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शनिवारेर चिट्ठी : सबसे पहले तुम, शशि!

सबसे पहले तुम, शशि!

इसलिए नहीं कि तुम जीवन में सबसे पहले आईं या कि तुम सबसे ताज़ा स्मृति हो। इसलिए कि मेरा होना अनिवार्य रूप से तुम्हारे होने को लेकर है...

[शेखर : एक जीवनी, शेखर : उत्थान—प्रवेश]

और तुम्हारे प्रति इस सुखकर वाक्य-व्यवहार के साथ, इसलिए कि तुम में कुछ स्त्रीसुलभ ईर्ष्या भी तो होगी, तुम्हारी सदाशयता से अनुप्रेरित, लौटता हूँ उस स्मृति-गेह में जिधर रहा इन दिनों। इन दिनों, जब लौट रहा हूँ फिर उस पांडुलिपि की ओर जिसे दबा सिरहाने मैं सोता रहा इधर बरस कई।

एक

मुझे इस बात से पुरानी कोई बात याद नहीं। 

कुछ दृश्य भर हैं। सड़क से नीचे उतरते ही स्कूल का बड़ा-सा अहाता है। अहाते से सीध में गुज़रते वह इमारत शुरू होती है। सामने बरामदा है। कुछ सीढ़ियाँ उस बरामदे पर ले जाती हैं और आगे के कुछ क़दम मुझे एक दरवाज़ा पार कर भीतरी बरामदे में ले आते हैं। 

याद नहीं कि मुझे घर से उस एक जगह तक कौन लेकर आया। 

बाईं ओर एक कमरा है। मैं उस कमरे में आया हूँ, बेंचे लगी हैं और कुछ हम-उम्र पहले से वहाँ बैठे हैं। 

कमरे में क़स्बाई अँधेरा है। 

मुझसे बहुत ऊँचे एक व्यक्ति ने मुझे पहली बेंच पर इशारे से बिठा दिया है। उस बेंच पर वह है। वह पूर्व-उपस्थित निकाय। मुझे उसका चेहरा नहीं याद, याद नहीं नाम। मुझे उसकी कोई अन्य बात नहीं याद। मुझे नहीं याद, एक उपस्थिति भर है कि मैं भारी असहज हुआ हूँ और रोने लगा हूँ। वह मुझसे बहुत ऊँचा व्यक्ति मुझसे रोने का कारण पूछ रहा है। मैं कुछ कहता नहीं हूँ, रोता रहता हूँ। 

अब मेरे भाई को बुलाया गया है। वह मेरे बचपन का सबसे सुंदर बच्चा है। उसने स्कूल यूनिफ़ॉर्म पहन रखी है। दोनों कंधों पर पैंट की स्ट्रिप चढ़ी हुई। मैं तुरंत कुछ बड़ा होकर उसके जैसा सुंदर बनना चाहता हूँ। 

उसने मेरी हथेली में अपनी हथेली से आश्वस्ति सौंपी है और मुझसे रोने का कारण पूछा है। मैंने उसे बताया है कि मुझे एक लड़की के साथ बिठा दिया गया है, मैं रो रहा हूँ इस कारण। ऊँचे व्यक्ति को यह बात बता दी गई है, वह हँसा है और अब मैं सबसे पिछली बेंच पर अकेला बिठा दिया गया हूँ।  

मुझे उस दिन की और कोई बात याद नहीं। 

याद छिटपुट लौटती है किसी दूसरे स्कूल की जहाँ मेरी दो सहपाठी छात्राओं के नाम रेणुका और अरुणा हैं। दो शिक्षिकाओं के नाम हैं—आशा और मोना। विकी, जॉनी, राकेश और नौशाद—चार सहपाठी छात्रों के नाम। उनके चेहरे ठीक से नहीं याद। 

