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रूपक-कथाएँ : स्वल्प-वासी

मुज़म्मिल के लिए

एक

बग़ीची के पास पानी का नहीं, प्रतिध्वनियों का एक कुआँ था। जब स्वल्प-वासी उसमें झाँकता, तो उसे अपना चेहरा नहीं, अपनी आवाज़ दिखाई देती—धीरे-धीरे उतरती हुई, गहराई में। वह सुनता था कि उसकी अपनी ही आवाज़ उससे दूर जाती हुई कैसी लगती है। उसने कभी किसी से नहीं कहा कि वह क्या सुनता है; पर उसके लौटने के ढंग में एक हल्की-सी कमी आ जाती थी, जैसे वह कुछ छोड़ आया हो, या कुछ भूल आया हो, जिसे वह पहचान नहीं पा रहा।

कभी वह एक ऐसा कुम्हार बन जाता जो मिट्टी के बर्तन नहीं, बल्कि ख़ाली जगहें गढ़ता। अपने लिए आकार बनाता, जिसमें वह अपना न होना रख सके। उसके चाक पर घूमती हुई मिट्टी में कोई चीज़ नहीं जन्म लेती थी; वहाँ बस एक वक्र, एक घेरा, एक मौन बनता था और उसे ही वह अपना काम मानता था।

कई बार वह कुएँ पर खड़ा अपने को देखने लगता और सोचता कि वहाँ क्या खोज रहा है? अपने से ही कहता—“मैं वह सुनता हूँ, जो मुझसे छूट गया है।” फिर पास ही बैठ जाता और अपने हाथों को पानी में भिगोकर यूँ बोलता जैसे यह समझना चाहता हो कि यह उत्तर है या एक और प्रश्न कि—“छूटना ही वह जगह है, जहाँ चीज़ें पहली बार सच होती हैं।”

कुएँ के पास एक पेड़ भी था—बहुत पुराना, इतना कि उसकी जड़ों ने मिट्टी को नहीं, स्मृतियों को पकड़ रखा था। पेड़ की छाल पर कोई निशान नहीं था, पर जब स्वल्प-वासी उसे देर तक देखता, उसे लगता कि वहाँ बहुत कुछ लिखा हुआ है, बस अक्षर इतने हल्के हैं कि आँख उन्हें पकड़ नहीं पाती। उसे लगता कि उस पेड़ के नीचे बैठने से समय धीमा हो जाता है। वह वहाँ बैठता, और लौटते समय उसके भीतर कुछ बदल जाता; इतना महीन कि वह उसे नाम नहीं दे पाता, पर इतना गहरा कि वह उसे भूल भी नहीं पाता।

एक दिन वह चुपचाप बैठा था। हवा वहाँ अलग थी, जैसे वह कहीं और से आती हो, और अभी तक यहाँ की नहीं हुई हो। “क्या मुझे कुछ सुनाई देता है?” उसने अपने से पूछा और यूँ आँखें बंद कर लीं, जैसे उसे कुछ दिखता हो। वह अपने से बात करते हुए बोला, “जो नहीं है, वही सबसे अधिक उपस्थित है।” उसने कुएँ को याद किया, उसकी गहराई, उसकी उतरती हुई आवाज़ें। उसे लगा, जैसे वह कुआँ अब उसके भीतर खुल गया है, और वह स्वयं उसमें झाँक रहा है।

पेड़ की छाया धीरे-धीरे खिसक रही थी, पर वहाँ, उस क्षण में, वह स्थिर हो गई, जैसे समय ने स्वयं को थोड़ी देर के लिए रोक लिया हो, ताकि स्वल्प-वासी देख सके कि बिना उसके चीज़ें कैसी लगती हैं। उसने अपनी उँगलियों से ज़मीन को छुआ। उसे लगा, जैसे मिट्टी उसके स्पर्श से नहीं, उसकी अनुपस्थिति से आकार ले रही है। उसे अपनी ही आवाज़ फिर से सुनाई दी, पर इस बार वह कहीं जा नहीं रही थी; वह वहीं थी, उसके भीतर, जैसे वह कभी गई ही नहीं थी। कुछ देर बाद वह उठा और यूँ चल दिया जैसे अपने भीतर से मिलकर लौट रहा हो।

उस दिन के बाद, जब भी उस कुएँ में झाँकता, उसे केवल अपनी आवाज़ नहीं, एक हल्की-सी मौन की परत भी दिखाई देती, जैसे शब्दों के पीछे कोई और भाषा है, जिसे अभी तक उसने ठीक-ठीक सीखा नहीं। स्वल्प-वासी के बनाए बर्तन—या कहिए, उसकी ख़ाली जगहें—अब थोड़ी और गहरी हो गईं। वह उन्हें अपने घर में रखता; कभी-कभी उसे लगता कि वे किसी ऐसी चीज़ से भरे हुए हैं जिसका कोई आकार नहीं, पर जो अनुपस्थित भी नहीं है। वह चीज़ें नहीं बनाता था, बल्कि अपने भीतर के ख़ालीपन के लिए आकार खोजता था। उसके भीतर कहीं एक कुआँ है, एक पेड़ है, एक चाक है—जहाँ वह समय-समय पर लौटता है, यह देखने कि जो नहीं है, वह कैसे बना रहता है।

