अनफ़्रेम्ड : AI से परे हाँफता वो असल ‘अस्सी’
दिनेश श्रीनेत
17 सितम्बर 2026
अस्सी का दशक एक रस्सियों से बँधा हिलता हुआ पुल था। इसके एक छोर पर पीली टिमटिमाती हुई रोशनियाँ थीं और दूसरे छोर पर नीली डेनिम पहने हाथ में गिटार लिए कोई युवा। शुरुआत जर्जर और थकी हुई थी और अंत ओस की बूँदों की तरह ताज़ा।
हम उन पिताओं की संतान थे, जिन्होंने लंबी लाइनों में लगे-लगे आर्थिक असुरक्षा से जूझते और स्थायित्व की तलाश में अपना जीवन बिता दिया। हमारे घर पिकासो की भूतिया तस्वीरों जैसे हुआ करते थे। हमारे बचपन की शाम रेडियो पर किसान भाइयों के प्रोग्राम की बजती सिग्नेचर ट्यून के साथ गहराती थी। बिजली अक्सर जाती थी और कभी-कभी आती थी। खड़खड़ाते रिक्शों पर गुज़रते हुए किसी अँधेरे कोने से ‘जिमी जिमी...’ बजता हुआ सुनाई दे जाता था। दादा कोंडके की फ़िल्म ने धमाल मचाया हुआ था। शाम और रात के बीच इतना लंबा फ़ासला होता था, जितने में आजकल मल्टीनेशनल कंपनी के किसी कर्मचारी का पूरा सप्ताह निकल जाएगा।
शाम की इस लंबी बैठक में ‘स्पर्श’, ‘अर्थ’ और ‘बाज़ार’ जैसी फ़िल्मों पर भी चर्चा होती थी। इन फ़िल्मों का अपना एक अभिजात्य था। इन्हें पसंद करने वाले सगर्व बताया करते थे कि ऐसी फ़िल्में सबको पसंद नहीं आ सकतीं। सुबह का आया अख़बार शाम तक बाँचा जाता था। ख़बरें आज की तरह बुलबुला नहीं थीं, वे आतीं और ठहर जाती थीं। इस क़दर ठहरती थीं कि उन पर सुबह की चाय के साथ पड़ोसी से चर्चा शुरू होती और घर के लोगों के साथ रात के खाने तक चलती रहती। वह ठहरी हुई ठोस ख़बरों का ज़माना था।
और ठहरिए, ये जो अस्सी का ट्रेंड है... यह भी उसी ठहराव की तलाश तो नहीं?
हम फ़्रैगमेंटेड आइडेंटिटी में जी रहे हैं। घर में कुछ और, ऑफ़िस में कुछ और, सोशल मीडिया पर कुछ और... इस एआई ट्रेंड में हमारी अस्सी के दशक वाली तस्वीर एक सिंपल आइडेंटिटी का भ्रम रचती है। यह ज़्यादा सुखद है, जहाँ सब कुछ बहुत सहज और हमारे कंट्रोल में है। हम दूसरों के साथ नहीं दौड़ रहे, हम अपनी गति से चल रहे हैं। लेकिन है तो यह एक सपनों की दुनिया, शायद मिलेनियल्स या जेन-ज़ी के लिए कोई करामात हो—चमकीले गुलाबी, बैंगनी और नीले नियॉन रंग और सिंथेसाइज़र की धुन।
क्या यही था अस्सी का दशक?
हमारे लिए अस्सी का दशक कुछ अलग तरीक़े से साँस ले रहा था, धड़क रहा था या यों कहिए कि हाँफ रहा था... हम तेज़ साइकिल भगाते हुए पूरा शहर नापते थे। सबकी उम्र यही कोई 14, 15, 16 साल... कैसेट बाजार में छा गए थे। जब पहली बार टेप-रिकॉर्डर घर में आया तो उसी कौतुक के साथ उसका स्वागत हुआ, जैसे कुत्ते के पिल्ले का होता है। देखते-देखते एक शख़्स ने टेप में लिपटी संगीत की स्टोरेज को संतरे जितना सस्ता बना दिया। हर घर में ग़ज़लें बजने लगीं, चाय चढ़ाने से पहले कैसेट लगाया जाता था, ‘सबको मालूम है मैं शराबी नहीं...’, या ‘रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ...’ या फिर ‘चुपके-चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है...’ मगर जब हम बाहर निकलते तो हवाओं जो स्वर-लहरियाँ उठतीं... वो थीं, ‘प्यार का तोहफ़ा तेरा...’
