शनिवारेर चिट्ठी : दोष लगे सितंबर को!
शायक आलोक
12 सितम्बर 2026
प्रस्थान
कुछ बादल अधिक, कुछ धूल कम। सितंबर। कोई गली ठीक उसी छत पर नहीं रुकती। अकेली नमी कोई त्योहार नहीं है। घाणी है सुनहरी। बचने का संकेत कभी बताया नहीं जाता। सितंबर कोई ठहराव नहीं है। कीचड़ से नाता धुँधला और थोड़ा गाढ़ा है। धुली हुई धूप चमकीली है, स्याह नहीं, उतनी स्याह कभी नहीं जितनी बादल में हो जाती है। एक उमस का भरोसा, वही भरोसा भारी, एक छोटी राहत का कोना, वही कोना नमकीन, रुकने की जल्दी, वही जल्दबाज़ी सुस्त, वही बरामदा। ढोल बजने का समय वह है, जब गली भर चुकी और उसके बाद किसी छाँव में बैठना बचता नहीं। एक धुला हुआ सब्ज़ रंग। अगर यह भारी नहीं तो एक ठंडक है और अगर किसी भी महीने से अधिक नम है तो नम नहीं। मज़ेदार बात है कि जितनी देर छोटी, उतनी ही पक्की है शाम की घटना। मान लो कि थाली में रंग था और इत्र था। मान लो कि किसी बेचैनी का कोई सबब नहीं था, ज़्यादा संभावना एक भीड़ की, मान लो कोई हैरानी नहीं थी, तो क्या हैरानी को बुलावा देना ज़रूरी नहीं। समेटने का, सुखाने का, ढाँपने का एक ढंग है न भीगना और भीगना और भीगते जाना। रीत को बरतने का एक ढंग है कर्पूर और धागे का पूजा में उपयोग। पानी को पहचानने का एक ढंग है याद और मूर्ति को जोड़ती हुई एक धारा। सही ढंग यह है कि नदी को एक विसर्जन और घंटी का आकार देना और डूबा होना, ख़ासा डूबा रहने में और उजास को रात में बरतना। यह पर्याप्त भीगा है उसमें। इसका रंग बड़ा उजला है। बहुत उजला कहना झूठ न हो। बहुत गीला कहना चुपचाप बह जाना हो सकता है। अनोखे ढंग से पिघलाना हो सकता है। हर मूर्ति में अनोखा न हो। अनोखा न हो... किसी घाट के लिए।
प्रिय मंज, तुम्हें कितना अबूझ और अपरिचित-सा लगेगा यह गद्य... लेकिन तुम परिचित हो ‘क्यूबिज़्म’ से। तुम्हें याद कराऊँ वह बड़े चेहरे वाली स्त्री जिसे रँगा पिकासो ने। पिकासो की ‘रोज़ बेला’ चल रही है और पिकासो क्यूबिज़्म की ओर छलाँग को तैयार हैं। वह स्त्री—गर्ट्रूड स्टाइन के कथित ‘वर्बल क्यूबिज़्म’ को पिकासो और ब्राक के ‘विज़ुअल क्यूबिज़्म’ के भाषिक समानांतरता में समझो। वही बरतना चाहा मैंने यहाँ। सितंबर उद्विग्न है। स्टाइन शब्दों को उनके सामान्य अर्थ-क्रम और तर्क-संबंध से अलग कर, दोहराव और हल्के परिवर्तन के ज़रिए, वस्तु को बताने की बजाय उसकी बनावट और लय में महसूस कराती हैं। भाषा यहाँ पारदर्शी माध्यम नहीं रह जाती जो अर्थ तक पहुँचाए, बल्कि ख़ुद एक अपारदर्शी, ठोस वस्तु बन जाती है। यहाँ शब्द अपनी ध्वनि, दोहराव और बनावट के लिए बरते जाते हैं, न कि सिर्फ़ संदर्भ के लिए।
स्थगन