जॉनी की पलकें झपकी रहती हैं कि वह नशे में हो। मोना ने मेरी उँगलियों के बीच पेंसिल रख मुझे सज़ा दी है और मुझे पीड़ा हुई है। आशा के चेहरे पर एक दबी हुई पीड़ा रहती है और उनकी कड़क सूती साड़ी मुझे मेरी माँ की प्रभात-कथा कहती है। सुबहें—माँ जब स्कूल जाने के लिए तैयार होती थीं। 

आशा अभी होंगी तो कम-अज़-कम पैंसठ की होंगी।

दुई

तीसरी कक्षा में परी से मिला। नाम है शबाना। मुझे याद नहीं आता कि बचपन की सुनी कहानियों में कहीं कोई परी भी थी। कहानियाँ सुनी भी अधिक नहीं थी। एक कोई सुंदर जूते बनाने वाला बौना था। एक डेढ़-बितने की कहानी थी जिसे शुद्ध आंचलिक ज़ुबान में सुना था। परी कहीं नहीं थी। परियाँ टीवी पर भी नहीं थीं। तब टीवी नया था और टीवी की भी मेरी शेष स्मृतियाँ इक उम्र बाद की हैं। हो सकता है यह बाद का प्रक्षेपण हो कि मैंने मान लिया कि मैंने उसे देखा था तो वह मुझे परी-सी लगी थी। 

पाँच अक्षर का मेरा नाम, उल्टा सीधा एक समान—बोलो क्या? वह किसी से पूछ रही है और जवाब मैंने दे दिया है—मलयालम। उसने पहली बार मुझे देखा है और मेरी उपस्थिति को दर्ज किया है। मेरी अस्मिता वहाँ से है। मेरा अस्तित्व वहाँ से संघर्ष करता है। मैं अब रोज़ स्कूल जाने के लिए उत्सुक रहने लगा हूँ। मैं उसे नज़रें बचा देखता रहता हूँ, उसमें कोई सुकून है। वह आज स्कूल नहीं आई है तो मैं उदास हूँ, वह कल स्कूल आ गई है तो मैं खिल उठा हूँ। मैं उसके आस-पास बने रहना चाहता हूँ। उसकी ऊर्जा मुझे खींचती रहती है। कोई जंगली पेड़ है स्कूल के अहाते में जिसमें गुच्छों में हरे बीज खिलते हैं। उसके आस-पास बने रहते हुए मैं और बच्चों के साथ उन बीजों से खेल रहा हूँ। हम एक-दूसरे को उन गोलाकार हरे बीजों से मार रहे हैं। एक बीज उछलकर परी को जा लगा है। एक कुछ मोटे व्यक्ति से मेरी शिकायत की गई है। उसने मेरे कान ऐंठे हैं और मुझे लोफ़र कहा है। 

कुछ टूटा है शीशे की तरह। 

मुझे अब भी परी की उपस्थिति चाहिए मेरे आस-पास कि अब भी वह नहीं आती स्कूल किसी रोज़ तो दिन उदास गुज़रता है, लेकिन अब उसके आस-पास मैं अपनी सक्रिय अनुपस्थिति रखने लगा हूँ। वह है और है, मैं हूँ और नहीं हूँ। उसकी उपस्थिति के साथ मेरी अनुपस्थिति ने दो साल गुज़ार लिए हैं। मैं देख रहा हूँ मुझे कि रोज़ स्कूल की छुट्टी पर मैं एक जगह खड़ा होता हूँ और उसकी जाती हुई पीठ को देखता हूँ। उस रोशनी के ओझल होने पर विपरीत दिशा में आगे बढ़ता हूँ जहाँ आम बाग़ान और बाँस जंगल से गुज़रते एकपरिया रस्ते के दाहिने किनारे मेरा घर आएगा।  

