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मेरी पहली जेल-यात्रा

जीवन के पेच-ओ-ख़म इतने जटिल होते हैं कि हर बार कविता, कहानी या किरदार आपको बचा नहीं पाता है। ऐसे ही आप समाज के भीतर से हाशिए की ओर जाते हैं; हाशिए से भीतर आते हैं, ताकि अपनी ओर की यात्रा में उकताहट कम से कमतर हो सके। जीवन में जटिलता हमेशा बनी ही रहती है, कभी मन कभी अक़्ल कभी शरीर कमज़ोर होता है तो छटपटाहट अंदरून पर हावी हो जाती है और मैं अपने रोज़मर्रा से कहीं भागने के लिए कुछ न कुछ करती रहती हूँ।

ये उन दिनों की बातें हैं; जब मैं कुछ युवा थी और मेरी मुलाक़ात राकेश एंड गैंग से हुई, जो समाज-सुधार के नाम पर काम कर रहे थे। वे अपने अंदरूनी को साधने के लिए इंडिया गेट पर रह रहे भिखारियों से बातें करके उनकी समस्याएँ समझना और उनके निवारण के लिए कुछ करना चाहते थे। हमारी शुरुआती टीम में छह लोग थे—तीन स्त्रियाँ और तीन पुरुष। एक लड़की जर्मनी की थी, जेसिका। राकेश एंड टीम के साथ मैंने वॉलंटियर के रूप में तक़रीबन पाँच-छह साल काम किया। इसी दौरान समाज के हाशिए पर रहने वाले लोगों की रोज़मर्रा की परेशानियों से पाला पड़ा और यह समझने का मौक़ा मिला कि उनकी ज़िंदगी किन मुश्किलों से घिरी हुई है।

बचपन से ही हारी-बीमारी और लाचारी को अपने आस-पास यूँ पसरा देखा कि जब कभी टेलीविज़न या अख़बार में किसी सेलिब्रिटी को यह कहते सुनती कि वे बचपन में लौटना चाहते हैं, तो मैं सवालिया निशान लिए सोच में डूब जाती कि आख़िर कोई अपने बचपन में कैसे लौटना चाहता है? क्या इनका बचपन अलग रहा होगा? बचपन को कोई वापस कैसे बुलाना चाहता है?

मैं दुनिया की सबसे बड़ी ताक़त से कहती कि मुझे मेरा बचपन कभी मत लौटाना। मैं बस आगे बढ़ना चाहती हूँ। कम-से-कम अपना बचपन और टीन एज तो कभी नहीं चाहती—वह अपमान, लोगों की हेय दृष्टि, ख़ामियों से भरे वे दिन, जो रातों को और भारी बना देते थे। हर रात अपने भीतर हज़ार रातें समेटे आती थी। सुबह बदन की टूटन से भी बदतर माँ का चेहरा होता था। सूदख़ोर सुबह की चाय से पहले आकर धमकाता था, जिसके बाद रस-पापे निगलने में भी तकलीफ़ होती थी। हलक़ में गाँठें बचपन से ही पड़ने लगी थीं।

तेरह की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते कई अजीब दैहिक और ज़हनी बीमारियाँ मुझे भीतर से खाने लगी थीं। मुझे अपना बचपन या टीन एज कभी वापस नहीं चाहिए। शायद अपने बचपन-नौउम्री या पिता-रिश्तेदारों से भागते-भागते मैंने पढ़ाई-नौकरी-साहित्य-समाज-सेवा बहुत बेहतर तरीक़े से की। सन् 2010-2011 के आस-पास फ़रीदाबाद के लीसंग जर्मन इंस्टीट्यूट-पब्लिकेशन में नौकरी पाई, जिसमें जीवा आयुर्वेद के साथ मिलकर अलग काम भी किए। एक दफ़ा लीसंग में एक सरकारी प्रोजेक्ट आया कि जुवेनाइल जेल में जाकर तीन से सात दिन की ट्रेनिंग करनी है। 15 अगस्त के उपलक्ष्य में सरकार जेल के लिए कुछ-कुछ प्रोजेक्ट देती है। लीसंग प्रकाशन रंगमंच-प्रकाशन-शिक्षा और समाज सुधार के लिए काम करता आ रहा था। मुझे बॉस ने बताया तो मैंने उत्साहित होकर कहा कि मैं इस काम में आपके साथ रहूँगी, कुछ नया पता चलेगा। जेल पर डिस्कवरी पर ही कुछेक लंबी सीरीज़ देखी थी, लेकिन अस्ल में जेल में जीवन कैसा होता है, यह जानने का यह एक अच्छा मौक़ा हो सकता था।