सितंबर, मुझे लगता है, मास नहीं है—वह एक भेष है जिसे समय पहनता है जब उसे स्वयं को याद दिलाना होता है कि वह गुज़र रहा है। मैं इस क्षण उन आवाज़ों का एक थका हुआ संग्रहालय हूँ जो इस माह मेरे पास से होकर गुज़रीं। विलियम बटलर येट्स ने मरे हुए आयरलैंड के लिए शोक मनाया है, बलिदान अब सिक्कों की गिनती में बदल चुका है। विस्टन ह्यू ऑडेन उसी सदी के एक और अँधेरे कोने में बैठा, अपनी क्षीण आवाज़ को इतिहास की गड़गड़ाहट के सामने रखता है, जानता है कि प्रेम अंततः असफल होगा। मैं सोच रहा था कि क्या सितंबर की कविता पराजय की डायरी होती है। सितंबर में एलिज़ाबेथ बिशप का घर है जहाँ दुःख वस्तुओं में छिप गया है, चायदानी रो रही है और बच्चा स्वयं नहीं जानता कि वह क्या खींच रहा है। जेफ़री हिल का सितंबर-गीत चुप्पी को एक क़दम आगे ले जाता है : भाषा, होलोकॉस्ट के सामने, स्वयं अपराधी बन जाती है। मैं इन दोनों को एक ही कमरे में रखता हूँ—एक बचपन जो बोध नहीं रखता, एक वयस्कता जो बोध रखकर भी बोल नहीं पाती। विलियम स्टैनली मर्विन की सितंबर की रोशनी हर वर्ष लौटती है और हर बार किसी अजनबी की तरह लौटती है। मेरी स्मृति यों ही लौटती रही है। पैट्रिक कवाना की सुबह इसके विलोम पर खड़ी है। सेब, मिट्टी, श्रम—एक धर्म जिसे किसी मंदिर की आवश्यकता नहीं। लॉरेंस फ़र्लिंगेटी की मिठाई-दुकान की देहरी पर मैं स्वयं को खड़ा पाता हूँ। भीतर की गर्माहट और बाहर फैली स्लेटी दुनिया के बीच, मासूमियत का वह अंतिम क्षण जिसे हर मनुष्य जानता है और कोई नहीं बचा पाता। एलन गिन्सबर्ग की सितंबर की सड़क पर बंगाल के बच्चे चलते हैं और उनकी पुकार मेरी अपनी उदासीनता को आईना दिखाती है। करुणा भी अंततः एक साहित्यिक भंगिमा बन सकती है। धीमे शोर की कविताओं में जाता हूँ तो हेलन हंट जैक्सन का अकेला पीला फूल ऋतु-परिवर्तन की मूक घोषणा कर रहा है; एमी लॉरेंस लोवेल की सुनहरी दुपहरी युद्ध के बीच सहेजी जा रही है; जॉन हॉयर अपडाइक की स्कूल की घंटियाँ समय के चक्र को सामान्य बना देती हैं; सीमस हीनी के सड़ते जामुन, जिनमें आशा हर वर्ष टूटती है और फिर भी लौट आती है; गैल्वे किनेल की जिह्वा पर घुली भाषा का स्वाद; डिलन मार्लेस थॉमस का जन्मदिन, जो शोक से अधिक एक संगीतमय पुनर्जन्म है; और मे सार्टन का एकांत, जिसमें बदलता मौसम आत्म-स्वीकृति की धीमी प्रक्रिया सिखाता है।
सितंबर, अब मुझे लगता है, मास नहीं है—एक स्थगन है। गर्मी की तृप्ति और शीत की रिक्तता के बीच वह विराम, जिसमें मनुष्य को अंततः स्वयं से मिलना पड़ता है। और हर कवि, अंततः, उसी मिलन को टालने की अपनी अलग विधि खोज लेता है।
रोग