मन उदास है कि अब परी को नहीं देख सकूँगा। मेरा प्रवेश होना है, अब एक दूसरे स्कूल में। हमारी अलग राहें अब और विलग होंगी। सुख का कैसा क्षण कि नए स्कूल में वह दिख रही है ठीक मेरे सामने! उसके चेहरे पर स्मित की रेखा है और उसने शब्दों में सुख जताया है कि मैं भी अब यहीं हूँ। वे दो वर्ष मेरे स्कूली दिनों के दो सबसे सुंदर वर्ष थे। परी मेरे साथ थी। हम बातें करते थे और ठिठोली। बीच समय में रूठना और मनाना। हमारे पास सम्हाल के रखने को एक-दूसरे की चीज़ें थीं। रोज़ स्कूल से यह सोचता हुआ लौटता कि आज किन-किन सुखों में पला। रोज़ यह सोचता हुआ स्कूल जाता कि आज क्या-क्या पल बनेंगे। मेरे पास उन दिनों का सबसे सुंदर गद्य-जीवन है।

साथ के अंतिम दिनों वह दुर्दांत घटना हुई। रक्षा-बंधन आने वाला था। सब बच्चे इसी बारे में बातें कर रहे थे। किसी गहन उदासी में मैं कह पड़ा कि मुझे क्या, मेरी तो कोई बहन ही नहीं है। जीवन में एक बहन की अनुपस्थिति का बोध मेरे अंदर बचपन से ही रहा था। कुछ दिनों बाद परी ने मुझे कोई नोट-बुक दी थी। उसके अंदर एक राखी पड़ी थी। एक पत्र भी था—तुम उदास रहे थे उस पूरे दिन, तुम्हारे लिए। मानो सब बदल गया। प्रेम उदात्त था उन दिनों। मेरे लिए प्रेम का अर्थ उसका साथ ही तो था। वह अब उसे एक ठोस नाम दे रही थी। मैंने वह राखी बाँध ली। हमारा रिश्ता अब एक दायरे में था। मैंने देखा फिर हमारे बीच की बढ़ती हुई दूरी को। अब हम उतने सहज नहीं रहे थे। अब हम पहले की तरह खुले नहीं थे। 

फिर स्कूल के ख़त्म होने के दिन आ गए। हम हाई-स्कूल जाने वाले थे। हम अलग-अलग स्कूलों में गए। मैं बॉयज़ स्कूल में और वह एक गर्ल्स स्कूल में। मैं उसे देखना चाहता था, देख नहीं पाता था। दिन गुज़रते रहे—साल गुज़र गया। आवेश और आवेग अपनी सीमा से बाहर गया तो मैं एक दिन उसे देखने उसके घर चला गया। मैंने देखा उसे। मैंने उसकी भयभीत आँखें देखीं। मेरे घर पर शिकायत की गई। 

फिर कुछ टूटा शीशे की तरह। 

क्या करूँ-क्या न करूँ की वेदना में जलता रहा। मेरे अंदर जैसे किसी विद्रोह ने जन्म लिया। मैंने मेरी विकलता की पहचान उस प्रेम की तड़प के रूप में की जिसके केंद्र में एक प्रेयसी थी। मैंने अपनी कलाई पर जलते मोम की बूँदें गिराई और राखी से बने उस रिश्ते और उसके बाद बनी दूरी के सब प्रसंगों को अस्वीकार कर दिया और मेरे अंतर्मन के समक्ष खुली घोषणा कर दी कि परी मेरा प्रेम है। लेकिन साथ ही अपराध-बोध की एक भावना भी मेरे अंदर भर गई—गहन अनुताप। आगे के वर्ष प्रेम और ग्लानि के द्वंद्व में गुज़रे। फिर ‘देवदास’ फ़िल्म देखी और बचपन की पारो को देवदास को दादा पुकारते सुन स्वयं को कुछ क्षमा कर दिया। मैं उन दिनों मेरे हॉस्टल के कमरे का वह अभागा देवदास बनकर रहा जिसने पारो को भूल जाने का निर्णय लिया।


तिन


टू ट ना... 