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दो

स्वल्प-वासी ने पाया कि रास्ता बदल चुका है। पेड़ अब भी खड़े थे, पर उनकी चुप्पी अलग थी, जैसे किसी ने उनके भीतर से शब्द निकाल लिए हों। उसने अपने पुराने रास्तों को खोजने की कोशिश की, पर वे अब किसी और के पदचिह्नों से भर चुके थे। उसे लगा कि वह अपने ही रास्ते का अतिथि बन गया है। उसने एक पत्थर को उठाया और उसके नीचे झाँका; वहाँ कुछ नहीं था, केवल रिक्तता, जो उसके भीतर भी फैलती जा रही थी। उसने धीरे-धीरे चलना शुरू किया, जैसे हर क़दम उसे किसी अनजान कथा में प्रवेश करा रहा हो। शाम होते-होते वह थक गया; घर लौट आया। उसे पहली बार लगा कि रास्ता जगह नहीं, बल्कि एक स्मृति है और स्मृतियाँ हमेशा बदलती रहती हैं। यह लिखने के लिए जब स्वल्प-वासी ने अपनी क़लम उठाई, तो उसने कुछ ऐसा लिखा जो पहले कभी नहीं लिखा गया था।

काग़ज़ था, किंतु वह काग़ज़ ऐसा लग रहा था, मानो रात के आकाश का एक टुकड़ा हो जैसे किसी ने आधी रात को आसमान से काग़ज़ काटा हो; ठीक उस क्षण जब चाँद अपने पूरे यौवन में होता है और तारे अभी जागे-जागे हों। उसकी हर परत में चाँद की रोशनी टँकी थी, हर सिलवट में तारों की झिलमिलाहट। पूरे काग़ज़ में—हीरों के शब्द। जैसे हर अक्षर से प्रकाश जन्म लेता हो। वह जो अभी तक निराश था, अब तेज़ी से लिखने लगा, तो रात भी उसके साथ लिखने लगी।

रचना का शीर्षक आना था। इंतज़ार जो जानता था—वह आएगा। जब मध्यरात्रि का पहला घड़ियाल बोला, तो वह उड़ गया। एक हीरे का शब्द छूट गया। स्वल्प-वासी उठाने लगा, पर वह काग़ज़ ग़ायब था। पूरी रचना। 

आकाश अपनी पांडुलिपि माँग रहा था।

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तीन

विश्राम कुटी के पास, जहाँ मकान पुल से इस तरह बात करते हैं जैसे दो बूढ़े अपने पुराने झगड़ों को याद कर रहे हों, वहाँ एक घर था जो हर साल एक दिन के लिए ग़ायब हो जाता था। उस दिन पुल से उठती धुंध इतनी घनी हो जाती थी कि लोग अपने ही हाथों को पहचान नहीं पाते थे। उसी घर में स्वल्प-वासी रहता था, जिसे यह विश्वास था कि जो चीज़ें आँखों से ओझल हो जाती हैं, वे कहीं और अधिक सच्ची हो जाती हैं, और वह उस दिन का इंतज़ार करता था जैसे कोई अपने जन्मदिन का करता है। जब धुंध आई, तो बाक़ी लोग अपने दरवाज़े बंद कर भीतर सिमट गए, पर वह बाहर निकल आया। उसने उस सफ़ेद अंधकार में चलना शुरू किया, जहाँ हर क़दम पर ज़मीन बदल जाती थी और हर दिशा एक-सी लगती थी। कुछ दूर चलने पर उसे लोगों की आहट सुनाई दी। वे लोग विश्राम कुटी के नहीं थे; उनके पैरों की चाल में कोई पुरानी थकान थी और उनकी आवाज़ें ऐसे शब्दों में बोलती थीं जो अब किसी भाषा में नहीं बचे थे। उन्होंने स्वल्प-वासी को देखा, पर पहचाना नहीं, जैसे वह उनके लिए अभी जन्मा ही न हो। उन्होंने उसे अपने साथ चलने का संकेत किया और वह उनके साथ चलता रहा, बिना यह पूछे कि वे कौन हैं, क्योंकि उसे लगा कि शायद यही वे लोग हैं जो हर वर्ष उसके घर के साथ ग़ायब हो जाते हैं और फिर कभी लौटते नहीं। धुंध के भीतर समय इतना धीमा हो गया जैसे ठहर गया हो। अंततः जब धुंध छँटी, तो पुल वैसा ही था, पर विश्राम कुटी में एक घर कम था। किसी ने कहा कि उस घर का स्वल्प-वासी उस दिन कहीं खो गया। कुछ बूढ़े लोग, जो रात में पुल के नीचे बहते नाले का स्वर सुनते हैं, यह भी कहते हैं कि कभी-कभी धुंध के भीतर एक बंदा चलता दिखाई देता है, जो अब किसी को ढूँढ़ नहीं रहा, बल्कि उन लोगों के साथ चल रहा है जिनकी स्मृतियाँ ही उनका घर हैं और वह यूँ मुस्कराता रहता है, जैसे उसने उस जगह को पा लिया हो जहाँ खो जाना ही एकमात्र लौटना है।

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चार

रेत के उस पार, जहाँ हवा अपने ही पदचिह्न मिटा देती है, स्वल्प-वासी रहने लगा था। एक दिन, जब आकाश बहुत नीचे झुक आया था और धूप की धारियाँ ज़मीन पर टूटी हुई हड्डियों की तरह पड़ी थीं, वह उसे उठाकर दूर ले गया, उस जगह, जहाँ लोग अपने मरे हुए जानवरों को छोड़ आते थे, ताकि हवा और गिद्ध उनका काम पूरा कर दें। वहाँ, उसे एक साफ़ हड्डी-सी एक सफ़ेद छाया मिली, अजीब तरह से चमकती हुई, जैसे उसमें कोई बात बाक़ी हो। उसने सफ़ेद छाया को छुआ, तो उसे लगा जैसे उसने भीतर से साँस ली हो। वह उसे अपने साथ ले आया।

उस रात, जब हवा ने अपने गीत बदल लिए, छाया ने उससे बात की। “तुम मुझे क्यों लाए?” उसने पूछा। स्वल्प-वासी चौंका नहीं। उसने कहा, “तुम पड़ी थी। मैंने सोचा, तुम अकेली हो।” छाया धीमे से हँसी—एक ऐसी हँसी, जो कहीं दूर से आती है, जैसे स्मृति की सबसे झीनी परत से। “अकेलापन” उसने कहा, “जीवितों की चीज़ है। मृतकों के पास तो बस शून्य होता है। शून्य में कोई साथ नहीं माँगता।”