यहाँ सितंबर भादों है। भादों है। भादों है और यह जानना कि भादों है, भादों में होना नहीं है। भादों में बारिश होती है और बारिश होती है इसलिए भादों नहीं होता, भादों तब होता है जब बारिश के बाद भी बारिश कमरे में रहती है, दीवार में रहती है, कपड़े में रहती है, किताब में रहती है, उस वाक्य में रहती है जिसे अभी मैंने लिखने से पहले रोक दिया। मैंने आज लिखा—भादों बीमार है। फिर मैंने देखा कि बीमार भादों नहीं है, बीमार मैं हूँ। फिर मैंने सोचा कि बीमार मैं भी नहीं हूँ, केवल भादों के लिए बीमारी का एक अच्छा वाक्य चाहिए था और मैंने वह वाक्य अपने ऊपर आज़मा लिया। भादों में ऐसा होता है। ऐसा भादों में होता है। भादों में धूप आती है और धूप आने से भादों चला नहीं जाता, वह धूप को भी भिगो देता है, धूप में भी नमी रहती है, नमी में भी एक धूप रहती है, आप कपड़ा धूप में डालते हैं और कपड़ा सूखता नहीं, कपड़ा सूखता नहीं क्योंकि भादों अभी है, भादों अभी है क्योंकि कपड़ा सूखा नहीं है। उधर खेत हैं, खेतों में धान है, धान में पूर्ण दाना बनने की तैयारी है, तैयारी है जैसे कोई आदमी अपने जीवन से जाने की तैयारी करता है। भादों जाने वाला है। भादों जाने वाला है और यही बात उसे सबसे अधिक भादों बनाती है, क्योंकि जो जा रहा है वह अभी जाता नहीं, जो जाता नहीं वह उपस्थित रहता है, जो उपस्थित रहता है वह धीरे-धीरे अनुपस्थित होने लगता है। शाम को बारिश रुकती है। बारिश रुकती है। फिर एक बूँद गिरती है। फिर एक और। यहाँ भादों वह चीज़ है जो बारिश रुक जाने के बाद भी गिरती रही है।
मुक्तिबोध
मुक्तिबोध की मृत्यु सितंबर में हुई। मृत्यु के लिए कोई मास चुनना हो तो शायद इससे अधिक असुविधाजनक मास नहीं हो सकता। सितंबर ऐसा अधूरा मास है—गर्मी अभी जा नहीं रही, ठंड अभी विचार मात्र की तरह ही आ नहीं रही। मुक्तिबोध ऐसे ही किसी बीच में मरे। मृत्यु से पहले आदमी अपने शरीर में रहता है। उसके बाद वह दूसरों की स्मृतियों में रहने लगता है। मुक्तिबोध की स्मृति में लौटना किसी पुराने आदमी के पास लौटना नहीं है। वह लौटना भी नहीं है। वहाँ पहुँचते ही अपने समय की सिलाई थोड़ी उधड़ जाती है। जो बातें अभी-अभी की लग रही थीं, उनके किनारे पुराने निकलते हैं और जो बहुत पुरानी थीं, वे अचानक अपनी गर्मी छोड़ने लगती हैं। कोई साफ़ चेहरा देता नहीं है दिखाई। चेहरे के पीछे का हिसाब सामने आता है। मुक्तिबोध को याद करना इसलिए उनके जीवन में जाना नहीं, अपनी ही बनाई हुई व्यवस्था में एक सुरंग बनाना है। उसके पार कोई दृश्य नहीं होता। बस यह मालूम पड़ जाता है कि जिस जगह हम इतने दिनों से खड़े थे, वह जगह उतनी निष्पाप नहीं थी जितनी हमें लगती थी।
प्रवास
