सतलुज : एक धारा को रोकने की कोशिश
ममता पंडित
08 जुलाई 2026
तीन साल की लंबी क़ानूनी और सेंसर संबंधी लड़ाई के बाद रिलीज़ हुई फिल्म ‘सतलुज’ मात्र दो दिन के भीतर ही भारत में ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ZEE 5 से हटा दी गई। अब यह फ़िल्म भारत में उपलब्ध नहीं है। सरकार ने इसे सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के तहत एक अंतर-विभागीय समिति (IDC) के पास समीक्षा के लिए भेजने की प्रक्रिया शुरू की है।
जिस फ़िल्म के लिए सेंसर बोर्ड ने 127 कट सुझाए हों और जिसे अपने मूल शीर्षक ‘पंजाब 95’ की जगह नया शीर्षक देकर रिलीज़ करना पड़ा हो, उसके साथ विवाद जुड़े रहने की आशंका पहले से ही थी। फ़िल्म में जसवंत सिंह खालड़ा की भूमिका निभाने वाले दिलजीत दोसांझ ने भी सोशल मीडिया पर आशंका जताई थी कि फ़िल्म भारत में अधिक समय तक उपलब्ध नहीं रह पाएगी।
लेकिन सवाल यह है कि आख़िर इस फिल्म में ऐसा क्या है कि रिलीज़ होते ही यह इतनी तीखी बहस का विषय बन गई?
मेरे लिए इसका उत्तर किसी राजनीतिक नारे में नहीं, बल्कि एक मानवीय बेचैनी में है। इतिहास के असुविधाजनक प्रश्न हमेशा सत्ता, संस्थाओं और समाज—तीनों को असहज करते हैं। जब कोई कलाकृति उन प्रश्नों को फिर से हमारे सामने रखती है, तो स्वाभाविक ही बहस शुरू होती है।
यहाँ सहज ही गोरख पांडेय की कविता-पंक्तियाँ याद आती हैं :
वे डरते हैं
किस चीज़ से डरते हैं वे
तमाम धन-दौलत
गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद?
वे डरते हैं
कि एक दिन
निहत्थे और ग़रीब लोग
उनसे डरना बंद कर देंगे।
यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी है—एक ऐसे व्यक्ति की जिसने अपनी जान की परवाह किए बिना उस सच को सामने लाने की कोशिश की जो वर्षों तक दफ़्न रहा।
पंजाब में 1984 से 1995 के बीच आतंकवाद और उसके विरुद्ध चलाए गए अभियान का इतिहास बेहद जटिल और त्रासद है। इस दौर में हिंसा दोनों ओर से हुई और अनेक निर्दोष लोगों ने भी अपनी जान गँवाई। इस इतिहास के बारे में पहले भी लिखा गया, रिपोर्टें सामने आईं और ‘माचिस’ (निर्देशक : गुलज़ार) जैसी फ़िल्में भी बनीं।
लेकिन ‘सतलुज’ उस इतिहास के एक ऐसे अध्याय को सामने लाती है, जिसे देखकर भीतर तक बेचैनी होती है और रूह तक काँप जाती है।
जसवंत सिंह खालड़ा ने दावा किया था कि इस दौर में हज़ारों लोगों को ‘लावारिस’ बताकर श्मशानों में जला दिया गया, जबकि अभिलेखों में उनके परिवारों का विवरण मौजूद था। उनका आरोप था कि इनमें बड़ी संख्या उन लोगों की थी जिन्हें पुलिस ने आतंकवादी बताकर मुठभेड़ों में मार गिराया था। यही उनकी पड़ताल का केंद्र था।
खालड़ा ने तत्कालीन पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध लंबी क़ानूनी और सामाजिक लड़ाई लड़ी। वे अपनी रिपोर्ट लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक गए ताकि इस मामले की निष्पक्ष जाँच हो सके। बाद में उनका अपहरण कर लिया गया और उनकी हत्या कर दी गई। उनकी पत्नी परमजीत कौर खालड़ा ने उसके बाद भी न्याय की लड़ाई जारी रखी।
‘सतलुज’ इस पूरी कहानी को बेहद प्रभावी ढंग से पर्दे पर उतारती है। निर्देशन, अभिनय और सिनेमैटोग्राफ़ी—तीनों स्तरों पर यह उल्लेखनीय है। मुख्य भूमिका में दिलजीत दोसांझ एक बार फिर प्रभावित करते हैं। अर्जुन रामपाल, कँवलजीत सिंह और गीतिका विद्या ओहल्याण ने भी सशक्त अभिनय किया है।
लेकिन जिन आँखों की उदासी फ़िल्म ख़त्म होने के बाद भी आपके साथ रह जाती है, वे सुविंदर विक्की की हैं। उनके किरदार के माध्यम से फ़िल्म पुलिस बल के भीतर मौजूद नैतिक द्वंद्व और मानवीय विवशताओं को भी सामने लाती है। यही वजह है कि फ़िल्म किसी एक पक्ष का प्रचार नहीं करती। एक दृश्य में सीबीआई अधिकारी और पुलिस अधिकारी के बीच संवाद इस पूरे संघर्ष की जटिलता को समझने का अवसर देते हैं।
निर्देशक हनी त्रेहन ने लंबी लड़ाई के बाद फ़िल्म को बिना कट के, बदले हुए शीर्षक के साथ रिलीज़ कराया। रिलीज़ होते ही यह फ़िल्म सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गई। इसके कुछ ही समय बाद इसे भारत में ZEE 5 से हटा लिया गया।
लेकिन इतिहास बताता है कि किसी कलाकृति को रोक देने से उससे जुड़े प्रश्न समाप्त नहीं होते। अक्सर वे और व्यापक हो जाते हैं। इस फ़िल्म के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उसके हटने के बाद उसकी पायरेटेड प्रतियाँ सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफ़ॉर्मों पर तेज़ी से फैलने लगीं। कई स्थानों पर सामुदायिक स्तर पर भी इसके प्रदर्शन की ख़बरें सामने आई हैं।
निस्संदेह इससे निर्माता और निर्देशक को आर्थिक क्षति पहुँची, जिसकी भरपाई संभव नहीं है। लेकिन इस पूरी घटना ने एक बड़ा सवाल फिर खड़ा कर दिया है—क्या किसी फिल्म को लोगों की पहुँच से हटाना वास्तव में उसके प्रभाव को कम कर देता है?
मेरे ख़याल से फ़िल्म केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं होती। वह समाज की स्मृति, उसके प्रश्नों और उसकी बेचैनियों का भी दस्तावेज़ होती है। किसी फ़िल्म से असहमति हो सकती है, उसके तथ्यों पर बहस हो सकती है, उसके निष्कर्षों से मतभेद हो सकते हैं; लेकिन उसे देखने और उस पर चर्चा करने का अवसर बने रहना चाहिए।
‘सतलुज’ भी केवल एक व्यक्ति की जीवनी नहीं है। यह उस कठिन प्रश्न की याद दिलाती है कि न्याय की लड़ाई लड़ने वालों की क़ीमत अक्सर सबसे अधिक क्यों होती है।
जसवंत सिंह खालड़ा जिस न्याय की तलाश में अपनी जान गँवा बैठे, यह फ़िल्म उसी इतिहास को फिर से याद करने और उस पर संवाद शुरू करने का आग्रह करती है। शायद यही इसकी सबसे बड़ी प्रासंगिकता है।
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