अलगाव का सबसे गहरा असर वहाँ होता है, जहाँ शब्द और घटनाएँ पहुँच नहीं पाते। आत्मा के उस निस्तब्ध आँगन में, जहाँ हम अपने सबसे सच्चे संबंधों को रखते हैं। उसका जाना, दरअस्ल, उसकी उपस्थिति की आहट का मिट जाना नहीं था। वह मेरे भीतरी सुख स्वर का मौन हो जाना था। हमारे बीच जो था, वह किसी अनुबंध या नाम से बँधा हुआ नहीं था। वह एक सहज लय थी, जो बिना प्रयास के चल रही थी—मानो साँस। राखी उस लय में अचानक एक स्वराघात बनकर आई, जिसने ताल बदल दी। कोई अदृश्य पर्दा उतर आया। यह पर्दा इतना सूक्ष्म था कि उसमें से हम एक-दूसरे को देख तो सकते थे, देख नहीं पाते थे। आत्मिक स्तर पर, यह अलगाव किसी क्षति की तरह कम और किसी छीन लिए गए अवसर की तरह अधिक महसूस हुआ। कोई अधूरी प्रार्थना जो अधरों पर ही ठिठक गई थी। हम उस एक क्षण के पार निकल पाते तो क्या पता कुछ और जी पाते। लेकिन आत्मा को पूर्णता का ज्ञान नहीं होता। वह तो घटित का विस्तार जीती है। उसकी स्मृति अब मेरे भीतर एक शांत दीपक की तरह है। उसकी लौ कभी तेज़ नहीं होती, कभी बुझती भी नहीं। वह संबंधों के समय से परे होने का मेरा बोध है, वही मेरी अनुभूति है कि समय के साथ बदल सकती हैं चीज़ें। 

आत्मा की भाषा में, अलगाव अंत नहीं है। वह एक रूपांतरण है—जैसे नदी अपने कुल छोड़ देती है और समुद्र में घुल जाती है। वह संबंध मेरे जीवन के उस हिस्से में बह गया है, जहाँ व्यक्तिगत नाम और पहचान घुलकर शुद्ध अनुभव बन जाते हैं। और वहीं, संभवतः वहीं, हमारे बीच की सबसे सच्ची निकटता अब भी है—किसी संवाद, किसी अनुबंध या किसी वचन से परे।

चारी

दूरी और स्मृति-विकलता के उन दिनों मैं अन्य जीवन दृश्यों से अछूता तो नहीं रहा था। कहूँ कि उसका घर एक पोखर के किनारे था तो स्मृति पर वे सुंदर रंग नहीं चढ़ सकेंगे जो मैं प्रेम प्रयोगों की अपनी कथा में रखना चाहता हूँ। इसलिए मैंने उसे याद झील किनारे रहने वाली मत्स्यगंधा के रूप में रखा है। यों तो मुझे याद नहीं कि उसकी देहगंध कैसी थी। उसके बिल्कुल पास बहती हवा में मैंने अपनी नाक रखी तो थी, लेकिन गंध का ख़याल बाक़ी नहीं रहा है। 

उसके गालों पर पिंपल्स के निशान थे और मुस्कुराती थी तो डिंपल पड़ते थे। हमारा सिलसिला शहर के किसी ट्यूशन-सेंटर में शुरू हुआ। पहली मुलाक़ात से ही हम एक-दूसरे को देखने लगे थे। यह एक विशुद्ध प्रेम-कथा का आरंभ था, ऐसा मैं दावा करता हूँ। यह मेरा पहला प्रेम था जो वैसा उतर रहा था, जैसा सनीमा के रंगीन पर्दों पर उतरता है। हम हीरो-हीरोइन थे, हम एक-दूसरे की आँखों से खेलते थे, हम हमारे कंधों की हवा को टकराते क्लासरूम में गुज़रते थे, हमारे अंदर शानू के नाइंटीज़ के तराने बजते थे। हमने कभी एक-दूसरे से शब्दों में नहीं कहा कि हमें प्यार है, कोई पत्र नहीं लिखा, बेंच पर कुरेदकर नाम का पहला अक्षर नहीं लिखा, लेकिन प्यार था—यह तय है। वह पहली लड़की थी जिसके लिए मेरी देह सिहरती थी। वह ही पहली थी जिसे देर तक चूमते रहना चाहता था। 

