प्रतिउत्तर : ‘रोएँगे हम हज़ार बार...’
रविंद्र कुमार
23 जून 2026
प्रिय रचित,
मैंने आपकी इम्तियाज़ अली की फ़िल्म ‘मैं वापस आऊँगा’ पर लिखी दर्शक-समीक्षा पढ़ी। वह वीडियो भी देखा जिसमें एक लड़की रोते हुए अपना वीडियो रिकॉर्ड कर रही थी, जिसे बाद में उसने फ़ेसबुक पर साझा किया था। मैंने उस वीडियो पर ‘लव रिएक्ट’ किया था। जिस समय यह सब हो रहा था, मैं आसमान में पैंतीस हज़ार फीट की ऊँचाई पर उड़ते हुए ब्रिटिश एयरवेज़ के एक विमान में बैठा था। संयोग देखिए कि इसे पढ़ने से कुछ घंटे पहले मैं ख़ुद फूट-फूटकर रो रहा था।
मेरी यह उड़ान दस घंटे की थी। समय काटने के लिए मैंने भी वही किया जो ज़्यादातर लोग करते हैं—फ़िल्म देखना शुरू किया। ब्रिटिश एयरवेज़ वाले अपनी इकॉनमी क्लास की सीटों की तरह फ़िल्मों का कलेक्शन भी बहुत सीमित रखते हैं। उन्हीं में से मैंने गिप्पी ग्रेवाल निर्देशित फ़िल्म ‘अकाल’ चुनी। महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद के दौर पर बनी इस फ़िल्म में जब मैंने लीड हीरोइन (जो एक माँ और योद्धा का किरदार भी निभा रही थी) को मुख्य विलेन के हाथों कटते हुए देखा और उसके बेटे की चीख़ सुनी, तो मेरे अंदर का मनोविज्ञान और मेरी सारी अकादमिक समझ छूमंतर हो गई। यह जानते हुए भी कि यह केवल एक कहानी है, महज़ अभिनय है, मेरा गला रुँध गया। जैसा कि हमारी हरियाणवी में कहते हैं, मैं मोर की तरह ‘टेल-टेल’ आँसू गिरा रहा था। उस वक़्त मेरे ज़ेहन में मौत का ख़ौफ़ था, परिवार के छिन जाने का डर था और अपनी पत्नी निशा से दुबारा मिलने की बेचैनी थी। वह रोना मेरा नितांत एकांत का अनुभव था।
मुझे लगा कि इस विषय पर मुझे भी अपनी बात कहनी चाहिए, क्योंकि मैं भी ख़ुद को उन्हीं क़तारों में खड़ा पाता हूँ जिन्हें आपने बड़ी ही आसानी से ‘ऑनलाइन भिखारी’, ‘अधपगले’ और ‘लघु मानव’ कहकर ख़ारिज कर दिया है। दरअस्ल, आपकी यह ‘दर्शक-समीक्षा’ एक बौद्धिक अहंकार का शानदार, लेकिन संवेदनहीन नमूना है। आप इंसानों को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं; जबकि असल समस्या उस तंत्र में है, जिसने मानवीय भावनाओं की संरचना को ही हाईजैक कर लिया है।
मानव-मनोविज्ञान का एक बुनियादी उसूल है कि इंसान एक सामाजिक प्राणी है। विकासवाद के शुरुआती दौर से ही हम अपने दुख, अपने आँसू और अपने संत्रास को सामूहिक रूप से जीते आए हैं—चाहे वह किसी अलाव के चारों ओर बैठकर रोना हो या यूनानी नाटकों का ‘कैथार्सिस’। सदियों से मनुष्य ने अपना दुख बाँटने के लिए एक ‘सामूहिक स्पेस’ तलाशा है। आज के इस बेहद अकेले, दमघोंटू और ईर्ष्यालु समाज में वह वास्तविक स्पेस छिन गया है। आज की पीढ़ी के पास अपनी भावनाओं को साझा करने के लिए सिर्फ़ छह इंच की एक स्क्रीन बची है।
यह वैलिडेशन की ओछी भूख नहीं, ‘कनेक्शन’ की बुनियादी इंसानी छटपटाहट है। आप जिसे ‘तमाशा’ कह रहे हैं, वह दरअस्ल उनका अकेलापन है... जिसे आप पढ़ नहीं पाए।
दोष इन कमज़ोर इंसानों का नहीं है। कुछ दोष सिलिकॉन वैली की उन क्रूर तकनीकी कंपनियों और उनके बनाए एल्गोरिदम का है, जिन्होंने इस इंसानी छटपटाहट को एक ‘प्रोडक्ट’ बना दिया है। इन प्लेटफ़ॉर्म्स ने पूरी एक पीढ़ी के न्यूरोलॉजिकल सिस्टम को इस तरह प्रोग्राम कर दिया है कि उन्हें लगने लगा है कि कोई भी भावना तभी सच है, जब उसे डिजिटली दर्ज किया जाए। उन्होंने सहानुभूति माँगने की मानवीय फ़ितरत का बाज़ारीकरण कर दिया है। बाक़ी का दोष हमारे इस महान् हिंदुस्तानी समाज का है, जो हद दर्जे का असंवेदनशील, ग़ैर-बराबरी वाला, ईर्ष्यालु और कुछ हद तक आत्ममुग्ध है। आप इस विमर्श में उन यूज़र्स पर अपना ग़ुस्सा और व्यंग्य उतार रहे हैं जो ख़ुद इस क्रूर मशीनरी के शिकार हैं।
