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अनफ़्रेम्ड : लाइफ़ में जब ‘स्किप इंट्रो’ नहीं था

मुझे प्रतीक्षा की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति ‘रजनीगंधा’ फ़िल्म में दिखती है, बासु चटर्जी इंतज़ार और दूरियों के बीच सिमटे छोटे-छोटे पलों को सहेजते चलते हैं। “रजनीगंधा फूल तुम्हारे...” गीत देखते हुए स्क्रीन पर सत्तर के दशक की ख़ुशनुमा-सी शाम उतर आती है। सफ़ेद रजनीगंधा के फूलों की ख़ुशबू और किसी की यादें समेटे हुए अपनी बालकनी से झाँती एक युवा लड़की जो अपने ही भीतर खिल उठे प्रेम से सम्मोहित है। शाम का झुटपुटा अँधेरे में बदल चुका है। घरों की बत्तियाँ जल गई हैं। न टेलीविज़न, न मोबाइल और सड़कों से उठने वाला ट्रैफ़िक का शोर।

संगीतकार सलिल चौधरी मुखड़े की पहली लाइन को सिर्फ़ एक गुनगुनाहट में बदल देते हैं। जैसे यह गीत दीपा के मन की भीतरी गहराइयों से उठता हुआ शाम में फैल जाता है। प्रतीक्षा के कितने रंग इस शाम में हैं। अभी-अभी दीपा ने संजय को विदा किया है। पिछले दिन वाले रजनीगंधा के फूल कुम्हलाने लगे हैं। वह उन्हें गुलदस्ते से हटाकर आज के नए फूल लगा देती है। रंगीन प्रिंटेड साड़ी, सफ़ेद ब्लाउज़ और हाथ में घड़ी वाली यह युवती किसी बिल्कुल रिक्त और सुंदर शाम में अपने ही ख़यालों में खोई नज़र आती है।

छोटी-छोटी प्रतीक्षाओं में जीवन ठहरता हुआ बढ़ता है। वर्तमान और भविष्य के बीच एक स्तब्ध पल ही इंतज़ार है, जाने कितने मनोभावों को अपने में समेटे हुए। कभी भीतर एक संभावना-सी जगती है, शायद कुछ अच्छा होने वाला है। कभी बेचैनी कि आगे क्या होगा? कभी मन अतीत में चला जाता है, कभी आने वाले समय की कल्पना करने लगता है। कभी-कभी ये सारी भावनाएँ भय और संशय में बदलने लगती हैं।

घड़ी का समय सबके लिए एक-सा हो सकता है, लेकिन प्रतीक्षा का समय हर व्यक्ति का अपना होता है।

इसका सुख और दुःख दोनों ही हमारे वर्तमान में किसी की अनुपस्थिति से जन्म लेते हैं। मगर प्रतीक्षा हर बार लौटने की संभावना लिए होती है। इसके दूसरे छोर पर उम्मीद खड़ी रहती है। यह उम्मीद ख़त्म हो जाए तो इंतज़ार भी ख़त्म हो जाएगा। भारतीय समाज में स्त्रियों का अस्तित्व उम्मीद और प्रतीक्षा के बीच झूलता रहता है। बाबुषा कोहली लिखती हैं :

तुम परखना
इंतज़ार के ‘ज’ में जो नुक़्ता है
औरत के माथे की बिंदी है

कभी-कभी प्रतीक्षा पूरे अस्तित्व में समा सकती है। उसे सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है। जैसे अज्ञेय अपनी छोटी-सी कविता ‘ऐसा कोई घर आपने देखा है’ में लिखते हैं :

एक द्वार या झरोखा एक नारी  
एक नसेनी और एक प्रतीक्षा 
सदैव एक प्रतीक्षा किसकी प्रतीक्षा? 
नारी की नसेनी की 
द्वार-देहरी की।

प्रतीक्षा का एक प्रतिपक्ष भी होता है, जिसे निर्मल वर्मा ‘वे दिन’ में छूते हुए आगे बढ़ते हैं :

यह विचार ही बहुत रुआँसा लगता है कि कोई ख़ाली-ख़ाली-सा होकर तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हो। यह असंभव-सा लगता है कि जिस घड़ी तुम सो रहे हो, उस घड़ी कोई तुम्हारी बाट जोह रहा हो। तुम्हें अचानक पहली बार अपनी अनिवार्यता का पता चलता है और उस कातर से डर का जिसमें पहली बार तुम्हारे माँ-बाप साझा नहीं करते, तुम्हारे मित्र भी नहीं!

