शनिवारेर चिट्ठी : कल से रवैया फ़र्क़ होगा
शायक आलोक
11 अप्रैल 2026
अथ
कोई अलसकथा नहीं! रविवार के उस दुपहर-उष्ण में ऊँघने के स्वाँग में तुम्हारी पीठ पर श्वासों की सुदीर्घ कविताओं का पाठ नहीं कर सका, खमा करो। मुझे एक नए आरंभ की पहली सीढ़ी पर पाँव धरने थे। अभी कितना काम था। अभी इन पौधों को पानी दिया जाना शेष था। मैंने उन्हें प्रेम के आत्मीय नाम सौंपे हैं। वे नाम परिचय के स्मृति-नाम हैं। अनुपस्थितियाँ मुझे याद रहा करती हैं। स्मृति-नामों को मुझे प्रेम करते रहना होगा। अभी वे कपड़े समेटे जाने थे। लाल-आबनूसी-नील—ये मेरी क़मीज़-कथा के नाराज़ किरदार हैं। इन्हें संग आना था। पैरासुट्स जन अहाँ इत आबू, बैगीज़ जन अहाँ उत बैसू। जूते। इन दिनों मेरे सब जूतों में मुझे सबसे प्रिय यह जूता। इसके रंग पर इसका नाम कलूटा पड़ा है। पिता ऐसे ही जूते पहनते थे। शुक्रगुज़ार हूँ कि तुमने मेरे जीने की मेरी ज़रूरी चीज़ें साथ कर दी हैं। सिरदर्द की कुछ गोलियाँ, इड़ा-पिंगला संतुलन हेतु कर्पूर-सुगंधि, थकते कंधों के लिए ठंडा तेल कि पैरों से अधिक थकते हैं कंधे मेरे। मेरे शब्द मीठे बने रहें तो अधरों के लिए नमी और जिह्वा के लिए शहद।
शेष चीज़ें अभी रखी गई हैं शेष। वस्तुओं की अनधिकता से सज्जित। यह नई कविता अभी भीड़ नहीं चाहती। नई जगह से पहले मेरा परिचय पुराना हो, फिर पुरानी वस्तुओं का परस्पर परिचय बने नई वस्तुओं से। सिलसिलेवार। बा-तरतीब।
बाशन धो देता! सुबह की रवानगी और सप्ताहांत की लौट के बीच के तुम्हारे रिक्त की कुछ पूर्ति के लिए मेरे हाथ-सुआद की कोई सब्ज़ी पका देता!
वह क्षण कैसा घड़ी का ढीला पड़ा हुआ पुर्ज़ा था कि समय तो चल रहा था, उसकी लय में एक हल्की असंगति घुल गई थी। मैं इस असंगति के भीतर ऐसा ठहर गया था, जैसे चिर्री में कोई रोशनी अटक गई हो। यह ठहराव निष्क्रिय तो नहीं था, भीतर एक सूक्ष्म कँपकँपाहट थी। किसी अदीठ मशीन के भीतर चुपचाप गति इकट्ठी हो रही थी। सन्निकट दिनारंभ की कोई घटना नहीं होनी थी, प्रवेश होना था। वह मेरे दिनों पर आकर गिरेगा नहीं, रिसेगा, जैसे नमी दीवारों में उतरती है और धीरे-धीरे रंगत बदल देती है। मैं उस परिवर्तन की परछाईं को महसूस कर रहा था, पर अभी उसकी पहचान न थी। कुछ ऐसा कि कोई शब्द मेरी स्मृति में मौजूद तो हो, उसकी ध्वनि और अर्थ दोनों ही मुझसे छूट गए हों। मैं अपने आपको न तैयार पाता हूँ, न अप्रस्तुत। मैं किसी दहलीज़ पर खड़ा नहीं हूँ, दहलीज़ स्वयं मेरे भीतर बन रही है। मैं उसमें प्रवेश नहीं करूँगा, वह मुझमें खुल जाएगी और जब ऐसा होगा तब शायद मैं यह भूल जाऊँगा कि कभी कोई ‘पूर्व’ भी था, कोई पूर्व-क्षण जिसमें मैं इस परिवर्तन को आते हुए देख रहा था।
उस दिन मैंने कोई निर्णय नहीं लिया, कोई प्रतिज्ञा नहीं की। मैं केवल उस सूक्ष्म रूपांतरण का हिस्सा बना रहा, जो बिना उपद्रव घटित हो रहा था। घटित—जैसे किसी विचार का धीरे-धीरे वास्तविकता में बदल जाना या किसी वास्तविकता का बिना बताए एक विचार में सिमट जाना।
मध्य
मैंने यात्राएँ कम की हैं। बसों की यात्रा और भी कम। इतनी कम कि पीठें याद रह गई हैं। बस में खुली पीठ स्त्रियों की दिखती है। उनके कपड़े की सिलवटों में उनकी झुकी हुई पीठें। कंधों के बीच अटकी हुई थकान। गर्दनों के नीचे धीरे-धीरे ख़र्च होता दिन। बस में चेहरों को मैंने कभी ठीक से देखा ही नहीं। मेरे हिस्से में पीठें आईं। कुछ बच गया तो कान आए।