वहाँ वह लड़की भी थी जिसकी आँखों की असहजता कहती थी कि हमारे बीच कुछ हो सकता है जिसे वह दिखाना नहीं चाहती और बिना प्रकट मैं स्वीकार नहीं करना चाहता। मत्स्यगंधा मेरी आँखों में छलाँग लगाने को उन्मत थी तो असहजा उस कुएँ से धीरे-धीरे डोर-बाल्टी से पानी खींचना चाहती थी। इत्तिफ़ाक़ इतना भर रहा कि वह काँपते स्वर में रोज़ मुझसे कुछ नोट्स माँगती और मैं रोज़ अपढ़ भाषा में उसे संकेत देता कि क़दम आगे बढ़ाओ तो मेरा संग पाओ। 

किशोर रोमांस के वे दिन भी जल्द ही ख़त्म हो गए। उनकी उम्र आज उतनी ही होगी जितनी मेरी। लेकिन स्मृति में लोगों के उम्र नहीं बढ़ते। मत्स्यगंधा आज भी तेरह वर्षीया वह किशोरी है जो तेरह वर्षीय उस किशोर को सिहरा जाती है। गुज़िश्ता वर्षों में कई बार ऐसा हुआ कि मुझे उसकी याद आई और तमन्ना हुई कि एक रोज़ उससे कहीं एक मुलाक़ात हो तो मैं प्रेम की वे सब बातें कह दूँ जो तब उससे नहीं कह सका। उसे भींचकर गले से लगा लूँ, उसके चेहरे के एक-एक दाग़ पर ओंठ रखते हुए मेरी परिचित भाषा के एक-एक कोमल शब्द बुदबुदा दूँ।

पाञ्च

अभी अभी आई है फ़िरोज़ा
बिस्तर पर पटक कर बस्ता
नहाने गई है
मैं फ़िरोज़ा को नहाते हुए देखता हूँ रोज़
जानती है फ़िरोज़ा

फ़िरोज़ा—मेरी साथी। हमारे मुहल्लों के बीच एक संकोचवती पतली सड़क गुज़रती थी। पश्चिम की ओर मुसलमानों का मुहल्ला, शेष तीन दिशाओं में हिंदुओं का। 


फ़िरोज़ा मदरसे में पढ़ती थी। मदरसा क्या था, एक मामूली मस्जिद का आँगन था... जहाँ कक्षा लगती थी। वह उर्दू तो नहीं बोलती थी, लेकिन कुछ ऐसा बोलती थी जो मेरी हिंदी और अंगिका दोनों से अलग थी। उसके स्वर में कोमल अनुनासिक था, एक कच्चेपन से भरा हुआ। तब हम दसेक के रहे होंगे, जब यह अजीब-सी दोस्ती शुरू हुई। 

मैं एकाकी रहा था। स्कूल के बाद के संध्या-समय में इधर-उधर की एकांत जगहों की टोह लेता फिरता था। उन्हीं दिनों मैंने पहली बार हमारे घर के दक्षिण के बाँस जंगल में सियार के बच्चे देखे। फ़िरोज़ा ने ही बताया कि ये कुत्ते के पिल्ले नहीं, सियार के बच्चे हैं।