स्वल्प-वासी ने पूछा,  “तुम कौन हो?” “मैं?” सफ़ेद छाया ने कहा, “मैं कभी कोई थी। अब मैं बस वह हूँ, जो बची रह गई है।” “क्या मरने के बाद सब ख़त्म हो जाता है?” स्वल्प-वासी ने धीरे से पूछा। छाया ने उत्तर देने में समय लिया, जैसे वह शब्द चुन रही हो, जो अब उसके पास बहुत कम बचे थे। “ख़त्म?” उसने कहा, “नहीं। कुछ भी ख़त्म नहीं होता। वह बस बदल जाता है, इतना कि तुम उसे पहचान नहीं पाते।” “तो तुम अब भी वही हो?” स्वल्प-वासी ने पूछा। “नहीं,” छाया ने कहा, “मैं अब वह नहीं हूँ, जो मैं थी। मैं बस उसकी एक गूँज हूँ, एक सूखी गूँज, जिसमें कोई रक्त नहीं, कोई गर्मी नहीं।”

स्वल्प-वासी ने अपनी छाया को देखा, वह कमरे की रोशनी में काँप रही थी, जैसे वह भी कुछ सुन रही हो। “और स्मृति?” उसने पूछा, “क्या वह रहती है?” सफ़ेद छाया ने एक लंबी चुप्पी ओढ़ ली। “स्मृति,” उसने अंततः कहा, “वह जीवितों का धोखा है। वे सोचते हैं कि याद करके वे हमें बचा लेते हैं। पर जो चला गया, वह उनके शब्दों में नहीं रहता, वह बस उनके बीच एक ख़ाली जगह छोड़ देता है।”

अगली सुबह, उसने सफ़ेद छाया को वहीं रख आने का निश्चय किया, जहाँ से वह उसे लाया था। जब वह पहुँचा, तो हवा अलग थी, थोड़ी भारी, थोड़ी ठहरी हुई। उसने सफ़ेद छाया को रेत पर रख दिया। “अब जाओ” उसने कहा। वह फिर से वही बन गई थी—एक सफ़ेद, मौन चीज़, जो किसी समय जीवित थी।

स्वल्प-वासी लौट आया। उसकी छाया अब भी उसके साथ थी, पर वह अब उसे अलग तरह से देखता था, जैसे वह जानता हो कि छायाएँ भी एक दिन छूट जाती हैं। उस शाम, उसने पहली बार अपनी बग़ीची के पौधों को गिना; उन्हें देर तक देखता रहा, जैसे वह हर एक को अपने भीतर कहीं रख लेना चाहता हो। जब रात आई, तो उसने बत्ती नहीं जलाई। वह अँधेरे में बैठा रहा—उस जगह, जहाँ चीज़ें दिखती नहीं, पर शायद सचमुच होती हैं। उस दिन के बाद, वह कम बोलने लगा। लोग उसके पास आते, उससे पूछते, “तुमने क्या देखा?” वह कहता, “मैंने कुछ नहीं देखा। मैंने बस जाना कि जो दिखता है, वह रहता नहीं। जो रहता है, वह दिखता नहीं।” फिर वह अपनी छाया के साथ दूर चला गया, उस दिशा में, जहाँ रेत धीरे-धीरे आकाश में बदल जाती है।

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पाँच

स्वल्प-वासी कई दिनों से चल रहा था, बिना यह तय किए कि उसे कहाँ पहुँचना है। रास्ता उसके सामने खुलता जाता था, पर पीछे मुड़कर देखने पर उसे लगता कि वहाँ कुछ था ही नहीं। दोपहर के बाद उसने एक खुला मैदान पार करना चाहा। मैदान के बीच बिना पानी का एक गहरा कुआँ था। सूखा कुआँ।

वह उसके पास गया। अंदर झाँका। नीचे कुछ दिखाई नहीं दिया। उसने आवाज़ दी, यह देखने के लिए कि गहराई कितनी है। कोई गूँज नहीं लौटी। उसने फिर पुकारा, इस बार ज़ोर से। फिर भी कुछ नहीं। उसे यह अजीब लगा। हर जगह आवाज़ लौटती है—थोड़ी देर से, थोड़ी बदली हुई, लेकिन यहाँ नहीं।

वह कुछ देर तक वहीं खड़ा रहा। उसे लगा कि शायद गहराई बहुत ज़्यादा है। वह और झुका। इस बार उसे लगा कि नीचे कुछ है—कोई हल्की-सी हरकत—जैसे अँधेरे में कुछ सुन रहा हो। वह पीछे हट गया। उसे पहली बार यह लगा कि आवाज़ नीचे नहीं गई थी; वह कहीं और चली गई थी। वह वहाँ से हटकर चल पड़ा। उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

शाम तक वह एक बस्ती में पहुँचा। लोगों ने उसे पानी दिया। स्वल्प-वासी ने उनसे उस कुएँ के बारे में पूछा। उन्होंने कहा, “वहाँ कोई आवाज़ नहीं जाती।” उसने पूछा, “क्यों?” उन्होंने कंधे उचका दिए। “क्योंकि जो वहाँ गिरता है” उन्होंने कहा, “वह लौटना नहीं चाहता।”

उस रात स्वल्प-वासी ने बहुत धीरे बोलना सीखा। कई दिनों बाद उसे समझ में आया कि कुछ जगहें ऐसी होती हैं, जहाँ आवाज़ें नहीं गूँजतीं, वे ठहर जाती हैं और फिर किसी और के भीतर धीरे-धीरे बोलने लगती हैं।