अभी-अभी उतरी एक पीठ एक गली में मुड़ गई हैं। एक पीठ पर बारह आँखें सवारी कर रही हैं।
मेरे पास एक पीठ की याद उसके चेहरे से है। बीस साल पहले की उस बस में मैं हूँ और वह है। मेरी आँखों में आँसू हैं और उसकी आँखों में आँसू हैं। मैंने देखा है और उसने देखा है। मैंने फिर देखा है और उसने फिर देखा है। मैं देखता रहा हूँ और वह देखती रही है। मैं मुस्कुराया हूँ और वह मुस्कुराई है। आँखें पोंछ ली गई हैं और आँखें पोंछ दी गई हैं। वह अब जा रही है और अब मैं देख रहा हूँ। अब मैं देख रहा हूँ और उसकी पीठ जा रही है।
मैं एक शहर की बस में दूसरे शहर को याद करता हूँ। फिर मेरे पास यात्रा के दो शहर होते हैं। वे समानांतर गुज़रते हैं। मैंने एक प्रेमिका की बात पर दूसरी प्रेमिका को याद किया। छल किया। एक कवि की कविता पर दूसरे कवि को। प्रेम किया। सोमवार की बस शनिवार की बस से अलग दिखती है।
मार्ग
यह कैसी बात है कि हमारी दुनिया उन जगहों से बनती है, जहाँ हम गए और जहाँ हम कभी नहीं जाएँगे! वे जगहें जिन्हें हम नहीं जानते। यह इस जगह का दूसरा दिन था। मेरे लिए इस जगह का जन्म तब हुआ, जब मैं यहाँ आया। इससे पूर्व यह जगह बस एक संभावना थी।
पाँच तल्ले ऊपर बसे इस कमरे का नाम मैंने ‘क्रो’ज़ नेस्ट’ रखा है। मस्तूल के ऊपर की वह जगह जहाँ से नज़र रखी जाती है। फ़िल-वक़्त इस कमरे की नज़र बाहर के दृश्यों पर नहीं, मेरे भीतरी एकांत पर है। मैं कहता हूँ इससे कि यह साधारण दृश्यों पर अभी से आँखें रखना सीखे कि वे देर तक ठहरते हैं। ग्राम का नाम पूर्वजों ने ‘चिल्ला’ रखा है। गाँवों के नाम गँवई ही अच्छे लगते हैं। इस स्थान की साधारणता में एक विचित्र वैभव है—यहाँ कुछ भी ऐसा नहीं जो स्मरणीय हो। गली पानी माफ़िक़ तुरंत सड़क पर उतर आती है। इस गली को संकोचवती नहीं कहा जा सकता। मोड़ पर निगहबानी बाबासाहेब की है और सड़क का नाम सद्भावना है। यह एक जवान सड़क है। इसने कच्ची उम्र में ही कई धोखे खाए हैं। इसका दुःख इसके चेहरे पर दीखता है।
कविता
आशा वह पंखधारिणी सत्ता है, जो आत्मा के अंतराल में आ विराजती है और नीरव वाणी में अपनी अनाहत लय का गान करती हुई कभी विराम नहीं लेती। उस शुभ रात्रि में सहज समर्पण मत करो, दिवसावसान पर जर्जरता को ज्वाला की भाँति दहकना और विकल होना चाहिए। मैं एकाकी मेघ-सा विचरता रहा, जो पर्वत-शृंखलाओं और उपत्यकाओं के ऊपर उच्च प्रदेशों में निरुद्देश्य तैरता है। मैं मृत्यु के स्वागत में ठहर न सका, अतः वह स्वयं सौम्यता से मेरे लिए ठहर गई और उस रथ में केवल हम दोनों ही विराजमान थे। मुझे अपने वचनों का निर्वाह करना है, अतः निद्रा से पूर्व अनेक यात्राएँ शेष हैं। क्या मैं तुम्हारी उपमा ग्रीष्म-दिवस से करूँ, तुम उससे अधिक सौम्य, अधिक संतुलित और अधिक रमणीय हो। मैं स्वयं का अभिनंदन करता हूँ और अपने ही स्वर का गान करता हूँ और जो सत्य मैं ग्रहण करता हूँ, वही तुम्हारे भीतर भी प्रतिध्वनित होता है। सौंदर्य का प्रत्येक अंश चिरस्थायी आनंद का स्रोत है और उसकी माधुरी अनवरत विस्तार पाती रहती है। चैत्र सर्वाधिक निर्दय है, वह मृतप्राय भूमि से कोंपलों को उत्पन्न करता हुआ स्मृति और अभिलाषा को एक-दूसरे में विलीन करता है। वन-प्रांतर में द्विविध मार्गों के विचलन पर मैंने उस पथ का वरण किया, जिस पर पदचिह्न न्यून थे और उसी ने समस्त