बाँस जंगल के सामने सड़क की दूसरी ओर सानो की वह काठ की दुकान थी। वहाँ फोफियाँ, पाचक, अनारदाने, कच्चे अमरूद, इमली, पापड़, सनपापरी जैसी चीज़ें मिला करती थीं। सानो का रूप मुझे मोहित करता था। सुआपंखी कोरी साड़ी, पैर-फटी-बिवाइयाँ, आँखों में गहरा सूरमा, मोटे काले होंठ, सिर पर जालीदार साफ़ा। हिंदू मुहल्लों के बच्चे आगाह किए जाते कि सानो डायन है, छोटे बच्चों को फुसलाकर क़ैद कर लेती है। हो सकता है कि मुसलमान माँएँ भी अपने बच्चों को ऐसी कहानियों से ही डराती हों, ताकि बच्चे पाचक जैसी चीज़ों को खाने से बचें। सानो फ़िरोज़ा की माँ थी। फ़िरोज़ा ने ही मुझे वह क़ब्रिस्तान दिखाया जिसकी टूटी दीवार पर नीचे पैर लटकाए मैं दूर आकाश में तसल्ली से उड़ती रंग-बिरंगी पतंगों को देख सकता था। 

मैं तब इश्क़-विश्क़ समझने की उम्र-ओ-सूरत में नहीं था, पर फ़िरोज़ा का साथ अच्छा लगता था। वह हर बात में मुझसे बेहतर थी। उसे क़ब्रिस्तान के सभी क़ब्रों के नाम-ओ-पते मालूम थे। उसे बाँस जंगल में सियारों के सबसे बड़े ठिकाने और वहाँ से बाहर निकलने के तीन रास्तों का पता था। वह मुझसे अधिक आवारा और मुझसे अधिक साहसी थी। वह मेरी उस्ताद भी थी। उसने मुझे जिन्नात से बचने के तरीक़े सिखाए थे और उँगलियों पर गिनती से बताया था कि हिंदू और मुसलमान कितने और कैसे अलग होते हैं। वह प्रेम में मेरे पहले स्पर्श की भी साथिन थी और हमने जीभ-जीभ इमली चखा था।  

एकाध साल बाद ही फ़िरोज़ा से मेरा मिलना-जुलना काफ़ी कम हो गया। मैं दूसरे खेलों में व्यस्त रहने लगा और पुराने आवारा ठिकानों पर मेरा भटकना बंद हो गया। कभी-कभार वह अपनी दुकान पर दिख जाती तो पलकों को झुकाती-उठाती अदा से सलाम पेश कर देती। बाद में तो उसका दिखना बंद ही हो गया और मैंने भी जैसे उसे अपनी स्मृतियों से उखाड़ फेंका। बाद में कभी किशोर-वय उत्तेजना में उसका ख़याल उभरा और मैंने दरयाफ़्त की तो सुना कि उसका दूर दिल्ली में मामूज़ाद संग निकाह हो गया।

फ़िरोज़ा से इश्क़ मुझे उसके बाईस साल बाद हुआ जब मुझमें कुछ शऊर आया और बचपन में लौटकर मैंने उसके संग एक-एक पल को फिर से जिया। उन दिनों के जूनून में कई वर्ष फ़िरोज़ा पहनता रहा।