अगर आप थोड़ा गहराई से सोचें और चमड़ी की एक परत और उतारकर देखें, तो आपका यह लेख भी उसी ‘परफ़ॉर्मेटिव-एक्ट’ का हिस्सा है, जिसकी आप इतनी तीखी आलोचना कर रहे हैं। वे युवा सोशल मीडिया पर अपनी ‘कमज़ोरी’ परफ़ॉर्म कर रहे हैं, और आप फ़ेसबुक पर उनके ख़िलाफ़ लिखकर अपनी ‘बौद्धिक श्रेष्ठता’ परफ़ॉर्म कर रहे हैं। आपने ख़ुद लिखा है कि फ़ेसबुक पर किसी (विशेषकर महिला) के ख़िलाफ़ लिखने से रात के बारह बजे भी ठीक-ठाक लाइक मिल जाते हैं। आपको भी तो अपनी इस ‘प्रवृत्ति-समीक्षा’ पर अपनी फ़ेसबुक-बिरादरी से वाहवाही और कमेंट्स का ही इंतिज़ार होगा (हाँ, अगर आप कोई अवतार पुरुष हैं तो बात अलग है)। तो फिर मनोविज्ञान के नज़रिए से आपके और उनके ‘कंटेंट’ में फ़र्क़ ही क्या बचा? दोनों ही उसी ‘लाइक इकॉनमी’ के प्यादे हैं। बस आपका तरीक़ा थोड़ा कुलीन और तथाकथित साहित्यिक है, जिससे मैं सहमत नहीं हूँ।
एक आख़िरी बात और जोड़ना चाहूँगा। मैं भी लंबे समय से फ़ेसबुक पर हूँ और वहाँ होने वाले लफड़ों से परिचित रहता हूँ। इन बहसों में नायक की भूमिका में लगभग हमेशा उत्तर भारतीय, आत्ममुग्ध सवर्ण पुरुष (या महिलाएँ, जो 99.99% सवर्ण ही होती हैं) होते हैं। कुछ लोग इन्हीं वर्गों से प्रति-नायक की भूमिका निभाते हैं और बाक़ी दर्शक-दीर्घा में बैठकर लाइक-कमेंट कर रहे होते हैं। मैंने पिछले कई सालों से नोटिस किया है कि उत्तर भारतीय हिंदी भाषी सवर्णों के लिए किसी को भी ‘क्रिंज’ या ‘छपरी’ कहकर ख़ारिज कर देना बहुत आम बात हो गई है। जब गाँव-देहात का कोई लड़का या लड़की—जिनमें से अधिकतर हाशिए के वर्गों से आते हैं; जिनके पास एलीट यूनिवर्सिटी की तालीम नहीं है, न ही बाप-दादा की छोड़ी ज़मीन-जाइदाद या सांस्कृतिक पूँजी है और जो नीत्शे, वाल्मीकि, फूको या देरिदा के नाम नहीं उछाल सकते—इंटरनेट पर आता है, तो उसका सौंदर्यबोध अलग क़िस्म का होता है...
वो शेर बैरागी हो, डॉली चायवाला हो या मुँह पर मिर्ची और गारा पोतकर उछल-कूद करने वाले युवा हों; वे अटेंशन और कुछ आमदनी दोनों की तलाश में हैं। कुछ लोग रोते हुए ख़ुद को रिकॉर्ड करके अभिव्यक्त करते हैं, तो कुछ अनगढ़ कविताएँ लिखकर। इसमें बुराई भी क्या है? हिंदी साहित्य के घनघोर जातिवादी और प्रतिगामी सवर्ण पुरुषों की उन कविताओं को, जिनका कोई सिर-पैर नहीं होता और जिनमें केवल शब्दों का आडंबर भरा होता है, अगर ‘सदी की महानतम कविता’ कहा जा सकता है, तो किसी आम आदमी की अनगढ़ अभिव्यक्ति को अच्छी कविता क्यों नहीं कहा जा सकता? ख़ैर, यह एक अलग बहस है।
नीत्शे और वाल्मीकि का नाम लेकर दूसरों की भावनाओं को बौना साबित करना बहुत आसान है। लेकिन एक आम इंसान के मनोविज्ञान को भी समझना चाहिए, जो एक भयानक अकेलेपन और इस भारतीय समाज की विद्रूपताओं का शिकार है। रोना वाक़ई एक गहरा अनुभव है, लेकिन हर किसी के पास उस रोने को महान् साहित्य में बदल देने की क्षमता या विलासिता नहीं होती। न ही उनकी इतनी पहुँच होती है कि हिंदी का कोई प्रतिष्ठित ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म उन्हें छाप दे। ऐसे में कुछ लोग बस रोकर, चीख़कर या दहाड़कर अपनी बात कह देना चाहते हैं।
इसलिए अगली बार जब कोई रोता हुआ वीडियो दिखे तो उन इंसानों को ज़लील करने या उन पर तरस खाने के बजाय, हमें थोड़ी सहानुभूति के साथ सिक्के के इस पहलू को भी देखना चाहिए।
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पुनश्च : यह भी एक नितांत परफ़ॉर्मेटिव-एक्ट है और उसी लाइक-कमेंट-इकॉनमी का हिस्सा है।
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