हाईस्कूल की परीक्षा देने जाते समय ‘पाताल भैरवी’ के गाने गूँजते थे। अस्सी के दशक का शुरुआती हिस्सा तो सिनेमा के पोस्टर निहारते निकल गया, क्योंकि सारी फ़िल्में चाहते हुए भी हम देख नहीं सकते थे और जिसके पोस्टर पर एक सर्कल के भीतर ‘A’ लिखा हो, उसके आस-पास फटकना भी गुनाह था। एक और फ़िल्म आई थी, जिसे हम नहीं देख सकते थे। ऊँची इमारतों के बीच अटका चाँद और हाथ में एक धुआँ निकालती पिस्तौल और गोल घेरे में कैद बड़ा सा ‘A’... सारी दुनिया कह रही थी, कमाल की फ़िल्म है—‘आज की आवाज़’—राज बब्बर ने तब तक आम जनता के दिल में जगह बना ली थी। लोगों को उसकी उत्तेजना से कँपकँपाती आवाज़ और शब्दों को चबाकर बोलना ख़ूब पसंद आता था। तब यह फ़िल्म देखने की इच्छा मन में ही रह गई। बाद में जब स्कूल से भागकर ओरिजिनल ‘डेथ विश’ देखी तो क्लाइमेक्स में चार्ल्स ब्रॉन्सन का गोली चलाने वाले हाथों के जेस्चर ने रोंगटे खड़े कर दिए।
ख़ैर, सिनेमा के पोस्टर्स और गानों के अलावा भी इस दशक में बहुत कुछ हुआ था। सन् 84 के अक्टूबर में पड़ने वाले दशहरा में मैं गाँव गया था। अचानक आग की तरह ख़बर फैली... रात को लालटेन की रोशनी में हमारे रिश्ते के बड़े भाई हम लोगों तक पहुँचे। बोले, “अच्छा हुआ... ठाकुरों को और ब्राह्मणों को बर्बाद करने वाली वही थी... जो हुआ अच्छा हुआ...” इतना कहकर नशे में झूमते-लड़खड़ाते हुए वह अँधेरे में खो गए।
बुरी ख़बरें फैलीं। लंबे समय तक स्कूल बंद रहे। फिर एक सौम्य, एलीट युवा चेहरा आया, ग़लत हिंदी बोलता हुआ, लेकिन उसके शब्दों (‘हमें देखना है’ और ‘हम देखेंगे’) में लोगों को ईमानदारी दिखी और उसके प्रति सहानुभूति पैदा हुई।
दुनिया बदल रही थी। छतों पर एंटीना ताने जा रहे थे। अब शाम को किसान भाइयों के कार्यक्रम या युववाणी की धुन नहीं गूँजती थी। एक खिड़की खुल गई थी। एक ब्लैक एंड व्हाइट हिलता हुआ चक्र घूमता था, ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’ लिखा हुआ। इस खिड़की के पीछे पूरी एक दुनिया थी। अँग्रेज़ी का सेंस ऑफ ह्यूमर था। फ़िल्मी गीत थे। तबस्सुम की चपर-चपर थी, भरतनाट्यम में घूमती आँखें थीं। इन सबसे बढ़कर एक होम्योपैथी के डॉक्टर थे, जो यह बताते थे कि हम दिल्ली के एक छोटे से एलआईजी फ़्लैट में रहने वाले जिन लोगों की कहानी देख रहे हैं, उसका अगला मोड़ क्या होगा।
उन लंबी दास्तानों को लिखने वाले मनोहर श्याम जोशी जब गोरखपुर विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में आए तो मैंने एक दोस्त से कहा, “क्या कहते हो, इनको छू लिया जाए?? तय हुआ कि जब वह सबके साथ चाय पी रहे होंगे तो हम उनको छू लेते हैं।
‘छू लेना’ अस्सी के दशक की वह हक़ीक़त थी और आज की वर्चुअल दुनिया का वह रोमांच है, जो एआई का ट्रेंड बनकर उभरा है।
भला सत्तर का ट्रेंड क्यों नहीं, और नब्बे का दशक? हमारे मिलेनियल्स यानी जेन वाई तो रात-दिन उसी दुनिया की क़समें खाते हैं, कैसी ख़ूबसूरत दुनिया थी, क्या शानदार गाने थे, क्या शांत ज़िंदगी थी। मुझे लगता है भारत में बेबी बूमर और जेन वाई सबसे ज़्यादा रोने वाली जनरेशन है। इसलिए जेन ज़ी की जेन एक्स से आसानी से पट जाती है। दोनों के तेवर विद्रोही थे।