अगस्त के पहले हफ़्ते की एक शाम हम फ़रीदाबाद के नीलम चौक की सड़क पर एक जगह रुके। इस सड़क पर मैं बरसों से न जाने कितनी बार आई-गई थी, लेकिन कभी ग़ौर नहीं किया था कि यहाँ जेल भी है। विशालकाय काले दरवाज़े में एक छोटी-सी खिड़की खुली। मेरे बॉस ने कुछ काग़ज़ दिखाए। हमें दरवाज़े पर कुछ देर खड़े रहने के लिए कहा गया। कुछ मिनट बाद दरवाज़े में से एक छोटा-सा रास्ता खुला और हम अंदर आए। सामने एक और बड़ा काला दरवाज़ा खड़ा था। दोनों दरवाज़ों के बीच आठ से दस फ़ीट का फ़ासला रहा होगा।

सिपाही ने मुझे देखकर कहा, “मैडम, सँभलकर रहिएगा। इस जेल में सिर्फ़ लड़के हैं। थोड़ा ज़्यादा सतर्क रहिएगा। अकेले इधर-उधर मत जाइएगा। समझाना हमारा काम है, समझना आपकी मर्ज़ी।”

मैंने जिस उत्साह में ‘हाँ’ कहा था, वह इन दो दरवाज़ों के बीच ही फुर्र हो चुका था। मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा था और धड़कन बेक़ाबू होती जा रही थी। अपनी नज़रों में मैं ख़ुद को बहुत निडर, दबंग और ऐसी-तैसी करने वाली मानती थी; लेकिन जब अनुभव सामने आ खड़ा होता है, तो घुटने दमहीन हो जाते हैं और पटर-पटर बोलने में माहिर हलक़ पर अकाल पड़ जाता है।

हमारे सामान वाले बैग की तलाशी हुई। इसके बाद अगला दरवाज़ा खोला गया और हमें जेल में दाख़िल होने का सुनहरा मौक़ा मिला। ‘सुनहरा’ आज लिख रही हूँ, उस समय तो मेरे पैर बाहर की ओर भागने को आमादा थे।

जेलर के ऑफ़िस तक पहुँचने के रास्ते में एक बड़ा कमरा दिखाई दिया, जहाँ चूल्हा जल रहा था और काफ़ी सारे जवान लड़के काम कर रहे थे। मैंने पूछा, “यह क्या है?”

सिपाही साहब ने बताया, “यह रसोई है। क़ैदी लोग खाना बना रहे हैं।”

मैंने हैरत से पूछा, “क़ैदी ही खाना बनाते हैं?”

उन्होंने कहा, “हाँ, जेल का सारा काम क़ैदी ही करते हैं। खाना, सफ़ाई, बर्तन, कपड़े और बाक़ी सारे काम। इनके लिए नौकर थोड़े ही लगाएँगे!” और वह हँस दिए।

कुछ दूर चलने के बाद हमें जेलर के ऑफ़िस में ले जाकर बैठा दिया गया। रास्ता मेरी समझ से परे था।

जेलर साहब आए। हमारे काग़ज़ चेक करते हुए उन्होंने चाय-पानी के लिए किसी को इशारा किया। स्टील के तीन गिलासों में पानी और चीनी, कप-तश्तरी में चाय लेकर एक पंद्रह-सोलह साल का लड़का अंदर आया। उसने हम सभी को नमस्ते की और खड़ा हो गया।

जेलर साहब ने उससे कहा, “ये लोग आए हैं। तुम सभी को इन्फ़ॉर्म करो। चाय पीकर हम राउंड पर आएँगे और सभी से इन्हें मिलवाएँगे।”

वह लड़का बोला, “साहब, ये लोग आए किसलिए हैं?”

जेलर साहब ने बताया, “सरकारी प्रोजेक्ट है। तुम लोगों के लिए कुछ वर्कशॉप करनी है। क्या करनी है, कैसे करनी है... ये लोग तुमसे मिलकर तय करेंगे। सबको बोलना कि थोड़ी देर में ग्राउंड में मिलें।”

वह लड़का काफ़ी ख़ुश हो गया। मैंने उसे देखा तो वह मुझे ही देख रहा था। हम दोनों ही एक-दूसरे को घूरकर देखना चाह रहे थे, लेकिन अकबकाकर दोनों ने ही नज़रें एक-दूसरे से हटा लीं। वह लड़का हल्के-हल्के फुदकता हुआ बाहर की ओर निकल गया।

मैंने जेलर साहब से पूछा, “यह चाय इसी ने बनाई है?”

