विलेम डैफ़ो का वक्तव्य : ‘जीतने के लिए आपका उपस्थित होना ज़रूरी है’
विलेम डैफो
27 मार्च 2026
संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) के अंतर्गत संचालित इंटरनेशनल थिएटर इंस्टीट्यूट (International Theatre Institute – ITI), पेरिस की कार्यकारी परिषद् प्रत्येक वर्ष किसी विशिष्ट रंगमंच व्यक्तित्व का चयन करती है, जो विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर अपना संदेश देता है। यह दिवस 1962 से हर वर्ष 27 मार्च को विश्वभर में मनाया जा रहा है। वर्ष 2026 के लिए यह सम्मान सुपरिचित अमेरिकन अभिनेता और रंगकर्मी विलेम डैफ़ो (Willem Dafoe) को प्रदान किया गया है, जिन्होंने रंगमंच और सिनेमा—दोनों क्षेत्रों में अपनी बहुमुखी प्रतिभा से अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई है। विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर दुनिया भर के रंगकर्मी और दर्शक एक साथ मिलकर रंगमंच की रचनात्मक शक्ति, उसकी सामाजिक भूमिका और मानवीय संवेदना को जीवित रखने में उसकी महत्ता को याद करते हैं।
विलेम डैफ़ो (Willem Dafoe) का जन्म 22 जुलाई 1955 को अमेरिका के विस्कॉन्सिन राज्य में हुआ। अभिनय के प्रति उनका झुकाव प्रारंभ से ही था, किंतु उनकी वास्तविक पहचान रंगमंच के माध्यम से बनी। वह 1977 से 2003 तक न्यूयॉर्क के प्रसिद्ध प्रयोगधर्मी रंगमंच समूह ‘द वूस्टर ग्रुप’ (The Wooster Group) के सदस्य रहे। इस समूह के साथ उन्होंने अनेक मौलिक और प्रयोगधर्मी नाट्य प्रस्तुतियों के निर्माण तथा मंचन में भाग लिया। इन प्रस्तुतियों का मुख्य मंच न्यूयॉर्क का ‘द परफ़ॉर्मिंग गैराज’ (The Performing Garage) था, जहाँ से बाद में इन्हें दुनिया के विभिन्न देशों में प्रस्तुत किया गया। इस दौर ने डैफ़ो को अभिनय के नए प्रयोगों और मंचीय अभिव्यक्ति की गहरी समझ प्रदान की।
रंगमंच में लंबे अनुभव के बाद विलेम डैफ़ो ने फ़िल्मों में प्रवेश किया और शीघ्र ही अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर ली। उनकी प्रमुख फ़िल्मों में ‘Platoon’ (1986) विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिसमें उनके प्रभावशाली अभिनय ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। इसके बाद ‘The Last Temptation of Christ’ (1988) में उन्होंने यीशु मसीह (Jesus) की जटिल और चुनौतीपूर्ण भूमिका निभाई, जिसने उनकी अभिनय क्षमता को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा दिया। लोकप्रिय संस्कृति में उनकी पहचान और अधिक सुदृढ़ तब हुई, जब उन्होंने ‘Spider-Man’ में ग्रीन गोब्लिन का किरदार निभाया। यह भूमिका आज भी सुपरहीरो फ़िल्मों के सबसे यादगार खलनायकों में गिनी जाती है।
विलेम डैफ़ो न केवल एक सफल फ़िल्म अभिनेता हैं, बल्कि रंगमंच से उनका गहरा और सतत संबंध रहा है। वह ‘ला बिएनाले दी वेनेज़िया’ (La Biennale di Venezia) के थिएटर विभाग के कला निदेशक भी रहे हैं। इसके अतिरिक्त वह प्रयोगधर्मी रंगमंच समूह वूस्टर ग्रुप के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे, जिसने 1977 से 2004 के बीच अवां-गार्द (avant-garde) (प्रयोगधर्मी) रंगमंच की एक विशिष्ट शैली विकसित की। अपने रंगमंचीय जीवन में उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण कलाकारों और निर्देशकों के साथ काम किया, जिनमें बॉब विल्सन, मरीना अब्रामोविच, रिचर्ड फ़ोरमैन और रोमियो कास्टेलुच्ची जैसे प्रतिष्ठित नाम शामिल हैं।