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छह

उस रास्ते पर एक पेड़ था, जिसे विश्राम कुटी के लोग पहचानते थे। वह हमेशा वहीं होता था—एक मोड़ पर—जहाँ से रास्ता दो दिशाओं में बँटता था। लोग कहते थे कि अगर तुम उस पेड़ को पार कर लो, तो तुम रास्ता नहीं भूलोगे; क्योंकि उसके बाद सब कुछ सीधा है।

दूसरा स्वल्प-वासी उस रास्ते से गुज़रा। उसने पेड़ देखा—जैसा सब बताते थे—ऊँचा, स्थिर, बिना हिले। वह आगे बढ़ गया। कुछ देर बाद उसने पीछे मुड़कर देखा; पेड़ दिखाई नहीं दिया। उसने सोचा कि मोड़ शायद दूर हो गया है। वह चलता रहा। थोड़ी देर बाद, उसे वही पेड़ फिर दिखाई दिया—इस बार सामने।

वह रुक गया। उसने चारों ओर देखा। रास्ता वही था। पेड़ भी वही था। लेकिन उसे याद था कि वह उसे पार कर चुका है। वह पेड़ के पास गया। उसने उसके तने को छुआ। छाल ऊष्म थी, जैसे वह अभी-अभी वहाँ आया हो। वह कुछ देर तक वहीं खड़ा रहा। उसने सोचा कि शायद उसे भ्रम हुआ है। वह फिर आगे बढ़ गया। इस बार उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

शाम तक वह एक बस्ती में पहुँचा। लोगों ने उसे ठहरने दिया। उसने उनसे उस पेड़ के बारे में पूछा। उन्होंने कहा, “वह पेड़ हमेशा एक ही जगह होता है।” उसने कहा, “नहीं। वह बदलता है।” लोग चुप रहे। उनमें से एक ने कहा, “रास्ते नहीं बदलते। जो चलता है, वही बदलता है।”

स्वल्प-वासी ने फिर उस रास्ते पर जाना छोड़ दिया, लेकिन कभी-कभी, जब वह किसी मोड़ पर रुकता, उसे लगता कि कोई पेड़ उसे पहले से जानता है।

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सात

दिन भर चलते रहने के बाद भी स्वल्प-वासी को कोई गाँव, कोई रास्ता, कोई संकेत नहीं मिला। सिर्फ़ धुंध थी। कभी हल्की होती, कभी इतनी गाढ़ी कि उसके हाथ भी उसे साफ़ दिखाई न दें। वह सोचता रहा कि वह रास्ता भटक गया है; लेकिन जितना वह आगे बढ़ता, उतना ही उसे लगता कि रास्ता ख़ुद बदल रहा है, जैसे वह उसी जगह पर घूम रहा हो, पर हर बार कुछ अलग देख रहा हो। शाम ढलते-ढलते, उसे दूर एक आकृति दिखाई दी—एक झोपड़ी, जिसकी खिड़की से हल्की रोशनी आ रही थी। जैसे अलाव जला रखा हो। वह उस ओर बढ़ा, सावधानी से, जैसे डर रहा हो कि कहीं वह दृश्य भी धुंध की तरह ग़ायब न हो जाए।

दरवाज़ा खुला था। अंदर एक रूपसी बैठी थी, अलाव के पास, जैसे वह उसका इंतज़ार कर रही हो। “तुम देर से आए,” उसने कहा। स्वल्प-वासी ने जवाब नहीं दिया; उसे यह समझ नहीं आया कि वह यहाँ कैसे पहुँचा और यह रूपसी उसे क्यों पहचानती है। उसने बस इतना पूछा, “क्या यह रास्ता मुझे नीचे के गाँव तक ले जाएगा?” रूपसी ने उसकी ओर देखा और धीरे से कहा : “अगर तुम वापस जाना चाहते हो, तो सुबह तक रुकना होगा। रात में रास्ते वही नहीं रहते जो दिन में होते हैं।”

स्वल्प-वासी ने वहीं रुकने का निर्णय लिया। वह अलाव के पास बैठ गया। कुछ देर बाद उसे नींद आ गई। या शायद वह सिर्फ़ आँखें मूँदकर बैठा रहा। जब वह जागा, तो सुबह हो चुकी थी।

घर नहीं था। रूपसी नहीं थी। अलाव नहीं था। वह खुले मैदान में खड़ा था। नीचे, बहुत दूर, उसे एक गाँव दिखाई दे रहा था। वह नीचे उतर आया। गाँव पहुँचकर स्वल्प-वासी ने लोगों से पूछा—“क्या यहाँ पास में कोई झोपड़ी है, जहाँ एक रूपसी रहती हो?” लोगों ने सिर हिलाया। “नहीं” उन्होंने कहा, “यहाँ तो कोई नहीं रहता, सिवाय उन कहानियों के, जिनके बारे में हम बात नहीं करते।”

स्वल्प-वासी ने फिर कभी उस जगह को नहीं ढूँढ़ा। बाद में, कई बार, जब धुंध बहुत गहरी होती, उसे लगता कि कोई उसे फिर बुला रहा है। उसे समझ आया कि कुछ रास्ते सिर्फ़ एक बार खुलते हैं, और जो उन्हें पार कर लेता है, वह कभी पूरी तरह वापस नहीं आता।