उन्होंने कहा, “हाँ, बहुत बढ़िया चाय बनाता है।”

मेरा दिल पहले से ही डाँवाडोल था, अब दिमाग़ ने भी तेज़ गति पकड़ ली थी। कहीं इसने चाय में कुछ मिला तो नहीं दिया होगा? जेलर-क़ैदी, किसी का क्या भरोसा! घर पर किसी को बताकर नहीं आई थी कि कहाँ जा रही हूँ। अगर यहाँ से घर नहीं लौटी, तो घरवालों को पता भी नहीं चल पाएगा कि लड़की आख़िर गई कहाँ! कल कहीं से ख़बर भी लगी तो घरवाले यह पचाएँगे कैसे कि लड़की जेल में थी?

हलक़ की नली आपस में चिपक जाने तक सूख चुकी थी। मन किया कि गटगट पानी पीकर आत्मा को शांत करूँ, लेकिन मुस्कुराकर मना कर दिया, “अभी इच्छा नहीं है। थोड़ी देर में ले लूँगी। आप लोग शुरू करें।”

चाय निपटाकर हम ग्राउंड की ओर चल दिए। रास्ते में कुछेक सिपाही इधर-उधर दिखाई दिए। तक़रीबन डेढ़-दो सौ मीटर चलने के बाद एक खुले मैदान में काफ़ी बच्चे और युवा बैठे हुए दिखाई देने लगे। दृश्य कुछ ऐसा था, जैसे हमारे स्कूल के मैदान में प्रार्थना के दौरान बच्चों को ज़मीन पर बैठाया जाता था। सभी क़ैदी क़तारों में बैठे थे और सामने तीन-चार कुर्सियाँ लगी थीं।

मैंने सबसे कोने वाली सीट पकड़ी और बैठ गई।

जेलर साहब और मेरे बॉस ने बोलना शुरू किया, “सरकार आप लोगों के विकास के लिए काम कर रही है। ये लोग आपसे बात करके कुछ कार्यक्रम करेंगे, कुछ ट्रेनिंग देंगे। आप लोगों को क्या अच्छा लगता है, आपकी दिलचस्पी किसमें है, यह देखते हुए रंगमंच के नाटक कर सकते हैं, फ़िल्में बनाना सिखा सकते हैं, कविता-कहानी की प्रतियोगिताएँ कर सकते हैं या और भी काफ़ी कुछ कर सकते हैं। ये लोग आपसे बात करके तय करेंगे।

“आप लोग अच्छे से व्यवहार रखिएगा। शिकायत का अवसर मत दीजिएगा। अगर शिकायत आई, तो सरकार आगे इस तरह के विकास-कार्यक्रम एकदम बंद कर देगी। नुक़सान आप ही लोगों का होगा। ठीक है?”

काफ़ी क़ैदियों ने एक साथ आवाज़ मिलाते हुए कहा, “ठीक है, सर!”

इसके बाद परिचय का सिलसिला शुरू हुआ। हमारा नाम बताया गया। फिर मेरे बॉस ने पूछा, “कौन-कौन थिएटर में रुचि रखता है? किसे हीरो बनना है? हाथ उठाएँ।”

दाईं ओर सबसे आगे की पंक्ति में सबसे ज़्यादा क़ैदी बैठे थे। वहाँ से तीन-चार लड़कों ने हाथ उठाकर अपने नाम बताए। मैं लिखती रही। फिर सात-आठ और लड़कों ने नाम लिखवाए। इसके बाद चित्रकला के लिए नाम लिखे जाने लगे। एक लड़का अपनी ड्रॉइंग बुक लेकर आया और हमें दिखाने लगा। शक्ल-सूरत और क़द-काठी में काफ़ी अच्छा था। उसने अपनी टोपी आगे से पीछे की ओर घुमाई और मेरी ओर झुककर ड्रॉइंग के कुछ स्केच दिखाए। पतली कमर, बड़े स्तन, बड़ी आँखें, लंबे बाल... उसके सभी रेखाचित्र इसी तरह के थे।

मैंने पूछा, “इनकी प्रेरणा कहाँ से मिलती है?” उसने उत्साहित होकर कहा, “मेरी गर्लफ़्रेंड बहुत सुंदर थी। उसी को याद करता हूँ, सीमा को, और बनाता रहता हूँ। वही मेरी हीरोइन है।” मैंने उसकी पूरी डायरी उलट-पलटकर देखी। जिगर की शाइरी की किताबों में जिस तरह का स्त्री-चित्रण हुआ करता था, उसी का असर उसके रेखाचित्रों पर दिखाई दे रहा था। ख़ूबसूरती तो क़तई नहीं थी, एक तरह की हवस थी।