निर्मल का यह कथन सहसा ‘घड़ी में समय’ के उस अजीब पैराडॉक्स की तरफ़ भी ले जाता है, जब यह प्रश्न हमेशा हमारे सामने उपस्थित रहता है कि दो अलग-अलग टाइम और स्पेस, दो अलग-अलग मनःस्थिति में जीने वालों के बीच समय के अंतर्संबंध को किस घड़ी से मापा जाएगा? बर्गसाँ कहते हैं, “समय सिर्फ़ वह नहीं है जो घड़ी हमें बताती है, बल्कि वह भी है जिसे चेतना जीती है।” इमैनुएल कांट मानते हैं कि हम दुनिया को समय के बाहर अनुभव नहीं कर सकते। हमारी चेतना घटनाओं को पहले और बाद के रूप में व्यवस्थित करती है। हम दुनिया को समय के ज़रिये ही अनुभव करते हैं, घड़ी तो सिर्फ़ चेतना की उन अनुभूतियों को एक क्रम में बाँधने का उपाय है। प्रतीक्षा समय की इसी अनुभूति को तीखा कर देती है। हमारी चेतना सिर्फ़ घटनाओं को नहीं दर्ज करती, बल्कि घटना होने से पहले से ही उसे व्यवस्थित करने लगती है—यही प्रतीक्षा है।

आइंस्टीन कहते हैं, “समय सबके लिए एक जैसा नहीं है।” उनके अनुसार कोई एक सार्वभौमिक घड़ी नहीं है जो पूरे ब्रह्मांड के लिए समान समय बता रही हो। क्रिस्टोफ़र नोलन ने इसी सिद्धांत को प्रेम और इंतज़ार में गुँथे रिश्तों की एक मार्मिक फ़िल्म में बदल दिया। ‘इंटरस्टेलर’ इसी थ्योरी को मानवीय त्रासदी में बदल देती है। एक ऐसा दृश्य जहाँ पृथ्वी पर फ़सलें नष्ट हो रही हैं और मानव-सभ्यता के सामने भोजन और जीवन बचाने का संकट है। पूर्व पायलट और इंजीनियर कूपर वैज्ञानिकों की एक टीम के साथ अंतरिक्ष में जाता है। अपनी छोटी बेटी मर्फ़ से यह कहकर कि वह लौटकर आएगा, मगर एक ब्लैक होल के पास अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण के कारण समय अलग गति से बीतता है। कूपर के लिए कुछ घंटे बीतते हैं, जबकि पृथ्वी पर वर्षों गुज़र जाते हैं। कूपर ने मर्फ़ को छोड़ते समय जितना समय सोचा था, मर्फ़ ने उससे कहीं अधिक समय उसका इंतज़ार किया। विडंबना यह है कि कूपर स्वयं उस प्रतीक्षा को नहीं जी रहा था।

विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास ‘नौकर की क़मीज़’ में एक प्रसंग है—ट्रक-ड्राइवर से बातचीत का... वह लिखते हैं, “जब उसका पहला लड़का पैदा हुआ था तब वह अपने घर से क़रीब आठ सौ किलोमीटर दूर था। जब दूसरी लड़की पैदा हुई थी तब क़रीब तीन सौ किलोमीटर दूर था। जब तीसरी लड़की पैदा हुई थी, तब केवल दस किलोमीटर दूर था। पर हर बार घर की तरफ़ ही लौट रहा था। घर से दूर नहीं जा रहा था। आठ सौ किलोमीटर दूर था तब भी घर की तरफ़ ही लौट रहा था।”

हमने अपने जीवन में प्रतीक्षाओं का निषेध किया है। हर इंतज़ार को ‘किल’ करने का पूरा इंतज़ाम करके चलते हैं हम। आज के समय में इस काम को अंज़ाम देने में काफ़ी हद तक सफलता भी हासिल हो चुकी है। 

‘इत्तेफ़ाक़’ [1969] फ़िल्म की कहानी शुरू होने पहले हम बहुत देर तक स्क्रीन पर सर्पिल और चक्राकार आकृतियाँ घूमते देखते रहते हैं। लार्स वॉन ट्रायर की फ़िल्म ‘यूरोपा’ जब शुरू होती है तो लगभग दो मिनट तक चलती रेल की पटरियों का दृश्य है। कैमरा जैसे ट्रेन के आगे पटरियों पर लगातार आगे बढ़ रहा हो। दर्शक धीरे-धीरे फ़िल्म के भीतर जाता है। यह दर्शक को समय और स्थान से दूसरे समय और स्थान में ले जाने की प्रक्रिया है। अब लंबे इंट्रो की उकताहट से बचने के लिए ‘स्किप’ विकल्प आ गया है। 

ठहरना, इंतज़ार करना, समय का रुक जाना, समय से आगे निकल जाना, समय के पीछे लौट-लौटकर जाना... जाने कितने खेल समय के साथ हम खेलते थे। दुपहर का ख़ालीपन, रात का सूनापन और लंबी शामें, वे भी स्मृतियों का हिस्सा बनते जा रही हैं।  शायद अब हम प्रतीक्षा की भी प्रतीक्षा करने के समय में जी रहे हैं...

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