शनिवारेर चिट्ठी : झरना बड़ी हँसमुख लड़की है...
शायक आलोक
18 जुलाई 2026
दीपालिका
क्या कहोगी जो कहूँ कि मुझे असुंदरता कुछ असहज करती है। यह राय मैंने किसी एक अनुभव के बिना पर तय की। मैंने उन्हें सुंदर स्त्रियाँ और कुछ कम सुंदर स्त्रियाँ कह साहचर्य निभाया। वह एक भली स्त्री थी। उसमें भली स्त्रियों के सब गुण थे। वह मेरे प्रति उदार रही थी। मैं अराजक था और उसमें शिशु सँभालने वाली माताओं जैसा संयम था। उसका रूप उन रूढ़ प्रतिमानों में नहीं समाता था, जिन्हें संसार सहज ही सुंदर कह देता है। नाक कुछ अधिक भरी हुई, होंठ कुछ कम ख़ाली। देह में कुछ कम लय। वह—लावण्य से कुल अपरिचित। उसकी उपस्थिति में एक स्थूलता थी। वर्ण पिरसियाम और उसके चेहरे में आकर्षण उत्पन्न करने वाला पानी नहीं था। उसके पाँव धरती पर पैर टिकाकर लंबे समय तक कार्यरत रहतीं श्रमिक स्त्रियों जैसे चौड़े थे। उसकी आँखें कुछ न कहती थीं—उनमें न आग्रह था, न कोई विस्मय। उसकी देह किसी भी वास-सुवास से रिक्त। असुंदरता के प्रति मेरी असहजता के इस दोष की कथा एक बार मैंने प्रतुश से भी कही। उसने कहा कि यह असहजता उसके पास भी है ज़रा तो हमें इस पर काम करना होगा।
अटपटी बात है कि मुझे उसकी याद आषाढ़ के मध्य में तब आई है, जब यह किसी और स्मृति के सुख-दुःख को जीने का आकुल मास है। स्मृतियाँ भला ऋतुओं का अनुशासन कब मानती हैं! वे एक पीड़ा के भीतर दूसरी पीड़ा का हाथ पकड़ चली आती हैं, एक सुख के भीतर दूसरे सुख का। मैं उसके चेहरे को याद करना चाहता हूँ तो उसके गुण पहले याद आते हैं। उसका चेहरा लौटता है पीछे अपनी असुंदर रिक्तता में।
वह चली गई थी तो मैं रोया था। मैं रोया था देर तक। मैं रोया था दूर तक मंजरी! रोता-रोता उस पहले दिन तक गया जब वह सुंदरता मेरे घर उतरी थी, रोता-रोता आज के दिन तक लौटा जब वह चली गई थी। रोया इससे अधिक, जितना बिछुड़न पर रोया जाता है—रोया उससे अधिक, जितना अपने भीतर कुछ टूट जाने पर रोया जाता है। रोया इस बात के लिए कि उसे कभी ठीक से देख ही नहीं पाया। सिसका इस बात के लिए कि उसे अब देख नहीं सकूँगा। हत अभाग्य! वह मुझे प्रेम देती रही और मैं...
मैं उस दिन उसके लिए रोया था, उससे अधिक अपने लिए। कई साल बीत गए। किसी तय दिन ख़ूब और खुलकर रोना चाहता हूँ व्यतीत की सब भूलों और बाधाओं और वंचनाओं के लिए। बाद फिर बस सुख में रोना चाहता हूँ।
चिरोदिनी
दुःख की श्रेणी में कोई मूल दुःख, स्मृति की श्रेणी में कोई प्राथमिक स्मृति होती है क्या, कहो? झरना बड़ी हँसमुख लड़की है... झरना आषाढ़ में जाना चाहती थी तो मैंने मनुहार किया कि वह आश्विन में जाए। आषाढ़ किसी और स्मृति के सुख-दुःख को जीने का आकुल मास है। मैं आषाढ़ को आरिनी के सुख-दुःख में जीना चाहता था। एक पारदर्शी नरमाहट है आरिनी के नाम में। उसकी स्मृति में एक गरमाहट। मैं क्षमा देकर नहीं, क्षमा माँगकर ‘क्लोज़र’ की आस रखने वाला मामूली प्रेमी रहा हूँ। मंजरे, तुम जीती हो उस पुरुष को जो आगे बढ़ गया है। आरिनी का वह प्रेमी अब भी रहता है कहीं मेरे अंदर। कभी-कभी दिख पड़ता है। मेरे कमरे में, सड़क पर, किसी चलचित्र, कविता, कथा, किसी कादंबरी में।