ख़ैर, मैंने कहा, “कुछ और भी बनाओ। इतना सब है आस-पास, देखो और अपनी पेंसिल से कमाल करो।” उसने मेरी आँखों में आँखें डालकर कहा, “जी मै’म, आपने कहा है तो इससे अलग बनाता हूँ। मेरा काम आपको कैसा लगा?” मैं सकपका गई। कहा, “अच्छा है। और भी बेहतर कर सकते हो, करो।”

“मै’म, पप्पू नाम है मेरा! याद रखिएगा। अगली बार आप आएँगी तो कुछ अच्छा बनाकर रखूँगा। आपको पसंद आएगा।”

जेलर साहब ने टोकते हुए कहा, “हाँ-हाँ, ठीक है। अपनी जगह पर जाकर बैठो। सबका नंबर आना है। तुम हीरोगिरी ज़्यादा मत झाड़ो। चलो, बैठो।”

पप्पू गाना गुनगुनाते हुए अपनी जगह, बीच में जाकर कहीं बैठ गया। तभी बीच की पंक्ति से एक गंजा लड़का सफ़ेद लंगोट में खड़ा होकर बोला, “आप लोग जादू पर भी कार्यक्रम करेंगे क्या? मैं जादू जानता हूँ।”

मैंने जेलर साहब से पूछा, “यह ऐसे कैसे है? पूरे कपड़े क्यों नहीं पहने?”

वह लड़का ख़ुद ही बोल पड़ा, “मैडम, मैं कच्छा-धारी गिरोह से हूँ। हम चार लोग अभी इधर ही हैं।”

चारों खड़े हो गए। सफ़ेद लंगोट पहने, गंजे सिर वाले चारों लड़के 14 से 17 साल के आस-पास के रहे होंगे। तीन बैठ गए और उनमें से एक ने हमसे सिक्का माँगा। मैंने पर्स से सिक्का निकालकर उसे दिया। उसने उसे हथेली पर रखा, हाथ इधर-उधर नचाए और कुछ ही सेकंड में सिक्का ग़ायब कर दिया। फिर वह अपना क़िस्सा सुनाने लगा कि कैसे यह सब करते हैं, कहाँ से सीखा और इस बात का अफ़सोस कि घर नहीं जा पाते, माँ की याद आती है।

फिर अचानक उसने पूछा, “सिक्का कहाँ है?”

हमने कहा, “पता नहीं।”

उसने कहा, “बॉस की जेब चेक करिए।”

सिक्का वहीं मिला।

पता नहीं उसने कैसे जादू किया, क्या किया; लेकिन हमें क़ैदियों से बातें करने में ज़्यादा लुत्फ़ आ रहा था। मेरे मन में आया कि पूछूँ, वारदात कैसे करते हो? क्या योजना होती है? लेकिन जेलर साहब ने शुरुआत में ही निजी सवाल कम पूछने को कहा था, इसलिए चुप रही। सोचा, कल यह सब देखा जाएगा।

बातचीत से पता चला कि हर पंक्ति में ख़ास तरह के अपराध करने वाले लड़के बैठे थे। पहली पंक्ति में छोटी-मोटी चोरी करने वाले, दूसरी में छीन-झपट करने वाले, अगली में वाहन चोरी करने वाले और उसके बाद हत्या में साथ देने वाले।

मेरी ओर, सबसे आख़िरी पंक्ति में केवल तीन लड़के बैठे थे। वहाँ किसी ने कुछ नहीं बताया कि वे किस अपराध में यहाँ थे, उनके नाम क्या थे या वे किस कार्यक्रम में रुचि रखते थे। वे तीनों एकदम चुप बैठे रहे।

सबसे आगे बैठा लड़का मटमैली शर्ट और पैंट पहने हुए था। उसकी उम्र ग्यारह-बारह साल रही होगी। वह दोनों पैरों के पंजे आपस में मिलाकर बैठा था। उसका पोस्चर अजीब-सा था। कंधे एकदम झुके हुए, आँखें थकी हुई, होंठ सूखे हुए और बाल छोटे थे। लग रहा था, बहुत समय से नहाया नहीं है, न कपड़े बदले हैं। उसने मुझे देखते ही चेहरा झुका लिया।

मैंने पूछा, “क्या नाम है? क्या उम्र है?”

वह कुछ नहीं बोला। साथ के बच्चे बोल पड़े, “इसका नाम राजू है। उम्र तो बहुत बड़ी है इसकी, लेकिन लगता छोटा है।”

मैंने कहा, “यह ख़ुद क्यों नहीं बताता?”