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आठ

एक कुआँ था जिसे कोई ढकता नहीं था, क्योंकि कहा जाता था कि उसके भीतर पानी नहीं, बल्कि किसी और समय की साँस भरी हुई है। स्वल्प-वासी अक्सर उस कुएँ के पास जाकर झाँकता और अपनी ही आवाज़ को नीचे गिरते हुए देखता, जैसे वह शब्द नहीं, कोई हल्की वस्तु हो। एक दिन उसने धीरे से अपना नाम पुकारा और उसे लगा कि बहुत देर बाद, जब वह लगभग भूल चुका था कि उसने कुछ कहा भी था, नीचे से वही नाम लौटा, पर वह वैसा नहीं था, उसमें थकान थी, जैसे किसी ने उसे बहुत दूर से उठाकर भेजा हो। स्वल्प-वासी घबरा गया, फिर भी उसने दुबारा पुकारा। इस बार कोई उत्तर नहीं आया, केवल धीमी-सी नमी ऊपर उठी, जैसे कोई अदृश्य प्राणी साँस ले रहा हो। सालों बाद, जब वह उस जगह को छोड़कर चला गया, तो उसे कभी-कभी रात में वही नाम सुनाई देता, पर वह समझ नहीं पाता कि वह उसे पुकार रहा है या वह ख़ुद अब भी उस कुएँ के भीतर गिरता चला जा रहा है और तब उसे यह ख़याल आता कि शायद कुछ आवाज़ें कभी बाहर नहीं आतीं, वे केवल जगह बदल लेती हैं, और हम जहाँ भी जाते हैं, वे हमारे भीतर उसी अँधेरे की तरह बनी रहती हैं, जो किसी गहराई को देखने के बाद आँखों में ठहर जाता है।

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नौ

मुहल्ले से थोड़ी दूर, जहाँ हवा अपने ही रास्तों को भूलकर भटकने लगती है, एक घर था जिसकी खिड़कियाँ हमेशा खुली रहती थीं, जैसे वह किसी ऐसे व्यक्ति का इंतज़ार कर रहा हो जो बहुत पहले जा चुका है और फिर भी लौटने की संभावना से मुक्त नहीं हुआ। मुहल्ले के लोग उसके पास से तेज़ी से गुज़रते, क्योंकि उन्हें लगता था कि उस घर की दीवारों में कोई धीमी-सी सुनवाई है, जैसे वह हर क़दम को याद रखता हो, हर आवाज़ को थोड़ी देर तक सँभालकर रखता हो, और फिर धीरे-धीरे उसे अपने भीतर समेट लेता हो। एक बार स्वल्प-वासी, जो अपनी स्मृतियों से थक चुका था, वहाँ ठहर गया। उसने भीतर जाकर एक कुर्सी पर बैठना चाहा, पर जैसे ही उसने दरवाज़ा पार किया, उसे लगा कि वह किसी और के बैठने की जगह पर आ गया है और वह अनचाहा नहीं, बल्कि देर से आया हुआ है। उसने खिड़की से बाहर देखा। उसे लगा कि जो रास्ता वह पार करके आया है, वह अब वैसा नहीं रहा, जैसे घर ने उसे अपने भीतर ले लेने के बदले बाहर की दुनिया को थोड़ा-सा बदल दिया हो। वह उठा और बिना कुछ छुए बाहर आ गया, पर जाते-जाते उसने पीछे मुड़कर देखा और उसे लगा कि घर ने भी उसे देखा है, आँखों से नहीं, बल्कि उस तरह से जैसे कोई प्रतीक्षा किसी चेहरे को पहचान लेती है। बाद में, जब वह अपने जीवन में वापस लौट गया और सब कुछ फिर से वैसा ही हो गया जैसा होना चाहिए था, तब भी कभी-कभी उसे यह अहसास होता कि वह घर अब भी उसका इंतज़ार कर रहा है और यह इंतज़ार किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उन सभी क्षणों का है जो कभी पूरे नहीं हुए, जो किसी खिड़की की तरह खुले रह गए, बिना इस उम्मीद के कि कोई उन्हें बंद करेगा।

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दस

पहाड़ियों के बीच एक झील थी, जिसका पानी इतना शांत था कि उसमें आकाश भी अपनी साँस रोककर उतरता था। उस झील के किनारे स्वल्प-वासी रहता था, जो हर शाम अपने क़दमों को गिनते हुए यह भूल जाता कि उनमें से कौन-सा क़दम वास्तव में उसका है और कौन-सा केवल धुंध की बनाई हुई छवि है। एक रात, जब चाँद पानी के भीतर किसी प्राचीन सिक्के की तरह पड़ा था, उसने देखा कि झील के बीचों-बीच एक रूपसी खड़ी है, पानी उसके घुटनों तक था, पर उसकी आँखों में समुद्र का गहरापन था और उसके बालों में जली हुई घास की गंध थी। उसने स्वल्प-वासी को पुकारा नहीं, फिर भी वह उसकी ओर खिंचता चला गया, जैसे कोई पुराना नाम अपने आप याद आ जाए। जब वह किनारे तक पहुँचा, तो उसने कहा कि वह अपने हृदय को बहुत समय पहले इसी झील में भूल आया है और तब से वह जो भी प्रेम करता है, वह पत्थर की तरह ठंडा हो जाता है। रूपसी मुस्कराई, जैसे वह पहले से यह सब जानती हो और उसने झील के भीतर हाथ डाला, जैसे पानी के नीचे कोई और संसार हो। जब उसने हाथ बाहर निकाला, तो उसकी हथेली में एक चिकना, काला पत्थर था, जो धड़क रहा था, धीमे-धीमे, जैसे किसी सोई हुई स्मृति की धड़कन हो। स्वल्प-वासी ने उसे छूना चाहा, पर रूपसी ने न में सिर हिला दिया और कहा कि जो हृदय बहुत देर तक पानी में पड़ा रहता है, वह फिर शरीर में नहीं लौट सकता, वह केवल कथा बन सकता है। इतना कहकर उसने पत्थर को वापस झील में फेंक दिया। पानी में कोई तरंग नहीं उठी, जैसे कुछ हुआ ही न हो। अगली सुबह किसी ने देखा कि स्वल्प-वासी अपने घर के बाहर बैठा है, उसकी आँखें खुली हैं, पर उनमें कोई प्रतिबिंब नहीं है। उसकी छाती में जहाँ हृदय होना चाहिए था, वहाँ केवल ठंडी शांति है, जैसे पत्थर की नींद और तब से हर साल, उसी रात, झील के ऊपर मद्धिम धड़कन सुनाई देती है, जैसे कोई स्मृति अब भी शब्द बनकर लौटने का रास्ता खोज रही हो। मानो उसी मद्धिम धड़कन में कोई शब्द रात की उस लंबी गुज़र को बुलाता है, जिसके दूसरे सिरे पर रोशनी है। कोई नमी बुलाता है, कोई ख़ामोशी। हर शब्द में एक दुनिया है। सिर्फ़ नाम नहीं, बल्कि एक पूरी कल्पना, रंग और महक भी। जैसे सब मिलकर आख़िरी सफ़र की अपनी-अपनी तस्वीर बना रहे हों—कोई उसे मरुस्थल में देखता है, कोई नम मिट्टी में, कोई पत्थर की ख़ामोशी में। आख़िरी सफ़र के लिए सोच लेना भी अच्छा है, लेकिन जीते जी उस कोष्ठक को बंद कर देने वाला शब्द भी होगा जो जन्म के वक़्त खुला था।