वही मिला कल। कल—16 जुलाई। वही पुरानी बातें दुहराता हुआ : रातें अब लंबी बीतने लगीं थीं शायक, संवाद लयबद्ध। कभी मौसम, कभी स्मृतियों, कभी इतर प्रसंगों पर। कभी-कभी सोचता हूँ, क्या वह प्रेम था या किसी गह्वर, किसी एकांत में किसी की छाया खोजने की बस कोशिश? हाँ, उसकी उपस्थिति में जो उजास था, उनमें किसी भी उत्तर से अधिक सचाई थी। जानते हो, पहली बार जब हम मिले, लगा कोई यात्रा पूरी हो गई। वह शहर, जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा था, उसके आने से परिचित लगने लगा। स्टेशन पर भीड़ थी। वह मुस्कुराई थी। मेरे भीतर जो वर्षों से स्थगित था, वह एक क्षण में... हमने कहाँ कहा था कुछ, मौन था वहाँ, पर किसी वचन से कहीं अधिक गहन।
मुझे स्नेह महसूस हुआ उससे। मैंने पूछा फिर उससे। रोना चाहते हो? मेरा कंधा लोगे। पिगीबैक राइड कराऊँ? गाना सुनाऊँ—सुनी नहीं ज़माने ने तेरी मेरी कहानियाँ—मोमिना मुस्तेहसन, असीम अज़हर।
जैसे सुनी नहीं उसने मेरी बातें। बड़बड़ाता रहा : साथ रहना अपने भीतर भी एक यात्रा थी। सुबहें साझा हुईं, आदतें साझा, चाय के स्वाद तक में एक-दूसरे की उपस्थिति घुल गई... हर साथ अपने भीतर एक सूक्ष्म दूरी भी सँजोए रखता है। धीरे-धीरे छोटी-छोटी बातें चुभने लगीं। कोई मौन जो पहले सुकून था, अब कभी-कभी भारी हो जाता। मैं अपने अधूरेपन की झुँझलाहट उसमें उँड़ेल देता, वह अपने भविष्य की चिंता मुझमें... हम दो आत्माएँ नहीं, दो मनुष्य थे—अपनी सीमाओं और अपनी आकांक्षाओं के साथ। एक दिन उसने कहा कि अब हमें अपने रास्ते अलग कर लेने चाहिए। मैं चुप रहा। मैं कुछ कह ही नहीं सका।
मैंने अपनी हथेलियों में उसका चेहरा भर लिया। वह फफक पड़ा था। अब भी सपनों में आती है। बांग्ला बोलती है। कोई चिरोदिनी गीत गाती है। मैंने उसका साथ दिया। किसी रोते हुए आदमी का रोने में साथ देना मुझे मानुषिक कृत्य लगता है। हम ख़ूब देर साथ रोए। हम अपने-अपने जीवनों से आगे बढ़ते हुए फूल, चिड़िया, स्त्री, पहाड़, नदी, अस्मिता, देश, दुनिया के लिए तब तक सिसकते रहे जब तक हमारा गला रुँध नहीं गया!
आश्लेषा
मिस्र के कपास से बनी क़मीज़! सफ़ेद क़मीज़!—इस तरह कोई किसी को याद रखता है क्या? वह क़मीज़ जो मुझे मिली नहीं कभी।
नहीं।
या इस तरह कि वह बोल रही है और मैं सुन रहा हूँ और वहाँ कोंकण के पहाड़ हैं और वे इतने ऊँचे नहीं और वे मुझे कोयले के पहाड़ से लगते हैं और उनमें नीलापन है और पार समंदर है, समंदर जो मेरी कल्पना में सफ़ेद समंदर है और इधर विरल जंगल है, कम ऊँचे पेड़, उनके सफ़ेद तने और कोई रास्ता नहीं है और भूमि साफ़ है और मैं आगे जा रहा हूँ और वहाँ वह घर है और वह कमरा और वह बिस्तर और वहाँ दिन है और वह बिस्तर में है और वह अपने शोक की एक कथा कह रही है और यहाँ रात है और मैं दिल्ली में हूँ और मैं उस कथा को सुन रहा हूँ।
उसकी हँसी उजली हँसी है। उसका चेहरा इतना सूफ़ी चेहरा है। वह सौम्य है। मुझे लगता है कि उसे आलिंगन में लेना लद्दाख की ठंड में सबसे नर्म चांगथांगी को आलिंगन में लेने जैसा है। उसने इतनी तस्वीरें भेजी हैं और मैं गरमाहट में तृप्त हूँ और मेरे पास प्रेमपूर्ण मुलाक़ातों की कल्पनाएँ हैं और कविताएँ हैं। उसके कोंकण के पहाड़ और मेरे गंगा के मैदान के बीच मुंबई का जुहू बीच है और हम वहाँ मिलेंगे और उन तस्वीरों में मैं साथ की हर जगह पर बैठूँगा।
और फिर उसका ब्याह हो गया! हाँ, उ-स-का ब्या-ह हो ग... और उसकी हर तस्वीर में एक दूसरी तस्वीर है... अह! इस तरह कोई किसी को याद करता है क्या? इस तरह याद करने पर आँखों में थोड़ी नमी आती है क्या, जबकि मैं यहाँ एक संसार में हूँ और यहाँ के अपने कारबार हैं और आस-पास इतनी बातें हैं और कम-बख़्त अदद एक रोने की जगह भी नहीं और यह मेरे पास एक ही कलेजा है अभी-अभी ज़रा उघड़ आया सा?