दूसरे बच्चे ही बोले, “यह नहीं बोलता। चुप रहता है।”

मैंने फिर कहा, “राजू तो मेरे बड़े भाई का नाम भी है। तुम्हें किस चीज़ का शौक़ है? गाना, पढ़ना या कुछ और?”

इतने में जेलर साहब ने टोकते हुए कहा, “आज यहीं पर यह ट्रेनिंग-सेशन रोकते हैं। सूरज ढलने को है। मैदान में लाइट की बहुत अच्छी व्यवस्था नहीं है। कल आप लोग दुपहर तक खाना खाकर आ जाइएगा। हम यहीं से सेशन शुरू करेंगे।”

क़ैदियों की ओर मुख़ातिब होकर जेलर साहब ने पूछा, “कैसा लगा आप सभी को आज का यह सेशन? ऐसे ही सेशन आप लोग आगे भी अटेंड करेंगे या नहीं? मैं रिव्यू रिपोर्ट भेजूँगा।”

सभी ने सहमति में कहा, “बहुत अच्छा लगा आज। कल फिर आइएगा आप लोग।”

हम ऑफ़िस पहुँचे। पानी का गिलास वहीं रखा था। मैंने तसल्ली से पानी पिया। जेलर साहब और मेरे बॉस आपस में बात करते हुए चल रहे थे। मैं पीछे-पीछे काले बड़े दरवाज़े तक पहुँच गई।

जेलर साहब ने कहा, “मैडम, उम्मीद करता हूँ आपको बुरा नहीं लगा होगा। आपके जो भी सवाल हैं, उन्हें घर जाकर तैयार कर लीजिएगा। कल या आगे उनके जवाब दिए जाएँगे।”

पहला दरवाज़ा पार करके बाहर पहुँची तो वही सिपाही फिर मिला। उसने पूछा, “मै’म, कैसा लगा?”

मैंने कहा, “काफ़ी अलग! कुछ भी ख़राब नहीं था।”

मैं और सवालों का ताना-बाना अपने इर्द-गिर्द लिए लौटने लगी। इन सवालों का ताना-बाना मेरे क़दमों को भारी किए जा रहा था... ये सैकड़ों बच्चे यहाँ कैसे बंद हैं? पप्पू क्या बलात्कार का अपराधी होगा? क्या सीमा को उसने मार दिया था? जादूगर ने हथौड़ों से लोगों के सिर फोड़े होंगे? क्या छोटे बच्चों की भी उसने हत्या की होगी? कितने लोगों की हत्या की होगी उसने? राजू और उसके पीछे बैठे दो लड़के किस अपराध में यहाँ हैं? राजू क्या गूँगा है? यहाँ तो उसकी जीभ किसी ने काटी नहीं होगी? कई क़ैदियों के चेहरों पर गहरे निशान थे, कुछ ताज़ा भी। क्या पुलिसवाले इन्हें ऐसे मारते होंगे? क्या कल मुझे फिर यहाँ आना चाहिए?

मेरे सिर में दर्द शुरू हो चुका था। मुझे लगा, शायद पानी में किसी ने कुछ मिला दिया है, तभी अचानक दर्द हुआ है। दर्द सिर से आँखों और गर्दन से होता हुआ पेट तक जा रहा था। कहीं पानी में ज़हर तो नहीं मिला दिया? मेरी कोई बात किसी को ख़राब लगी हो? घर तक पहुँच जाऊँगी? ज़िंदा रह पाऊँगी?

बॉस ने कहा, “भाई, तेज़ भूख लगी है। कहीं कुछ खा लेते हैं। फिर रास्ते में तुम्हें ड्रॉप कर दूँगा।”

मैंने उनसे कहा, “नहीं, सर! आप गाड़ी फ़टाफ़ट चलाएँ। मुझे माइग्रेन का अटैक आ रहा है। जल्दी घर पहुँचा दीजिए, प्लीज़।”

दस-पंद्रह मिनट बाद मैं घर पहुँच चुकी थी और भरोसा करने की कोशिश कर रही थी कि आज जो हुआ, वह अस्ल में कैसे-कैसे हुआ।

मैंने नहाकर चाय पी। फिर बिस्तर पर लेटकर सब कुछ सब्र के साथ याद किया और सोने की तैयारी में लग गई।

•••

जारी...

अनुराधा शर्मा को और पढ़िए : इहबास में सोलह दिन | डिप्रेशन : नींद क्यूँ रात भर नहीं आती!

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