छोय

स्कूली दिनों से मैं तुकबंदियाँ करने लगा था। वे प्रेम, बचपन और दुःख के भावुक उद्गार थे। सृजन का सुख उन कथित कविताओं से पूर पाया। पाठ्य-पुस्तकों में कहानियाँ और कविताएँ तो पढ़ीं, लेकिन उन्हें बस पाठ की तरह पढ़ा। साहित्य के प्रति किसी चेतना का विकास नहीं हुआ था। सहपाठी बच्चे कॉमिक्स पढ़ते थे। नागराज और सुपर कमांडो ध्रुव उनके बड़े नायक थे। वे किताबें किराये पर मिला करती थीं। दोस्त आपस में उन्हें साझा भी किया करते। कोई डाइजेस्ट आया उन्हीं दिनों जिसकी बड़ी धूम थी। मैं कुछ संकोची था, कुछ भीरू और कुछ स्वाभिमानी। माँगना अच्छा नहीं लगा तो मैंने ख़रीदने का निर्णय लिया। उसका मूल्य सात रुपये था। उसी दुकान पर मुझे वह अद्भुत पत्रिका दिखी। उसका नाम ‘आजकल’ था। उसमें कहानियाँ थीं, कविताएँ और रेखाकृतियाँ... उसका मूल्य मात्र पाँच रुपये था। दो रुपयों की बचत हो सकती थी। मैंने वह पत्रिका ख़रीद दी। एक रुपये की पेंसिल ख़रीदी और शेष एक रुपये के कुछ थिन पेपर्स। घर की छत पर जाती सीढ़ियों के अंतिम हिस्से में बैठ वे कविताएँ और कहानियाँ पढ़ता और थिन पेपर्स पर उन रेखाकृतियों की पेंसिल से छाप ले उनमें रंग भरता। बाद के बहुत वर्षों तक उन दिनों की वे रेखाकृतियाँ मेरे साथ रहीं। संभव है कि कुछ पुराने प्रेम-पत्रों के साथ उन दिनों की कविताएँ और वे रेखाकृतियाँ आज भी माँ के किसी संदूक़ में पड़ी हों। बाद के दिनों में फिर मैंने अपने जीवन का पहला उपन्यास पढ़ा—‘जाग मछंदर गोरख आया’। दंग रह गया कि शब्दों से वैसे वाक्य बनाए जा सकते हैं और वाक्यों से वैसा दृश्य, संवाद और कथानक बुना जा सकता है। मैं मुक्त छंद में कविताएँ लिखने लगा था, लेकिन अभी कोई साहित्यिक स्फुरण मेरे अंदर उत्पन्न नहीं हुआ था। मेरे लिए कविता लिखना कोई बेहद निजी मामला था। नवीं कक्षा में था जब पहली कवयित्री से मिला और उसके प्रेम में पड़ा। स्कूल के किसी साथी के घर में उससे मुलाक़ात हुई। साथी ने परिचय ही इस रूप में कराया कि मैं भी कविताएँ लिखता हूँ। वह उम्र में मुझसे बड़ी थी और कॉलेज में पढ़ती थी। मेरे द्वारा जीवन में अब तक देखी गई किसी भी लड़की से अधिक गंभीर, अधिक बौद्धिक—और कवयित्री। मन खींचता जा रहा था उसकी ओर। एक रोज़ वह खड़ी थी मेरे सामने और उसकी गमक उसके शब्दों के साथ घुलती हुई मेरी शिराओं में उतरती जा रही थी। मुझे प्रेम-सा कुछ महसूस होने लगा था। मैं अब उसके लिए कविताएँ लिखना चाहता था। कल्पनाएँ करता था कि मैंने ऐसी कविताएँ लिख दी हैं कि उसने मेरी हथेलियों पर अपने लब रख दिए हैं। मेरे माथे पर बोसा किया है या मेरे कानों में गीली आवाज़ में फुसफुसाई है—मेरे कवि! मैंने सचमुच के प्रयास भी किए। कुछ कविताएँ लिखी और उसे भिजवा दी। दोस्त ने कुछ दिनों बाद बताया कि उसने तारीफ़ की है और कहा है कि उन कविताओं पर वह कुछ काम करेगी, फिर वापसी। किस झोंक में कह गया कि उसे मेरी कविताओं में अपना कोई हस्तक्षेप नहीं लाना चाहिए—पिया तोरा कैसा अभिमान!

उसे यह बात भी कह दी गई थी। अगली बार उससे मिला तो उसने भावुकता की बहुत-सी बातें कहीं। उसकी आँखों में आँसू भर गए थे। उसने मेरी हथेली पर अपने लब नहीं रखे, उन कविताओं के टुकड़े किए और मेरी मुट्ठी भर दी। उससे फिर कभी नहीं मिला। मैंने इस परिणति पर दुःख रखा और उसके लिए एक अंतिम कविता लिख उसे अपनी स्मृतियों की किसी बंद गली में छोड़ दिया।      

शेषेर प्रश्न...

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