राका
उसने बर्तन धो दिए हैं। उसने मेरे लिए खाना बनाया है। उसने मुझे नहलाया है। उसने फिर मुझे प्यार किया है। उसने मेरे बुख़ार में रात काटी है। उसने मेरी चुप्पियों को बिना प्रश्न किए स्वीकार किया है। उसने मेरे भीतर के अँधेरे से कभी शिकायत नहीं की है। उसने शहर छोड़ दिया है। उसने अपनी कुछ वस्तुएँ मेरे पास रख दी हैं।
लेकिन वह मुझे याद नहीं आती। यह लिखते हुए मैं आईने से दूर बैठा हूँ वगरना नज़र नहीं मिलती। मुझे उसके लिए कोई टीस नहीं होती। मेरे पास उसके जाने के किसी निश्चित ऋतु की याद नहीं है। कोई गीत उसे वापस नहीं लाता। कोई गंध उसका नाम नहीं बनती। मेरी स्मृति में उसके लिए कोई फूलगाछ तक नहीं।
मैं इतना बुरा आदमी हूँ! किसी दिन अपने बड़े बाल कंघी से सँवारते हुए कटोरी भर अनुताप रोना चाहता हूँ। उसकी वस्तुओं में यह कटोरी और कंघा ही तो अब शेष रह गया है।
ज्योतिका
कुछ संबंधों की याद पड़ते ऐसा क्यों जान पड़ता है मानो गँदले पानी में पाँव उतर गए हों। इच्छा मिटती नहीं कि वे लोग कभी मिले ही न होते। उनका ढंग, ढब, निशान—सब स्मृति से मिट जाएँ। लेकिन स्मृति न्यायप्रिय कहाँ होती है। वह फूल भी सँभालकर रखती है और शूल भी। हम उन लोगों को इसलिए नहीं ढोते कि अनुराग की कोई रेख अब भी खींची है, इसलिए कि वे हमारे जीवन के समय में घट चुके हैं। उन्हें भूलना अपने जीवन के एक हिस्से को झुठलाना होगा। फिर हम समझते हैं कि मुक्ति भूलने में नहीं, इस स्वीकार में है कि जीवन की अपनी धूप होती है और अपनी ही छायाएँ। बदतर यादें न होतीं तो सुख भर रो लेने के लिए बेहतर स्मृतियाँ किस घर से आतीं। मेरा इस बात पर रोने का मन होता है कि मैं एक ऊँचाई से उन्हें बुरा और स्वयं को भला कह रहा हूँ। मैं कितना बुरा आदमी हूँ!
प्रतिश्रुति
यह यक़ीनन आज की ही बात है। मेरे दरवाज़े पर कोई दस्तक नहीं हुई। स्मृतियाँ दस्तक नहीं देतीं। मैंने सिर उठाया और वह सामने खड़ी थी। कॉलेज की यूनिफ़ॉर्म। सफ़ेद सलवार। हल्का नीला कुरता। अह, कैसे करीने से बँधे हुए बाल! कितनी सुंदर!
“आ सकती हूँ?”—आवाज़ की वही नरमी... लरज़ कि मन चाहता है कि उसकी कलाई को आश्वस्ति से थाम लूँ और वह अभी इस जगह की स्वामिनी हो जाए।
“तुम गई ही कब थीं!”
वह इधर-उधर लहरती कमरे को देखती रही। उसके पाँव कुछ थिरकते हुए से। उसका होना कितना अच्छा लगता है! उसने किताबों पर उँगलियाँ फिराईं, फिर मेरे बालों पर। उसकी आँखें नम होने लगी थीं। उस नमी से मेरी आँखें भी। फिर झटके से उठी और खिड़की खोल दिया। बाहर की बहुत सारी हवा अंदर आ गई और कमरा भर गया।
“तुम अब भी चीज़ें फेंकते नहीं?”
मैंने इस प्रश्न की ओर नहीं देखा। मेरी आँखों में हवा और पानी का ओझल था। उसे देखा तो वह अब वहाँ नहीं थी। वह बारह वर्ष पीछे लौट गई थी। उसने अब भी वही यूनिफ़ॉर्म पहन रखी थी। उसने टूटकर प्रेम किया था। वह आवेग में रोई थी, फिर सुख में। वह अब दुःख में रो रही थी, जब मैं उठा और उसके लिए पानी ले आया। वह जा रही थी तो मैं उसका पीछा कर रहा था। वह दस बरस पुरानी गली में मुड़ गई। उसका वह प्रेयस मैं नहीं था, मंज! वह जो वहाँ खड़ा गली के मोड़ पर उसकी प्रतीक्षा साधता हुआ। उसने मुझे मुड़कर देखा भी नहीं।
वह जिस जगह थी उस जगह की उसकी स्मृति में मैं नहीं था। मैं उसे भविष्य से देख रहा था। वह मेरे पास अपना अतीत जीने आई थी।
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