1980 के दशक की शुरुआत में उन्होंने सिनेमा में भी सक्रिय रूप से काम करना प्रारंभ किया और धीरे-धीरे स्वतंत्र (इंडिपेंडेंट) तथा मुख्यधारा की फ़िल्मों—दोनों में अपनी बहुमुखी प्रतिभा के कारण अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की। उन्हें अब तक चार बार एकेडमी अवॉर्ड (ऑस्कर) के लिए नामांकित किया जा चुका है। वर्ष 2018 में ‘वेनेज़िया फ़िल्म फ़ेस्टिवल’ में उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए प्रतिष्ठित कोप्पा वोल्पी (Coppa Volpi) पुरस्कार से सम्मानित किया गया। रंगमंच के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता आज भी उनकी कलात्मक दृष्टि और अभिनय शैली को निरंतर प्रभावित करती है।
2026 में विलेम डैफ़ो का संदेश रंगमंच की जीवंतता, कलाकारों और दर्शकों के बीच साझा अनुभव की शक्ति तथा सामाजिक-सांस्कृतिक संवाद में थिएटर की महत्त्वपूर्ण भूमिका पर केंद्रित है। यह संदेश हमें याद दिलाता है कि रंगमंच केवल एक कला नहीं, बल्कि मानवीय अनुभवों और विचारों को साझा करने का एक जीवंत माध्यम है।
विश्व रंगमच दिवस 2026 का संदेश [विलेम डैफ़ो]
मैं मुख्यतः एक फ़िल्म अभिनेता के रूप में जाना जाता हूँ, लेकिन मेरी वास्तविक जड़ें रंगमंच में हैं। 1977 से 2003 तक मैं न्यूयॉर्क के प्रसिद्ध थिएटर समूह ‘द वूस्टर ग्रुप’ (The Wooster Group) का सदस्य रहा। इस दौरान हमने न्यूयॉर्क के ‘द परफ़ॉर्मिंग गैराज’ (The Performing Garage) में अनेक मौलिक नाट्य प्रस्तुतियाँ तैयार कीं और उन्हें दुनिया भर में प्रस्तुत किया। मुझे रिचर्ड फ़ोरमैन (Richard Foreman), रॉबर्ट विल्सन (Robert Wilson) और रोमियो कास्टेलुच्ची (Romeo Castellucci) जैसे महत्त्वपूर्ण रंगकर्मियों के साथ काम करने का अवसर भी मिला।
आज मैं ‘द वेनिस थिएटर बिएनाले’ (The Venice Theatre Biennale) का कला निदेशक हूँ। यह ज़िम्मेदारी, दुनिया में तेज़ी से बदलती परिस्थितियाँ, और रंगमंच की ओर फिर से लौटने की मेरी इच्छा—इन सबने मेरे भीतर यह विश्वास और गहरा किया है कि थिएटर में एक अनोखी सकारात्मक शक्ति है और आज भी उसका महत्त्व अत्यंत गहरा है।
वूस्टर ग्रुप के साथ अपने शुरुआती दिनों में कई बार ऐसा होता था कि हमारे प्रदर्शनों में दर्शकों की संख्या बहुत कम होती थी। कभी-कभी तो स्थिति यह होती थी कि दर्शकों से अधिक कलाकार मंच पर होते। ऐसे में नियम यह था कि हम चाहें तो प्रदर्शन रद्द कर सकते थे। लेकिन हमने ऐसा कभी नहीं किया। हमारे समूह के कई सदस्य पारंपरिक रूप से थिएटर में प्रशिक्षित नहीं थे; वे अलग-अलग क्षेत्रों से आए लोग थे जो मिलकर रंगमंच रच रहे थे। इसलिए “शो हर हाल में होना चाहिए” हमारा घोषित सिद्धांत नहीं था, फिर भी हमें लगता था कि दर्शकों के साथ अपनी यह मुलाक़ात निभाना हमारी ज़िम्मेदारी है।
हम अक्सर दिन में रिहर्सल करते और शाम को उसी सामग्री को “वर्क-इन-प्रोग्रेस” के रूप में दर्शकों के सामने प्रस्तुत करते। कई बार एक नाटक पर वर्षों तक काम चलता रहता था और इस दौरान पुराने प्रदर्शनों के दौरों से ही हमारी जीविका चलती थी। एक ही रचना पर लंबे समय तक काम करना कभी-कभी थकाऊ और कठिन भी हो जाता था, पर इन अधूरी या विकसित हो रही प्रस्तुतियों में एक अलग ही उत्साह होता था—भले ही दर्शकों की संख्या बहुत कम क्यों न हो।
इन्हीं अनुभवों ने मुझे यह समझाया कि दर्शक, चाहे कितने ही कम हों, उनकी उपस्थिति एक साक्षी के रूप में थिएटर को उसका वास्तविक अर्थ और जीवन देती है।