भेद निर्मित किया। स्थगित स्वप्न का क्या परिणाम होता है, क्या वह सूर्य-ताप में शुष्क फल की भाँति सिकुड़ जाता है। मैं अपने भाग्य का अधिपति हूँ और अपनी आत्मा का नायक—अविनत, अजित और अडिग। शुद्ध चित्तों के संयोग में किसी प्रकार की बाधा को स्वीकार न करूँ, प्रेम वह नहीं जो परिवर्तन के स्पर्श से स्वयं परिवर्तित हो जाए। निद्रा से पूर्व अभी दूरगामी यात्राएँ शेष हैं—असंख्य पग और असंख्य दूरी। मैंने अपने जीवन को लघु मानों में मापा है, क्षणों, प्रहरों और संध्याओं के सूक्ष्म विभाजनों में। सौंदर्य ही सत्य है और सत्य ही सौंदर्य, पृथ्वी पर जानने योग्य यही एक तत्त्व पर्याप्त है। तुम अपनी कटुता से मुझे आहत कर सकते हो, किंतु मैं वायु के सदृश पुनः उदित होऊँगा। क्या मैं इस विश्व-व्यवस्था को विचलित करने का साहस करूँ, एक ही क्षण में निर्णय और संशोधन के लिए पर्याप्त काल निहित है। प्रत्येक पथिक जो विचरता है, वह अनिवार्यतः विमुख नहीं होता और जो प्राचीन है वह दृढ़ रहता है और क्षीण नहीं होता। बालक ही मनुष्य का जनक है और मैं कामना करता हूँ कि मेरे दिवस परस्पर स्वाभाविक श्रद्धा के सूत्र में आबद्ध रहें।
वह पीली-सफ़ेद जगह है, जहाँ मैं बैठने लगा हूँ और कविताएँ पढ़ता हूँ। मैंने इतने दिनों से ख़ुद को कविताएँ पढ़ते देखा है कि अब मुझे ‘अ पोएम रीडर’ पुकारने लगा हूँ। कविताएँ पढ़ता हुआ नहीं, कविताओं में एक बहाना ढूँढ़ता हुआ। एक ‘एग्ज़िस्टेंशियल एक्सक्यूज़’। एक त्रासदी जो शब्दों के बीच फँसी रह जाती है। पंक्तियों को भूलता हुआ और बीच की ख़ाली जगहों को सुनता हुआ। दुनिया भर के वे पूर्वज अपना अधूरापन लिए आते-जाते हैं, कुछ सौंपते जाते हैं। मैं पढ़ते-पढ़ते धीरे-धीरे अनुपस्थित होने लगता हूँ। शब्द बने रहते हैं, कवि धुँधलाते जाते हैं। जब मैं रुकता हूँ तो ऐसा नहीं लगता कि कुछ समाप्त हुआ। ऐसा कि जो कहा गया, वह अब किसी और ठौर चला गया, जहाँ अब मैं नहीं हूँ।
कवि
उस कवि को देखना-जानना अच्छा लगता है। उसकी खिल-खिल हँसी, सच-झूठ पर उसकी अनूठी उत्तेजनाएँ। हस्तक्षेप। संशय। उसकी उमंग और उसकी थकान। तीक्ष्णता। दाना-वार हाज़िरजवाबी। कार्यसिद्धि की अकथ आतुरता। उसकी करुणा और उदारता। विफलताओं को निजी पराजय नहीं, अनुभव मान लेने की विनम्रता। छोटी बातों में ठहर जाने की उसकी अनपेक्षित रुचि। स्मृतियों को रेखाओं में नहीं, परतों में जीने की प्रवृत्ति। धैर्य-अधैर्य। असंगतियों में भी एक प्रकार की संगति खोज लेने की आदत। मूलतः कवि ही होने की उसकी यक़ीन-बयानी। ऊब में या निराशा में नहीं, अनुभव में वैयक्तिक कृतज्ञता खो देने की संस्वीकृति। यारबाशी और दोषसिद्ध निर्दोषता। समय, स्मृति और अस्मिता के उसके अँधेरे और रोशनी में शफ़्फ़ाफ़ चमकने-चमकाने की उसकी ज़िद।
मेरी पीठ की सीमा-समाप्ति से एक फ़र्लांग की दूरी पर ‘नो-मेंस लैंड’ के बग़ल क़स्बे में उसकी उपस्थिति। यह मेरे लिए आश्वस्तिकारी है... और आह्लादकारी।
बाज़ार
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और फिर लौट-चक्कर मारते हुए—
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एक-दूसरे को रास्ता देती गायें, कलाबाज़ियों से बीच से गुज़रते साइकिल, टेम्पू, स्कूटर...
यहाँ सब मिलता है। मैं आऊँ तो तुम्हारे लिए किलिप या रब्बर या बालियाँ लाऊँ?
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