बहरहाल, अस्सी का दशक वह आख़िरी दौर था जब भौतिक चीज़ों का रोमांस ज़िंदा था। ऑडियो कैसेट, वीएचएस टेप, कैमरे और आर्चीज़ के कार्ड्स। हम सारे लोग मनोवैज्ञानिक रूप से उसी एनालॉग दुनिया के सीधेपन में वापस नहीं लौटना चाहते हैं? जो हमारी ‘डिजिटल थकान’ को दूर करता है।
मगर कुछ अलग भी था अस्सी का दशक। काली अँधेरी रात के साये से निकला हुआ। देश गहरी राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा था। हमें क्या पता... हम तो सड़कों पर साइकिल दौड़ा रहे थे। हाँ, अब सिंपल टेप-रिकॉर्डर की जगह टू-इन-वन और वॉकमैन ने ले ली थी, जिस साइकिल को पापा-चाचा चलाते थे, वो आउटडेटेड हो चली थी, उसकी जगह बीएसए की स्ट्रीट-कैट (हम उसे ‘सड़क बिलाव’ कहते थे) ने ले ली थी। जैसे-जैसे हम मैच्योर हो रहे थे, शायद हमारे आस-पास की दुनिया भी मैच्योर हो रही थी।
सत्तर का दशक विद्रोही, इंटेलेक्चुअल और अवाँगार्द था। खुरदरे यथार्थ वाला। इसके विपरीत अस्सी का दशक बदलाव का सफ़र तय कर रहा था। हम एक ऐसी दुनिया की तरफ़ बढ़ रहे थे, जिसमें बर्लिन की दीवार गिरनी थी, ‘ग्लासनोस्त’ और ‘पेरेस्त्रोइका’ आ चुका था। सोवियत संघ की रूमानियत में डूबे हमारे बौद्धिक जन अकबकाए हुए थे। सन् छियासी में जब मिखाइल गोर्बाचेव भारत आया तो एक बुढ़िया ने कहा, “ये आदमी दुनिया बदल देगा... उसके माथे पर जो निशान है वो बड़ा शुभ है।” एक अख़बार ने इसे बड़े मन से छापा।
उधर जापान में लाल सूरज उग रहा था, सारी दुनिया में छा जाने के लिए। दक्षिण कोरिया, ताइवान, हांगकांग और सिंगापुर ‘एशियन टाइगर्स’ कहलाने जा रहे थे। अमेरिका और ब्रिटेन में उदारीकरण और ग्लोबलाइजेशन की क़वायद शुरू हो चुकी थी। देर-सवेर भारत में इसकी आमद होनी थी और हमारी दुनिया बदलनी थी। आसमान में हवाई जहाज़ देखकर लड़ाई के बारे में अनुमान लगाने वाले त्रिलोचन के किसान अब सयाने हो रहे थे, चंपा टीवी देखने लगी थी। सत्तर के दशक के उत्तरार्ध वाली चेतना पारीक अब हर कहीं दिखने लगी थी, दिल्ली में चप्पलें घिसने लगी थी। उस चेतना पारीक से ज़्यादा स्मार्ट निकली वर्षा वशिष्ठ जो अगले दशक की तमाम लड़कियों की कहानी बनी।
...और एक दिन हम साइकिल चलाते-चलाते रुक गए। सड़क के मोड़ पर एक बड़ा-सा पोस्टर... एक लड़की लेटी हुई थी, और उसके सीने पर सिर टिकाए एक युवा। दोनों की आँखें बंद। दोनों अनजाने चेहरे थे। टाइटल के नीचे लिखा था—‘लव, क्राइम ऑफ़ द सेंचुरी’। बप्पी लाहिड़ी का सिंथेसाइज़र और ड्रम आउटडेटेड हो रहा था, गुलाबी और नीले रंगों वाली चमकीली नियॉन लाइट्स जल तो रही थीं, मगर मेलोडी की शुरुआत हो गई थी। हमें दो साल बाद कॉलेज जाना था। जितेंद्र और श्रीदेवी के ठुमकों और कादर ख़ान की कॉमेडी का अंत हो चुका था। अब प्रेम-कहानियों की बहार आने वाली थी। रस्सी से हिलते पुल के दूसरी तरफ़ एक युवा गिटार बजाता ‘ऐ मेरे हमसफ़र...’ गा रहा था। फ़िल्मी था, मगर बहुत कुछ हमारे जैसा लग रहा था। साइकिल, गिटार, बाइक, नीली जींस... उम्मीदों को पंख।
इस नई दुनिया में अब हमारी कहानियाँ भी कही जाएँगी, इस उम्मीद के साथ हमने पलटकर अस्सी के दशक को ओके-टाटा-बॉय-बॉय कर दिया...
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बेला पॉपुलर
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