अब स्वल्प-वासी वही शब्द बन जाना चाहता है।

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ग्यारह

क्या इत्तिफ़ाक़ तक़दीर का दूसरा नाम है? दोनों आते हैं बिना बुलाए। दोनों मिलाते हैं उन्हें जो मिलने के लिए नहीं बने थे। एक शब्द दूसरे को खींचता है, जैसे एक मुलाक़ात दूसरी मुलाक़ात को। इस खिंचाव में क्या छिपा है? तक़दीर? जो नहीं दिखता वह इत्तिफ़ाक़ है, उस जगह ले जाता है, जहाँ स्वल्प-वासी को होना था। यह इत्तिफ़ाक़ कहाँ से आता है जो उसे पूरी दुनिया दे देता है? कहाँ से जन्म लेती है यह आँख जो इत्तिफ़ाक़ और तक़दीर को एक साथ देख लेती है? सब ओर संकेत करती है। कभी त्रास देती है, कभी त्राण। हर रिश्ते के पीछे अनाम खिलती है। वह अदृश्य क्यों है, अथाह।

यह कौन-सा आवरण है, स्वल्प-वासी को सबसे बाँधे रखता है। बाहर से छाल की तरह कठोर, अंदर की नर्मियत को छुपाए हुए। हरेक के लिए अपना एक निजी आवरण जबकि स्वल्प-वासी सहित सब एक ही नहीं, अनेक हैं : हो सकता है कि तक़दीर वह राह हो जो जीवन के भीतर से आकार लेती है और इत्तिफ़ाक़ रिश्तों की बनावट हो। हर रिश्ता इत्तिफ़ाक़ और तक़दीर के बीच एक संधि है। वह साँस की भांति भीतर आता है और बाहर जाता है : यही छोटा-सा चक्र ज़िंदा रखता है।

और आँख वही है जो सबसे गहरी रात में भी पूरी तरह बुझती नहीं : लौ।

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बारह

वह खड़ा है झरती ओस में। स्वल्प-वासी के सपने में, झरती ओस में। एक दोस्त और उनका दाढ़ीदार गुरु, अपना चोगा पहने, ओस में। उनका शांत गुरु और दोस्त का चेहरा। उसके अशांत शब्द। उनकी शांत आँखें और उसका गंजा सिर। सिर पर रजत झलक—सफ़ेद और काले का विरल मिलाप।

झरती ओस। नश्वर, नरम ओस। दूर नहीं, बग़ीची की दूब पर।

सवेरे की पगवट ओस में नहा ली है, क्यारियाँ ओस से पौधों को सींचने में तल्लीन हैं, फूलों के चेहरे ओस से तर अपने में खिले हैं। नश्वर, नरम ओस लगातार, ऊपर से। हल्की हवा, सवेरे में बहती विभोर है।

यहाँ सब मौन है। शीतल ओस में पगवट पर कोई स्वर नहीं, जब वह और तेज़ होती जाती है। परिसर से बाहर क्या है? कुछ नहीं, ऐसा लगता है। बाहर कुछ है, लेकिन वह दोस्त का रहस्य है—गहरे छिपा हुआ। वह कभी-कभी काँपता है और ओस और हवा के बहाव को महसूस करता है। वह जानता है, ज़रूर जानता है कि वहाँ क्या होना चाहिए—लेकिन जब तुम गुरु के साथ हो, या आधे शिष्य, तो बहुत अलग चीज़ें कल्पना में आती हैं—बहुत अलग, जब तुम किसी अभूले गुरु के साथ हो, जागती-भीगती बग़ीची के बीच, और एक दोस्त के सपने में जो होनी जितना अनहोना है।

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तेरह

ईंट का मुँह, जो बंद है, क्या वह इस ईंट-निवास के बारे में सच बताएगा, या यहाँ भी, जैसे हर जगह, चुप रहेगा? स्वल्प-वासी यहाँ ऊपर से तब तक नीचे उतरता रहेगा जब तक अंततः ईंट के भीतर नहीं चला जाता और वहाँ खड़ा नहीं हो जाता, मानो बंद कर दिया गया हो। एक मुँह जिसे मुक्ति नहीं। हो सकता है तब दूसरे आएँ, न जाने किस वार से घायल होकर।

स्वल्प-वासी ईंट के भीतर बिना मुँह के खड़ा है, जबकि दूसरे आते-जाते रहे। उन्होंने अपना सवाल पूछा और चले गए।

क्या कुछ और है?