सितंबर आते ही आकाश केवल दिशाओं का नहीं, असीम दूरियों का एक जीवंत मानचित्र बनने लगता है। ‘आर्कटिक टर्न’ पक्षी प्रजाति उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव की अनंत यात्रा पर निकलकर वर्ष में 70 से 90 हज़ार किलोमीटर नाप लेती है। तीन दशकों के उनके जीवनकाल में मानो वे दो बार चाँद तक जाकर लौट आते हैं और तीसरी बार वहीं चाँद पर बस जाते हैं। ‘बार-टेल्ड गॉडविट’ अलास्का से न्यूज़ीलैंड तक 11 से 13 हज़ार किलोमीटर का अनवरत नभ-पथ आठ-दस दिनों तक बिना अन्न-जल, अविराम तय करता है। मैंने सुना है कि ‘बार-हेडेड गूज़’ उत्तुंग हिमालय के मस्तक को चीरते हुए गगनचुंबी उड़ानों का साक्षी बनता है और एक ‘रूपेल्स वल्चर’ कभी 37 हज़ार फ़ीट की विहंगम ऊँचाई पर विमान के मार्ग से टकराया था। ‘ग्रेट स्निप’ 60 मील प्रति घंटे की वेगवती गति से हवाओं को चीरता है। ‘ब्लैकपोल वार्बलर’ समुद्र के नीरव वक्ष पर लगातार बहत्तर घंटे तो ‘रूबी-थ्रोटेड हमिंग बर्ड’ मेक्सिको की खाड़ी की उठती तरंगों के ऊपर अठारह से बाईस घंटे तक अविराम पंख फड़फड़ाता रहता है। एक औंस से भी हल्का ‘नॉर्दर्न व्हीटइयर’ आर्कटिक के हिम-शिखरों से अफ़्रीका के गर्म क्षितिज तक 9,000 मील का निर्जन पथ पार कर जाता है। ‘अमूर फ़ाल्कन’ साइबेरिया से अफ़्रीका की ओर 22 हज़ार किलोमीटर का महाद्वीपीय सफ़र तय करता है और डोयांग (नगालैंड) में दीमक और कीट-पतंगों का आहार लेकर आगामी महासागर को लाँघने की सामर्थ्य जुटाता है। कहते हैं कि ‘सूटी शियरवॉटर’ प्रशांत महासागर को केवल पार ही नहीं करता, बल्कि उसकी परिक्रमा का एक वृत्तांत रचता है।
ये पंछी सूर्य, नक्षत्रों और पृथ्वी की अदृश्य चुंबकीय शिराओं से अपनी दिशाएँ बाँचते हैं। गगन में ‘V’ की सुघड़ संरचना में उड़ते हंस एक-दूसरे की थकान को सहर्ष बाँट लेते हैं। कुछ कोयल प्रजातियों के अबोध बच्चे बिना किसी पथप्रदर्शक के, एकाकी ही अपना मार्ग खोज लेते हैं। यह महाभिनिष्क्रमण केवल घटते तापमान का नहीं, बल्कि सिमटती रोशनी और देह के भीतर उठे किसी अलौकिक हार्मोन का अमर आदेश है।
...और फिर इन रास्तों में कंक्रीट हैं और शीशे हैं। कृत्रिम रोशनियों का जगमगाता भ्रम है। उजड़ते हुए नीड़ और नष्ट होते पर्यावास हैं। हम सहसा कह देते हैं कि पक्षी लौट गए; पक्षी नहीं लौटते, उनकी दिशाएँ लौटती हैं।
स्मरण
यह सितंबर मुझे कुछ फ़ीका-सा लगा है। जैसे किसी ने आकाश को धोकर निचोड़ा ही नहीं, बस टाँग दिया हो—भारी, नम, बे-रंग। इन दिनों तुम भी कुछ चिड़चिड़ी रही हो। चिड़चिड़ी शब्द से तुम्हारे लिए एक नाम चिड़िया रखे जाने का ख़याल पड़ता है। छोटी बातों पर हमारी आवाज़ों में काँटे उग आए। हमारी चुप्पियों में भी काँटे थे। हम दो घरों में दो बंद छतरियों की तरह पड़े रहे, जिनसे पानी टपकता रहा। दोष लगे सितंबर को! सितंबर चीज़ों के समाप्त होने से पहले ही उन्हें खिन्न कर देता है। इधर ही एक सुबह चाय अपने समय से पूर्व ठंडी हो गई। फूल खिले रहे गमले में, फिर भी ग़मगीन बने रहे। खिड़की पर दिन में भी कैसी चढ़ी रही हुरहूर थी!
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