैसेंजर ट्रेन, जिसमें अँग्रेज़ों का पैसा जाता है... उसे हम काकोरी में लूटेंगे... और फिर उन पैसों से हथियार ख़रीदेंगे।”
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