नहीं, नींव का मालूम नहीं। वह ईंट में केवल ख़ुद को देखता है। वहाँ सब कुछ बंद है, फिर भी ईंट में ख़ुद को ठीक वैसा देखता है जैसा बनाया गया था और धड़कते दिल से जल्दी से अपनी जान छुड़ाकर निकल जाना चाहता है।

ईंट मज़बूत है, फिर भी गहरे संकट में है।

देर हो चुकी है, बंद ईंट-मुँहो। स्वल्प-वासी का मतलब समय में देर से नहीं है; नींव से है जो शायद कभी थी ही नहीं।

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चौदह

बग़ीची को अगोरता हुआ स्वल्प-वासी यूँ आया मानो जगह ने अपने भीतर से ही उसे समो लेना चाहा हो। हवा में अँजोर है, पर उजाला अभी पूरा नहीं खुला। भोर में नमी है, जो नज़र में महीन काँप पैदा करती है। महसूस होता है कि भीगापन भी दिन को खोल देता है; अपने ही भूले हुए रास्ते की टोह लेता है।

बग़ीची की मिट्टी की दरारों में पुराना जमाव है। आसमान की तरफ़ देखने पर उजाला चटका हुआ दिखता है, और पाँव तले ठोस ज़मीन। थरथराहट। स्वल्प-वासी की चाल फँस जाती है, जैसे चलना ही उस फाँक को नापना हो। पेड़ों की छायाएँ टुकड़ों में बिखरी हैं, पत्तों के नीचे अँधेरे के छोटे-छोटे थक्के। जहाँ जड़ों का उलझाव है, वहाँ हल्की-सी तपन है। ऊपर से देखने पर कुछ नहीं दिखता, पर तलवों में गरमाहट लगातार चढ़ती है। वह रुकता है, मिट्टी को अँगूठे से कुरेदता है। सूखी परत हटती है, नीचे गाढ़ा, गुमसुम रंग। उस गुमसुम में धीमी आँच चल रही है—ज़मीन की कोख में सुलगती हुई आग। लौ नहीं, धुआँ नहीं, भीतर पकता हुआ ताप। वह मिट्टी को वापस ढक देता है, पर वह ताप अब उसकी उँगलियों में रह जाता है।

स्वल्प-वासी का हाथ एक पेड़ की देह पर टिकता है। वह छाल पर उँगलियाँ फेरता है—खुरदर, चिरा हुआ, कहीं राख का-सा स्पर्श। यह पेड़ है या किसी वाक्य का बचा हुआ ढाँचा है, जिसमें अर्थ जल चुका है, पर स्वर अब भी अटका है? वह हथेली टिकाकर सुनने की कोशिश करता है, तो उसी अटक में सुनाई देता है—“मुझे अनजान की आग से पोषण मिलता है”। वह चौंकता नहीं; जैसे यह वाक्य उसका अपना हो। पेड़ के खड़े रहने की वजह मिट्टी के ऊपर नहीं, नीचे कहीं है। स्वल्प-वासी हथेली हटाता है; उँगलियों पर महीन धूल चिपकी रहती है।

जहाँ वह चलता है, वहीं एक हल्की रेखा उभरती है; पीछे मुड़कर देखने पर वह रेखा पहले ही धुँधली हो चुकी होती है। वह जानता है कि यह रास्ता भी आकाश में घुल जाएगा। मिट्टी बराबर होती रहती है, मानो किसी ने अभी-अभी उसे समतल किया हो। शुरू दिन के बीच में भी अँधेरा है। स्वल्प-वासी उस अँधेरे को टालता नहीं; वह उसी में अपना पाँव रखता है। पीछे मुड़कर नहीं देखता; देखने से जो बचता है, वही उसका रास्ता है। फ़िलहाल। वह जानता है कि फ़िलहाल का फूल कभी मुरझाता नहीं।

धूप ऊपर चढ़ती है। तीखी नहीं, पर सीधी। पत्तियों के बीच से गिरती धूप के टुकड़े मिट्टी पर पड़ते ही बुझते नहीं, धँस जाते हैं। जहाँ धूप है, वहीं एक और गाढ़ापन उपस आता है। यहाँ रोशनी और अँधेरा एक ही शरीर के दो छोर नहीं, एक ही तप्त-परिष्कृत गाढ़ेपन की दो परतें हैं। स्वल्प-वासी की साँस उस गाढ़ेपन में लीन होने लगती है, पर वह रुकता नहीं। कुएँ के पास पहुँचकर झुकता है। गोल घेरा, भीतर गहराई, पर पानी की चमक नहीं। रस्सी हिलती है, बाल्टी किनारे से टकराकर धीमी-सी ठनक देती है। भीतर देखने पर चेहरा नहीं, साफ़ ख़ालीपन लौटता है—दरवाज़े की तरह एक ख़ाली नज़र। वह उस नज़र को थामने की कोशिश नहीं करता। उठ खड़ा होता है। गर्दन के पीछे हल्की सिहरन रह जाती है। क्या वह ख़ुद को नकारता है? नकार में टूटन नहीं, ढील है; जैसे कोई गाँठ अपने आप खुल जाए। वह अपने ही आकार से थोड़ा बाहर खिसकता है। छाया साथ चलती है, निर्बंध होने लगती है।

चलते-चलते स्वल्प-वासी को लगता है कि उसकी सीमाएँ टिक नहीं रहीं। पाँव जहाँ पड़ता है, वहाँ मिट्टी अलग नहीं रहती; दोनों का स्पर्श एक ही बनावट में बदल जाता है। फैलाव हर तरफ़ खुलता है, हथेली की रेखाओं-सा उलझा हुआ—रेखाएँ हर जगह फूट पड़ती हैं। वह अब एक आकृति नहीं, बहाव है जो बग़ीची की बनावट में शामिल हो रहा है।