जुए के अड्डों में अक्सर लिखा होता है—“जीतने के लिए आपका उपस्थित होना ज़रूरी है।” रंगमंच भी इसी सिद्धांत पर चलता है। सृजन की प्रक्रिया को वास्तविक समय में साझा करना—जो भले ही योजनाबद्ध और तैयार किया गया हो, लेकिन हर बार नया और अलग अनुभव बन जाता है—यही थिएटर की सबसे बड़ी शक्ति है।
आज के सामाजिक और राजनीतिक समय में थिएटर पहले से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण और जीवंत हो गया है, क्योंकि यह हमें स्वयं को और अपने समय को समझने का एक सशक्त माध्यम प्रदान करता है।
आज के समय में जिस मुद्दे को अक्सर “elephant in the room” यानी सबको दिखने वाली लेकिन अनकही समस्या कहा जाता है, वह है नई तकनीकों और सोशल नेटवर्किंग का बढ़ता प्रभाव। ये माध्यम लोगों को जोड़ने का दावा करते हैं, लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि उन्होंने मनुष्यों के बीच वास्तविक संबंधों को कमज़ोर कर दिया है और लोगों को एक-दूसरे से दूर भी किया है।
मैं स्वयं प्रतिदिन कंप्यूटर का उपयोग करता हूँ। यद्यपि मैं सोशल मीडिया पर सक्रिय नहीं हूँ, फिर भी एक अभिनेता के रूप में कभी-कभी अपने बारे में इंटरनेट पर खोज करता हूँ और जानकारी के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता Artificial Intelligence (AI) का सहारा भी लेता हूँ। लेकिन यह समझना कठिन नहीं कि धीरे-धीरे मानवीय संपर्क की जगह हमारे उपकरणों के साथ बने संबंध ले सकते हैं।
नि:संदेह तकनीक कई मामलों में उपयोगी सिद्ध होती है, लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि डिजिटल संवाद के दूसरे छोर पर वास्तव में कौन है—यह हमेशा स्पष्ट नहीं होता। यही स्थिति सत्य और वास्तविकता के संकट को भी गहरा बनाती है। इंटरनेट कई सवाल खड़े करता है, पर वह उस गहरे आश्चर्य और जीवंत अनुभव को शायद ही पैदा कर पाता है जो रंगमंच में संभव है। रंगमंच का यह जादू दर्शकों की एकाग्रता, उनकी सक्रिय भागीदारी और उस स्वतः निर्मित समुदाय से पैदा होता है, जो मंच और दर्शकों के बीच एक जीवंत संवाद के रूप में उपस्थित होता है।
एक अभिनेता और रंगकर्मी के रूप में मेरा विश्वास आज भी रंगमंच की शक्ति में अडिग है। ऐसे समय में जब दुनिया अधिक विभाजित, नियंत्रित और हिंसक होती दिखाई देती है, रंगकर्मियों के सामने एक बड़ी चुनौती है—कि वे थिएटर को केवल व्यावसायिक मनोरंजन या परंपराओं के यांत्रिक संरक्षण तक सीमित न होने दें। इसके बजाय थिएटर की उस सृजनात्मक शक्ति को विकसित करना आवश्यक है जो लोगों, समुदायों और संस्कृतियों को जोड़ सके और सबसे बढ़कर यह प्रश्न उठा सके कि हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
महान् रंगमंच हमेशा हमारे सोचने के ढंग को चुनौती देता है और हमें यह कल्पना करने के लिए प्रेरित करता है कि हम किस तरह का भविष्य बनाना चाहते हैं।
मनुष्य मूलतः एक सामाजिक प्राणी है और जैविक रूप से दुनिया के साथ संवाद करने के लिए बना है। हमारी प्रत्येक इंद्रिय संसार से मिलने का एक द्वार है। इसी अनुभव और संपर्क के माध्यम से हम अपनी पहचान को और गहराई से समझ पाते हैं। कहानी, सौंदर्यबोध, भाषा, गति और मंच-सज्जा—इन सबके संगम से रंगमंच एक समग्र कला के रूप में हमें यह देखने की क्षमता देता है कि अतीत क्या था, वर्तमान क्या है और हमारा संसार आगे कैसा हो सकता है।
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अनुवाद और प्रस्तुति : राकेश कुमार मिश्र
विलेम डैफ़ो के मूल अँग्रेज़ी वक्तव्य के लिए यहाँ देखें : https://world-theatre-day.org/messageauthor.html
साभार : https://world-theatre-day.org/
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