बग़ीची उसके भीतर है, वह बग़ीची के भीतर।

दोपहर का ताप चढ़ता है। छायाएँ सिमटकर पत्तियों के नीचे चिपक जाती हैं। वह हवा को अपना बहाव उधार देता है। हवा उसके शरीर से होकर गुज़रती है; जकड़ और छोड़े जाने के बीच का फ़र्क़ मिट जाता है। बग़ीची का सब एक ही फैलाव में बदल जाता है—मिट्टी, पेड़, हवा, ताप। उस फैलाव में वह नाम के बिना रहने लगता है। उसकी चाल रह जाती है, शरीर हल्का हो जाता है, आवाज़ कहीं पीछे छूट जाती है। जो बचता है, वह लगातार बदलता संतुलन है, जैसे ठहरना नहीं, बल्कि लगातार बदलते रहना ही उसका एकमात्र ठिकाना हो। ऐसे बग़ीची स्वल्प-वासी के साथ घटती है, जो अब पहचान से बाहर हो चुका है।

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पंद्रह

स्वल्प-वासी अस्वस्थ था। यह अचानक नहीं हुआ था; धीरे-धीरे बढ़ा था, जैसे कोई चीज़ भीतर से अपनी जगह बनाती है। उसने घर से बाहर जाना छोड़ दिया और अपने कक्ष में ही रहने लगा। एक छाया आती, थोड़ी देर बैठती फिर चली जाती। बात कम होती थी। जो कुछ कहना था, वह पहले ही कहा जा चुका था। वह मितभाषी था। कभी-कभी छाया को पहचान लेता, कभी केवल आँखें खोलकर देखता, जैसे यह जानना चाहता हो कि वह कहाँ है। फिर आँखें बंद कर लेता।

एक दिन, दोपहर के समय, जब बाहर धूप थी और घर के भीतर हल्की छाया, उसकी साँस कुछ बदल गई। यह बदलाव बहुत छोटा था, इतना कि न उसने ध्यान दिया न छाया ने। उसकी साँस अब पहले जैसी नहीं थी। वह थोड़ी-थोड़ी रुकती, फिर चलती। जैसे कोई लय टूट रही हो, पर पूरी तरह नहीं। छाया ने स्वल्प-वासी का नाम लिया। उसने आँखें खोलीं, थोड़ी देर के लिए। ऐसा लगा कि वह देख रहा है, पर यह साफ़ नहीं था कि वह किसे देख रहा है। उसने आँखें बंद कर लीं। एक क्षण आता है—बहुत छोटा, पर पूरा। उस क्षण में साँस नहीं लौटती। छाया को यह कहने में समय नहीं लगा कि वह चला गया है। वह उन दूसरों की तरह नहीं थी जो पहले केवल देखते हैं, जैसे यह सुनिश्चित करना चाहते हों कि यह वही है, जो वे समझ रहे हैं। फिर एक और क्षण आता है जब छाया अपने से कहती है, “हो गया।” यह वाक्य छोटा है; उसमें कोई विशेष शब्द नहीं है। पर वही पर्याप्त है।

छाया धीरे-धीरे हटने लगती है। खिड़की खोलती है। बाहर की हवा भीतर आती है। कमरे में सब कुछ वैसा ही है—बिस्तर, कुर्सी, दीवारें। केवल वह नहीं है। पर “न होना” भी तुरंत ख़ाली नहीं होता। कुछ देर तक, ऐसा लगता है कि वह अभी भी वहीं है, जैसे उसकी उपस्थिति पूरी तरह गई नहीं, केवल बदल गई है। शाम तक, घर में छाया फैली रहती है। बीच-बीच में, हल्का-सा विराम आता है, जैसे कोई चीज़ याद आ गई हो, बिना नाम के। वह विराम, कुछ समय तक, उस घर में बना रहता है। जब तक कि स्वल्प-वासी उठकर बैठ नहीं जाता, यह देखने के लिए कि छाया है या चली गई है। इस बार हमेशा के लिए।

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सोलह

स्वल्प-वासी उस सही पल की ताक में है जो मिज़ाज के मौसम पर टिका है। रस्सियों में गाँठें लगाना उसकी याददाश्त का सहारा हैं, अपनी तरह का अलिफ़-बे। कभी लगता है कि वह उस पिघले हुए काँच जैसा है जो अभी शक्ल लेने की कगार पर है। पानी में घुलते साबुन जैसा, हवा में उड़ते बुलबुले जैसा। अजीब ज़िंदगी है—हर ओर इंतज़ार। उस पल का इंतज़ार जब टूटकर नहीं, अपने आप अटूट निकलेगा, बिना किसी कोशिश के। तब तक ताक में है—

देखता
तक्षक

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सत्रह

अंत घुलना है, सब कुछ एक-दूसरे में गलता हुआ, मानो हर चीज़ अपने अंतिम रूप में पहुँचकर स्वयं को छोड़ देती हो। यहाँ पकड़ने की कोई कोशिश नहीं है। जो है, उसे रहने देना है। जो नहीं है, वह जगह बनाए रखना है। प्रवेश और प्रस्थान का भेद समाप्त होने देना है। कोई आता है, कोई जाता है। क्या आना-जाना घटनाएँ हैं या वे हल्की-सी तरंगें हैं, जो उठती हैं और स्वयं ही शांत हो जाती हैं? यहीं नहीं, बल्कि यहीं से, शुरू होना है—

फिर से
घुलते हुए।

~

अठारह

अब कोई परदा नहीं है।

पहले दो नदियाँ एक-दूसरे से मिल न सकीं क्योंकि बीच में भँवर था। अब न नदी है, न भँवर। शांत पानी है, जिसमें स्वल्प-वासी की आवाज़ गूँजती है, और कोई जवाब नहीं देता।

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